जिउतिया व्रत पूजा विधि 2026
बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों की गलियों में जब अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि आती है, तो हवाओं में एक अजीब सी खामोशी और श्रद्धा घुल जाती है। यह खामोशी है उन मांओं की, जो पिछले 24 से 36 घंटों से बिना पानी की एक बूंद पिए अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए कुदरत से लड़ रही होती हैं। इसे ‘जिउतिया’, ‘जीमूतवाहन व्रत’ या ‘जीविपुत्रिका’ कहा जाता है। यह सिर्फ एक उपवास नहीं है, बल्कि एक मां के संकल्प की पराकाष्ठा है।
इतिहास के पन्नों से: कब शुरू हुई यह परंपरा?
जिउतिया व्रत की जड़ें द्वापर युग और महाभारत के कालखंड से जुड़ी मानी जाती हैं। इतिहासकारों और पौराणिक जानकारों के अनुसार, यह व्रत मध्यकालीन भारत में और अधिक प्रचलित हुआ जब लोक संस्कृति में ‘जीमूतवाहन’ नामक राजा को लोक देवता के रूप में पूजा जाने लगा। लेकिन इसका सबसे पहला लिखित संदर्भ भविष्य पुराण में मिलता है।
कहा जाता है कि जब अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे अभिमन्यु के पुत्र (परीक्षित) पर ब्रह्मास्त्र चला दिया था, तब भगवान कृष्ण ने अपनी शक्तियों से उस मृत बालक को पुनर्जीवित किया था। वह दिन अष्टमी का था। तभी से माताओं ने अपनी संतान की सुरक्षा के लिए इस दिन को विशेष महत्व देना शुरू किया। यह परंपरा सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी एक अनकही वसीयत की तरह चली आ रही है।
जीमूतवाहन की अमर कथा: एक राजा जिसने खुद को बलिदान कर दिया
जिउतिया की सबसे प्रचलित पौराणिक कथा गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन की है। जीमूतवाहन बहुत ही दयालु और परोपकारी राजा थे। उन्होंने राज-पाट छोड़कर अपने पिता की सेवा के लिए वन जाने का निश्चय किया। वन में टहलते हुए उन्हें एक वृद्धा (नागमाता) के विलाप करने की आवाज सुनाई दी।
जब जीमूतवाहन ने कारण पूछा, तो पता चला कि नागों और पक्षीराज गरुड़ के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत हर दिन एक नाग गरुड़ का भोजन बनने जाएगा। उस दिन उस वृद्धा के इकलौते पुत्र ‘शंखचूड़’ की बारी थी। जीमूतवाहन ने ममता की उस तड़प को देखा और निर्णय लिया कि वह खुद शंखचूड़ की जगह वध्य शिला (बलि की चट्टान) पर लेट जाएंगे।
जब गरुड़ आए, तो उन्होंने देखा कि आज का शिकार रोने के बजाय शांत है। जब उन्हें असलियत पता चली, तो वे जीमूतवाहन की बहादुरी और त्याग से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने न केवल जीमूतवाहन को जीवनदान दिया, बल्कि भविष्य में नागों की बलि न लेने का वचन भी दिया। तभी से जीमूतवाहन को ‘संतान रक्षक’ देवता माना जाने लगा।
लोकगीतों की मिठास: जब मां के सुरों में बसते हैं बच्चे
जिउतिया के दौरान गांवों में औरतों का समूह एक साथ बैठकर पारंपरिक गीत गाता है। इन गीतों में केवल भक्ति नहीं, बल्कि एक मां का डर और उसकी ममता भी झलकती है। एक प्रसिद्ध मैथिली और भोजपुरी लोकगीत की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं:
“चील्ह और सियारिन के कथा सुनाबै छी,
जिउतिया के बरतिया जे माई करै छी,
जुग-जुग जियसु ललनवा हमार,
जीमूतवाहन बाबा देहूँ असीस अपार।”
इन गीतों में अक्सर चील और सियारिन की कथा का वर्णन होता है, जो इस व्रत के अनुशासन को समझाने के लिए सुनाई जाती है। यह लोक संगीत ही है जो इस कठिन निर्जला व्रत की थकान को कम कर देता है।
तीन दिनों का कठिन अनुशासन: नहाय-खाय से पारणा तक
- जिउतिया कोई एक दिन का त्योहार नहीं है, यह तीन दिनों की एक आध्यात्मिक यात्रा है: नहाय-खाय (सप्तमी): इस दिन महिलाएं स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। मुख्य रूप से ‘मडुआ की रोटी’ और ‘नोनी का साग’ खाने की परंपरा है। मछली खाने वाले कुछ समुदायों में इस दिन ‘माछ-भात’ का भी चलन है।
- निर्जला व्रत (अष्टमी): यह सबसे कठिन दिन होता है। सूर्योदय से पहले ‘सरगही’ (भोर का भोजन) करने के बाद अगले 24 से 30 घंटों तक पानी की एक बूंद भी नहीं ली जाती। दोपहर में जीमूतवाहन की पूजा और कथा सुनी जाती है।
- पारणा (नवमी): सूर्योदय के बाद पूजा-पाठ कर व्रत खोला जाता है। पारणा के समय विशेष पकवान बनाए जाते हैं।
चील और सियारिन का रहस्य: प्रकृति और जीव का संबंध
जिउतिया की पूजा में चील और सियारिन की मिट्टी की मूर्तियां बनाई जाती हैं। इसके पीछे एक दिलचस्प लोककथा है। कहते हैं कि एक वन में एक चील और एक सियारिन सहेलियां थीं। दोनों ने जीमूतवाहन का व्रत रखने का फैसला किया। चील ने तो निष्ठा से व्रत पूरा किया, लेकिन सियारिन को भूख बर्दाश्त नहीं हुई और उसने चुपके से श्मशान में जाकर मांस खा लिया।
परिणामस्वरूप, अगले जन्म में चील के बच्चे स्वस्थ और दीर्घायु हुए, जबकि सियारिन की संतानें बार-बार मृत्यु को प्राप्त होती रहीं। यह कहानी प्रतीकात्मक रूप से ‘धैर्य’ और ‘संयम’ की शिक्षा देती है, जो इस व्रत का मूल आधार है।
क्षेत्रीय विविधता: कहां और कैसे बदलता है स्वरूप?
भले ही मूल भावना एक ही हो, लेकिन जिउतिया मनाने का तरीका जगह के साथ बदल जाता है।
मिथिलांचल (बिहार): यहां इसे ‘जीमूतवाहन व्रत’ कहा जाता है। महिलाएं पीपल के पेड़ के नीचे पूजा करती हैं और कथा सुनती हैं।
भोजपुर/पूर्वांचल: यहां ‘जीउतिया’ के दिन ओखली को सजाकर पूजा करने और रात में जागरण करने की परंपरा है।
नेपाल (तराई): इसे ‘जितिया’ कहा जाता है। यहां थारू समुदाय में यह त्योहार बहुत बड़े स्तर पर मनाया जाता है, जिसमें पारंपरिक नृत्य भी शामिल होते हैं।

विज्ञान और विश्वास: क्या कहता है लॉजिक?
आधुनिक युग में कुछ लोग इतने कठिन व्रत पर सवाल उठाते हैं। लेकिन अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो साल में एक बार किया जाने वाला यह लंबा निर्जला उपवास शरीर के ‘ऑटोफैगी’ (Autophagy) प्रोसेस को ट्रिगर करता है, जिससे कोशिकाएं खुद को डिटॉक्स करती हैं। हालांकि, माताओं के लिए यह विज्ञान से ऊपर ‘मान्यता’ का विषय है। उनका मानना है कि उनकी तपस्या ही उनके बच्चों के लिए ‘सुरक्षा कवच’ का काम करती है।
सांस्कृतिक महत्व: आधुनिक पीढ़ी और जिउतिया
आज के दौर में जब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, जिउतिया जैसे त्योहार महिलाओं को एक मंच पर लाते हैं। पूजा के बहाने महिलाएं एक जगह एकत्रित होती हैं, सुख- दुख साझा करती हैं और अपनी संस्कृति को अगली पीढ़ी को सौंपती हैं। अब युवा पीढ़ी भी इसे ‘मदर्स डे’ के एक पारंपरिक और गहरे स्वरूप के रूप में देखने लगी है।
| विवरण | जानकारी |
| मुख्य देवता | राजा जीमूतवाहन |
| तिथि | अश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी |
| मुख्य पकवान | मडुआ रोटी, नोनी साग, सतपुतिया (झिंगनी) |
| प्रतीक | चील और सियारिन |
| क्षेत्र | उत्तर भारत, नेपाल |
| कठिनाई स्तर | अत्यंत कठिन (निर्जला) |
एक अटूट बंधन
जिउतिया केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह उस आदिम प्रेम का उत्सव है जो एक मां को अपनी संतान से जोड़ता है। भूखी-प्यासी मां जब तपती दोपहरी में कथा सुनती है, तो उसकी आंखों में केवल अपने बच्चे का मुस्कुराता चेहरा होता है। यह व्रत सिखाता है कि विश्वास में वह शक्ति है जो यमराज के द्वार से भी जीवन को वापस खींच ला सकती है।
