लेखिका: पूजा कुमारी
कामाख्या मंदिर न सिर्फ आस्था का केंद्र है, बल्कि भारत के सबसे रहस्यमय शक्तिपीठों में गिना जाता है।
असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवाहाटी शहर से कुछ ही किलोमीटर दूर नीलाचल पहाड़ी पर, ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पहाड़ी पर स्थित हैं ये शक्तिपीठ मंदिर। यह मंदिर शक्ति की देवी सती का मंदिर है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर बसा है इतिहासकार यह मानते है कि इसकी वर्तमान संरचना मान्य रूप से 16वीं सदी के कोच राजाओं द्वारा बनवाई गई थी, लेकिन इसके पहले भी यहां पर पूजा स्थल मौजूद था। जिसके जड़े आठवीं और नौवी सदी तक जाती है। कई बार यह मंदिर युद्धों और प्राकृतिक आपदाओं में नष्ट हुआ, लेकिन हर बार स्थानीय शासकों और भक्तों ने इसे फिर से खड़ा कर दिया। इसलिए कामाख्या मंदिर सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का नाम है।
क्या हैं मंदिर की विशेषता?
कामाख्या मंदिर देश के सभी मंदिरों से काफी अलग है। यहाँ पर देवी की कोई पारंपरिक मूर्ति नहीं है। यहाँ गर्भगृह में एक प्राकृतिक शिला है, जिसे देवी का स्वरूप माना जाता है। इस शिला से हमेशा जल का रिसाव होता रहता है, जिसे पवित्र माना जाता है। यहां तक की कई लोग यह दावा करते हैं कि जब हम वहाँ जाते हैं तो हमारी आँखे भर आती हैं, सांसें तेज हो जाती हैं और हम भावुक हो जाते हैं। वहाँ जाने के बाद मन शांत हो जाता है। वैसे तो हर व्यक्ति की अपनी अलग- अलग धारणा है।
यहाँ जो शिला है, उसके भीतर से लगातार जल रिसता रहता है, जिसे भक्त प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। आपको बता दें कि यह जल प्राकृतिक स्त्रोत से आता है। यह वैज्ञानिक तथ्य है, लेकिन भक्त इसे देवी की उपस्थिति का जीवित संकेत मानते है। यहाँ देवी को शरीर के अंग के प्रतीक के तौर पर पूजा जाता है। यह भारतीय शक्ति पूजा की परंपरा में एक अद्भुत उदाहरण है।
अंबुबाची मेला का रहस्य
अब बात करते हैं उस परंपरा की, जहाँ माँ कामाख्या देवी पूरी दुनिया में अलग पहचान रखती हैं, और वह है अंबूबाची मेला। कामाख्या मंदिर का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध पर्व अंबुबाची मेला है। आपको बता दें कि हर साल जून के महीने में मानसून के समय तीन दिनों के लिए मंदिर का गर्भगृह बंद कर दिया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि उन दिनों माँ कामाख्या स्वयं रजस्वला (मासिक धर्म) होती हैं, इसलिए इन दिनों सामान्य पूजा नहीं की जाती। चौथे दिन मंदिर को विशेष रूप से शुद्ध कर द्वार खोले जाते हैं और भव्य पूजा की जाती हैं। हर साल माता के रजस्वला होने कि यह मान्यता कामाख्या शक्तिपीठ से जुड़ी एक अत्यंत प्राचीन और रहस्यमयी परंपरा है, जो इसे अन्य कुल 51 शक्तिपीठों में अलग बनाती है।

मान्यता के अनुसार, जब माता सती ने अपने प्राण त्यागे, तब भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा के लिए उनके शरीर के अंगों को विभक्त किया। जिस स्थान पर माता सती का योनि भाग गिरा, वही स्थान आज कामाख्या शक्तिपीठ के रूप में पूजित है। इसी कारण यह मंदिर हर वर्ष तीन दिनों तक रजस्वला माना जाता है। इन दिनों मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में माता विश्राम करती हैं। कहा जाता है कि इन तीन दिनों में माता को सफेद वस्त्र अर्पित किया जाता है, जो माता के रज से लाल रंग का हो जाता है। इसी वस्त्र को अंबुबाची वस्त्र कहा जाता है।
वहीं चौथे दिन जब मंदिर के पट खुलते हैं, तो यह वस्त्र भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। मान्यता है कि इस लाल वस्त्र को अपने पास रखने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और यह वस्त्र सौभाग्य, रक्षा और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
कामाख्या मंदिर का रहस्य: भैरव दर्शन क्यों हैं जरूरी
वहीं कामाख्या शक्तिपीठ से जुड़ी एक महत्वपूर्ण धार्मिक मान्यता यह भी है कि उमानंद भैरव के दर्शन के बिना मां कामाख्या की पूजा अधूरी मानी जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार, माता के दर्शन के बाद उमानंद भैरव के दर्शन करना अत्यंत आवश्यक होता है। वैसे तो उमानंद भैरव मंदिर, कामाख्या मंदिर के निकट ही स्थित है। जबकि मान्यता है कि जो श्रद्धालु अपनी सभी मनोकामनाओं की पूर्ति चाहते हैं, उन्हें माँ कामाख्या के साथ-साथ उमानंद भैरव के दर्शन अवश्य करने चाहिए। भैरव को शक्ति का रक्षक और साधना का संरक्षक माना जाता है।
क्या थी कामाख्या मंदिर की पौराणिक कथा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, असम के कामाख्या में माता सती का योनि भाग गिरा था, जिससे कामाख्या शक्तिपीठ की उत्पत्ति हुई। शिव पुराण के अनुसार, प्रजापति दक्ष अपनी पुत्री सती के लिए योग्य वर की तलाश कर रहे थे, लेकिन माता सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव को अपना पति चुना। इस निर्णय से दक्ष अत्यंत नाराज हो गए। कुछ समय बाद दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें जानबूझकर भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। जब माता सती को इस बात का पता चला, तो वे दुखी और क्रोधित हो गईं और यज्ञ स्थल पर ही अपने प्राणों की आहुति दे दी।
माता सती की मृत्यु से भगवान शिव अत्यंत व्यथित हो गए। उन्होंने क्रोध में दक्ष को दंड दिया, लेकिन बाद में उन्हें क्षमा कर जीवनदान भी दिया। भगवान शिव सती के वियोग में उनका शव लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। तब सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को 108 भागों में विभक्त कर दिया। इनमें से 51 अंग पृथ्वी पर गिरे, जहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
