मिथिला की ओठंगन परंपरा - चौखट से सटकर दही-चूड़ा खाते पुरुष और महिलाएं
सुबह के चार साढ़े-चार बज रहे होंगे। पौ फटने में अभी वक्त है। बिहार के मिथिलांचल के किसी भी गाँव की पगडंडियों पर सन्नाटा है, लेकिन घरों के भीतर एक अजीब सी हलचल है। कड़ाके की ठंड, कोहरे की चादर और उस पर माघ की वो कंपकपी। अमूमन इस वक्त लोग रजाइयों में दुबके होते हैं, लेकिन आज ‘तिला संक्रांति’ है। आज मिथिला का हर पुरुष चाहे वो बच्चा हो या बुजुर्ग, एक ऐसी रहस्यमयी और अनूठी परंपरा को निभाने जा रहा है, जो गूगल के दौर में भी उतनी ही जीवंत है जितनी सदियों पहले थी। इस परंपरा का नाम है- ‘ओठगन’।
वो सन्नाटा और चौखट का साथ
मिथिला की संस्कृति में ‘ओठगन’ का अर्थ होता है- सहारा लेना या टिकना। लेकिन मकर संक्रांति की सुबह यह महज एक शब्द नहीं, बल्कि एक अनुष्ठान बन जाता है। नियम बड़ा सख्त और दिलचस्प है। सूरज उगने से पहले उठना है, नित्य क्रिया से निवृत्त होकर बिना किसी से एक शब्द बोले (मौन रहकर) घर के मुख्य द्वार यानी ‘डीह’ की चौखट के पास जाना है।
वहाँ जाकर आपको खड़ा होना है, लेकिन सामान्य तरीके से नहीं। आपको अपने शरीर का पूरा भार घर के किवाड़ (दरवाजे) या चौखट पर डाल देना है। आप द्वार से ‘ओठंग’ कर (सटकर) खड़े होते हैं और फिर शुरू होता है वह भोजन जिसे दुनिया ‘ब्रेकफास्ट’ कहती है, पर मिथिला के लिए वह ‘सिद्धि’ है- चूड़ा और दही।
बिना बात किए, अंधेरे-उजाले के उस मिलन काल में, घर की दहलीज को सहारा देकर चूड़ा-दही खाना ही ‘ओठगन’ है। सुनने में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपी भावनाएं और लोक-विश्वास की परतें बहुत गहरी हैं।
क्यों ओठंगते हैं मैथिल? (परंपरा और विश्वास)
गाँव के बुजुर्गों से पूछिए तो वे एक ही बात कहेंगे- “जे ओठंगि क’ दही-चूड़ा खैतैक, ओकर घर ओतबे मजबूत रहतैक” (जो ओठंग कर दही-चूड़ा खाएगा, उसका घर उतना ही मजबूत रहेगा)।
यह परंपरा दरअसल ‘वास्तु पुरुष’ और ‘गृह रक्षा’ से जुड़ी है। पुराने समय में घर मिट्टी और खपरैल के होते थे। मकर संक्रांति वह समय होता है जब सूर्य उत्तरायण होते हैं, ऋतु परिवर्तन होता है। पूर्वजों का मानना था कि इस संधिकाल में अगर घर का स्वामी या सदस्य घर की मुख्य चौखट को अपने शरीर का स्पर्श और सहारा देता है, तो वह घर को ‘ऊर्जा’ प्रदान करता है। यह एक तरह का ‘सिम्बॉलिक’ प्रॉमिस है कि हम इस घर के रक्षक हैं और यह घर हमारा रक्षक है।
भोर के उस पहर में मौन रहने का भी अपना मनोविज्ञान है। मौन रहकर एकाग्रता के साथ अन्न ग्रहण करना, प्रकृति और वास्तु के प्रति सम्मान प्रकट करना है। यह विश्वास है कि इस दिन ओठंग कर खाया गया दही-चूड़ा साल भर घर की दीवारों को गिरने नहीं देगा और परिवार को किसी भी प्राकृतिक आपदा से बचाए रखेगा।
पौराणिक संदर्भ: राजा जनक और कृषि की गरिमा
यद्यपि ओठंगन का सीधा वर्णन किसी एक पुराण में खोजना कठिन है, लेकिन मिथिला के विद्वान इसे ‘कृषि प्रधान संस्कृति’ के गौरव से जोड़ते हैं। एक लोककथा प्रचलित है कि जब राजा जनक ने स्वयं हल चलाया था, तब मिथिला की धरती से माता सीता का प्राकट्य हुआ था। ‘ओठगन’ उसी श्रम और अन्न की शुद्धता का उत्सव है।
दही और चूड़ा- ये दोनों ही चीजें श्रम और धैर्य का प्रतीक हैं। धान को कूटकर चूड़ा बनाना और दूध को तपाकर दही जमाना। कहते हैं कि सतयुग में जब देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष चल रहा था, तब ऋषियों ने अन्न को ही सबसे बड़ा ‘अस्त्र’ माना था। मकर संक्रांति के दिन जब सूर्य अपनी राशि बदलते हैं, तब शरीर में नई ऊर्जा का संचार करने के लिए ‘अग्नि’ (सूर्य) और ‘जल/शीतलता’ (दही) का संतुलन जरूरी होता है। चौखट पर खड़े होकर खाना इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य अपनी जड़ों (घर) से जुड़ा हुआ है और प्रकृति के उपहार (अन्न) को ग्रहण कर रहा है।
कुछ लोग इसे ‘मार्कंडेय पुराण’ के उन अंशों से भी जोड़ते हैं जहाँ प्रकृति पूजा और गृह-देवताओं की तुष्टि की बात कही गई है। मिथिला में ‘डीह वार’ (ग्राम देवता) और ‘गोसाईं’ (कुल देवी/देवता) की महत्ता सर्वोपरि है। ओठंगन उसी ‘डीह’ को मजबूती देने की एक लोकाचार पद्धति है।
ओठगन का ‘मेनू’: सिर्फ भोजन नहीं, औषधि है
इस डॉक्यूमेंट्री का सबसे स्वादिष्ट हिस्सा यही है। मिथिला का चूड़ा कोई साधारण चूड़ा नहीं होता। यह अक्सर ‘कतरनी’ या ‘मालभोग’ धान का होता है, जिसकी खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल जाती है। दही भी ऐसा, जिसे ‘जोड़न’ देकर रात भर मिट्टी के हांडी में जमाया गया हो, जो इतना गाढ़ा हो कि चाकू से काटा जा सके।
सुबह- सुबह खाली पेट, सूर्योदय से पहले इस ठंडे दही और चूड़ा को खाने के पीछे आयुर्वेद का तर्क भी छिपा है। मकर संक्रांति के समय पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ने का डर रहता है। दही प्रोबायोटिक का काम करता है और चूड़ा (पोहा) आसानी से पचने वाला कार्बोहाइड्रेट। इसे खाकर जब व्यक्ति दिन भर की ‘तिला संक्रांति’ की पूजा और दान-पुण्य में व्यस्त होता है, तो उसका शरीर ऊर्जावान बना रहता है।
विलुप्त होती कड़ियाँ और ग्राउंड रियलिटी
आज जब लोग कंक्रीट के फ्लैट्स में रह रहे हैं, ‘ओठगन’ की यह परंपरा सिमटती जा रही है। शहरों में न वो चौखट बची है, न वो आंगन और न ही भोर में उठने का वो अनुशासन। लेकिन दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर और सहरसा के गांवों में आज भी यह परंपरा वैसी ही है।
वहाँ आज भी सवेरे- सवेरे छोटे बच्चों को जगाया जाता है। माँ कहती है- “उठू बाबू, ओठगन करै लेल नै जेबै?” बच्चा आँखें मलता हुआ उठता है, कांपते हाथों से दही-चूड़ा का कटोरा लेता है और ठिठुरती ठंड में जाकर दरवाजे की लकड़ी के पल्ले से सट जाता है। वो दृश्य किसी भी सिनेमैटोग्राफर के लिए स्वर्ग जैसा है- नीला सा अंधेरा, कोहरा, हाथ में मिट्टी का बर्तन और एक अबोध बालक का अपनी जड़ों को ‘सहारा’ देना।
यह परंपरा सिखाती है कि हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएं, हमारी मजबूती हमेशा उस ‘सहारे’ (ओठगन) में ही है जो हमें हमारे घर, हमारी मिट्टी और हमारे संस्कारों से मिलता है।
एक रिपोर्टर की नजर से
एक ‘घुमक्कड़ रिपोर्टर’ के तौर पर जब आप इस कहानी को कैमरे में कैद करेंगे, तो आपको दिखेगा कि मिथिला में धर्म सिर्फ मंदिरों में नहीं है। धर्म उस चौखट में है, धर्म उस मौन में है और धर्म उस एक मुट्ठी चूड़ा- दही में है जिसे खाकर एक आम मैथिल यह विश्वास कर लेता है कि अब उसका घर साल भर सुरक्षित रहेगा।
ओठगन कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि अपनी विरासत को सहेजने का एक अनूठा ‘बॉडी लैंग्वेज’ है। यह इंसान और उसकी ईंट- पत्थर की दीवारों के बीच के उस भावनात्मक रिश्ते का नाम है, जिसे हम अक्सर ‘घर’ कहते हैं। अगली बार जब आप मकर संक्रांति की सुबह किसी मैथिल को दरवाजे से चिपककर खाते देखें, तो समझ जाइएगा कि वो सिर्फ खाना नहीं खा रहा, वो अपने पुरखों के दिए हुए घर की नींव को अपने विश्वास से सींच रहा है।
Ground Talk पर हम भारत की उन लोक परंपराओं को सामने लाते हैं, जो इतिहास की किताबों में नहीं, लोगों की सांसों में जीवित हैं।
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