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	<title>Ground Talk</title>
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		<title>भोपाल का वो रहस्यमयी मंदिर, जहाँ नवरात्रि में खुद-ब-खुद सीधी हो जाती है पत्थर की झुकी हुई गर्दन!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[सत्यम मिश्रा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Apr 2026 18:01:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धरोहर संवाद]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मध्य प्रदेश की अनंत गहराइयों में कई ऐसे रहस्य दफन हैं, जिनकी गुत्थी आज का आधुनिक विज्ञान भी</p>
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<p>मध्य प्रदेश की अनंत गहराइयों में कई ऐसे रहस्य दफन हैं, जिनकी गुत्थी आज का आधुनिक विज्ञान भी नहीं सुलझा पाया है। इन्हीं रहस्यों में से एक है भोपाल की सरजमीं पर स्थित <strong><a href="https://share.google/Urcf3QH3HJlJaBwdk" type="link" id="https://share.google/Urcf3QH3HJlJaBwdk">&#8216;मां कंकाली&#8217;</a></strong> का मंदिर। यह कोई साधारण देवालय नहीं है, बल्कि आस्था और चमत्कार का एक ऐसा संगम है, जहां पत्थर की एक मूर्ति सदियों से इंसानी तर्कशक्ति को चुनौती दे रही है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">उस रहस्यमयी सुबह की आहट</h2>



<p>भोपाल के रायसेन रोड पर स्थित गुदावल गांव की पहाड़ियों के पास जब आप पहुंचते हैं, तो हवाओं में एक अजीब सी खामोशी और भक्ति का अहसास होने लगता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि इस मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है। मंदिर के गर्भगृह में विराजित मां कंकाली की मूर्ति को देखते ही जो पहली चीज किसी भी नवागंतुक को खटकती है, वह है मां की गर्दन का झुकाव।</p>



<p>माता की गर्दन दाईं ओर लगभग 45 डिग्री के कोण पर झुकी हुई है। पहली नजर में यह शिल्पकारी का एक नमूना लग सकता है, लेकिन इस झुकी हुई गर्दन के पीछे जो कहानी छिपी है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। मान्यता है कि साल के 364 दिन यह गर्दन इसी तरह झुकी रहती है, लेकिन साल का एक खास पल ऐसा आता है, जब यह पत्थर की प्रतिमा अपनी जगह छोड़ती है और गर्दन बिल्कुल सीधी हो जाती है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">आस्था का वो जादुई पल: जब पत्थर &#8220;सांस&#8221; लेता है</h2>



<p>नवरात्रि के नौ दिन इस मंदिर में उत्सव का माहौल होता है। हजारों की भीड़, ढोल-नगाड़ों की थाप और &#8216;जय माता दी&#8217; के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठता है। लेकिन इस भीड़ में मौजूद हर शख्स की नजरें सिर्फ एक ही चीज पर टिकी होती हैं-मां की वो झुकी हुई गर्दन।</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>कहा जाता है कि नवरात्रि के दौरान किसी एक विशेष मुहूर्त में, जो अक्सर अष्टमी या नवमी की संधि बेला होती है, माता की गर्दन धीरे-धीरे सीधी होने लगती है। यह पल इतना सूक्ष्म और इतना तीव्र होता है कि जो भक्त उस समय पलक झपका देता है, वह इस चमत्कार को देखने से चूक जाता है। स्थानीय बुजुर्गों का दावा है कि उन्होंने अपनी आंखों से पत्थर की उस गर्दन को मांस-पेशियों की तरह हरकत करते देखा है।</p>
</blockquote>



<p>लोग कहते हैं कि जिस क्षण माता की गर्दन सीधी होती है, उस समय मंदिर के वातावरण में एक अजीब सी ऊर्जा का संचार होता है। मंदिर के घंटे अपने आप हिलने लगते हैं और भक्तों को ऐसा महसूस होता है जैसे साक्षात शक्ति उनके सामने खड़ी है। यह वो क्षण होता है जब विज्ञान हार जाता है और केवल श्रद्धा शेष रह जाती है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">इतिहास और जनश्रुतियों के झरोखे से</h2>



<p>मां कंकाली मंदिर का इतिहास किसी लिखित दस्तावेज से ज्यादा लोगों की यादों और लोकगीतों में जिंदा है। बताया जाता है कि लगभग 17वीं-18वीं शताब्दी के आसपास एक मराठा सेनापति को सपने में मां के दर्शन हुए थे। माता ने उन्हें संकेत दिया था कि वह एक टीले के नीचे दबी हुई हैं। खुदाई के दौरान जब यह भव्य मूर्ति निकली, तो सभी अचंभित रह गए। मूर्ति की बनावट और उसकी अष्टभुजी शक्ति देखते ही बनती थी।</p>



<p>लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी वह झुकी हुई गर्दन। उस दौर के मूर्तिकारों और वास्तुकारों ने इसे सीधा करने की बहुत कोशिश की, लेकिन कहा जाता है कि जितनी बार भी इसे सीधा करने का प्रयास हुआ, उतनी बार कोई न कोई अनहोनी हो गई। अंततः इसे ईश्वरीय इच्छा मानकर उसी अवस्था में स्थापित कर दिया गया।</p>



<h2 class="wp-block-heading">मंदिर की बनावट और तांत्रिक महत्व</h2>



<p>कंकाली माता का यह मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि इसे तंत्र साधना का भी एक बड़ा केंद्र माना जाता है। मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियां और वहां की भौगोलिक स्थिति इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती है। यहां मां काली के रौद्र रूप और ममतामयी रूप का एक अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है।</p>



<p>मूर्ति के 45 डिग्री झुकाव को लेकर ज्योतिषीय और आध्यात्मिक तर्क भी दिए जाते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह झुकाव ब्रह्मांड की किसी विशेष ऊर्जा रेखा (Energy Line) के समानांतर है। वहीं, भक्तों का मानना है कि मां अपने बच्चों के दुख सुनने के लिए हमेशा कान नीचे की ओर झुकाए रहती हैं, और साल में एक बार जब वह भक्तों की मुरादें पूरी कर देती हैं, तब वह अपनी स्वाभाविक मुद्रा में आती हैं।</p>



<h2 class="wp-block-heading">उन चश्मदीदों की जुबानी</h2>



<p>गांव के एक 80 वर्षीय वृद्ध, जो अपनी पूरी जिंदगी इसी मंदिर की सेवा में बिता चुके हैं, बताते हैं, <strong>&#8220;बेटा, यह आंखों का धोखा नहीं है। मैंने अपनी जवानी में एक बार उस पल को देखा था। सुबह का वक्त था, आरती होने वाली थी, तभी अचानक लगा जैसे मूर्ति के भीतर प्राण आ गए हों। गर्दन धीरे से सीधी हुई और कुछ ही पलों में वापस अपनी जगह पर लौट आई। उस दिन के बाद से मेरी दुनिया बदल गई।&#8221;</strong></p>



<p>सिर्फ ग्रामीण ही नहीं, बल्कि कई बार शहरों से आए तर्कवादी और वैज्ञानिक भी इस घटना की तह तक जाने की कोशिश कर चुके हैं। कुछ इसे <strong>&#8216;ऑप्टिकल इल्यूजन&#8217;</strong> या आंखों का भ्रम कहते हैं, तो कुछ इसे मंदिर की नींव में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों से जोड़ते हैं। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि अगर यह सिर्फ भ्रम है, तो यह साल के हर दिन क्यों नहीं होता? यह सिर्फ नवरात्रि के उन विशेष क्षणों में ही क्यों घटित होता है?</p>



<h2 class="wp-block-heading">श्रद्धा का समंदर और अनसुलझे सवाल</h2>



<p>जैसे-जैसे समय बीत रहा है, <strong>मां कंकाली</strong> की महिमा और भी फैलती जा रही है। अब केवल मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश से भी लोग इस चमत्कार के साक्षी बनने आते हैं। मंदिर के आसपास का मेला, श्रद्धालुओं की लंबी कतारें और नारियल-चुनरी की महक एक अलग ही संसार रचती है।</p>



<p>वहां जाने वाला हर व्यक्ति एक ही सवाल लेकर लौटता है-क्या वास्तव में पत्थर हिल सकता है? क्या वाकई कोई शक्ति है जो भौतिक विज्ञान के नियमों को ठेंगा दिखा रही है?</p>



<p>मंदिर के गर्भगृह की ठंडी दीवारों के बीच जब आप खड़े होते हैं, तो आपको उन सवालों के जवाब ढूंढने की जरूरत महसूस नहीं होती। वहां सिर्फ एक अनुभव होता है। वह अनुभव, जो शब्दों से परे है। वह अहसास, जो आपको यह मानने पर मजबूर कर देता है कि इस दुनिया में ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो हमारी समझ और हमारी मशीनों की पकड़ से बाहर हैं।</p>



<h2 class="wp-block-heading">प्रकृति और वास्तुकला का रहस्यमयी तालमेल</h2>



<p>मंदिर के आसपास की पहाड़ियां और वहां का शांत वातावरण इस रहस्य को और गहरा बनाता है। मंदिर परिसर में कई प्राचीन शिलालेख भी मिलते हैं, जिनकी लिपि अब धुंधली हो चुकी है। इन शिलालेखों में शायद उस गुप्त तकनीक या उस प्राचीन अनुष्ठान का वर्णन हो, जिसके कारण यह मूर्ति इस तरह व्यवहार करती है।</p>



<p>रात के समय जब मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं और पहाड़ियों पर सन्नाटा पसर जाता है, तब स्थानीय लोग मंदिर की ओर नहीं जाते। उनका मानना है कि रात में मां अपने गणों के साथ विचरण करती हैं। यह डर नहीं, बल्कि एक गहरे सम्मान और श्रद्धा का भाव है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">एक अधूरा अनुभव, जो हर साल बुलाता है</h2>



<p>मां कंकाली का यह मंदिर हमें याद दिलाता है कि भारत की मिट्टी में चमत्कार आज भी रचे-बसे हैं। 45 की वह झुकी हुई गर्दन सिर्फ एक प्रतिमा का हिस्सा नहीं है, बल्कि वह उन लाखों लोगों की उम्मीदों का केंद्र है जो हर साल इस उम्मीद में वहां जाते हैं कि शायद इस बार उनकी आंखों के सामने वह पत्थर &#8216;जी&#8217; उठेगा।</p>



<p>चाहे वह कोई चुंबकीय शक्ति हो, कोई प्राचीन इंजीनियरिंग का कमाल हो या साक्षात ईश्वरीय चमत्कार- सच्चाई यही है कि भोपाल की यह पहाड़ियां एक ऐसा राज सीने में दबाए बैठी हैं, जिसका पर्दा शायद कभी नहीं उठेगा। और शायद यही इस मंदिर की सबसे बड़ी खूबसूरती है। रहस्य बना रहना ही तो आस्था को जिंदा रखता है।</p>



<p>अगली बार जब आप भोपाल की गलियों से गुजरें और आपको दूर पहाड़ियों पर कोई लाल ध्वज लहराता दिखे, तो समझ जाना कि मां कंकाली वहां बैठी अपनी गर्दन झुकाए आपकी पुकार सुन रही हैं। और कौन जानता है, शायद आपकी उपस्थिति के दौरान ही वह क्षण आ जाए जब मां अपनी गर्दन सीधी करें और आपकी ओर देख मुस्कुरा दें।</p>
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		<title>जानिए बिहार की शादियों में क्यों खास है &#8216;नारंगी भखरा सिंदूर&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[सत्यम मिश्रा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 31 Mar 2026 05:55:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धरोहर संवाद]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बिहार की मिट्टी की अपनी एक अलग महक है, और यहाँ की परंपराओं में जो रचे-बसे रंग हैं,</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>बिहार की मिट्टी की अपनी एक अलग महक है, और यहाँ की परंपराओं में जो रचे-बसे रंग हैं, वे सिर्फ आंखों को नहीं सुहाते, बल्कि उनमें सदियों का इतिहास और जज्बात छिपे होते हैं। इन्हीं रंगों में सबसे चटख और सबसे गहरा रंग है- <strong><a href="https://www.jagran.com/spiritual/religion-why-bihari-families-follow-the-bhakhra-sindoor-ritual-meaning-and-significance-40055568.html" type="link" id="https://www.jagran.com/spiritual/religion-why-bihari-families-follow-the-bhakhra-sindoor-ritual-meaning-and-significance-40055568.html">भखरा सिंदूर</a></strong>।</p>



<p>वह सुर्ख लाल रंग का सिंदूर नहीं, जो अक्सर बाजार के छोटे पैकेटों में मिलता है। यह वह गाढ़ा नारंगी रंग है, जो दुल्हन की नाक की नोक से शुरू होकर सिर के बीचों-बीच उस लंबी लकीर तक जाता है, जिसे सुहाग की लंबी उम्र का प्रतीक माना जाता है। अगर आप बिहार के किसी भी गांव या शहर की शादी में शरीक हुए हों, तो आपने देखा होगा कि सिंदूरदान के समय मंडप का पूरा माहौल बदल जाता है। वह सिर्फ एक रस्म नहीं होती, वह एक &#8216;लिगेसी&#8217; (विरासत) का हस्तांतरण होता है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">उस सिंदूरदानी की कहानी</h2>



<p>कहानी शुरू होती है उस <strong>सिन्दूरदानी</strong> से, जो अक्सर पीतल या लकड़ी (खासकर आम या शीशम की लकड़ी) की बनी होती है। वह कोई साधारण डिब्बी नहीं है। वह एक तिजोरी है, जिसमें एक परिवार की मर्यादा और आने वाली पीढ़ी की खुशियां बंद होती हैं। बिहार के घरों में यह नियम सा है कि सास अपनी नई बहू को अपनी सिन्दूरदानी सौंपती है। यह सिर्फ एक वस्तु देना नहीं है; यह उस जिम्मेदारी का प्रतीक है जो एक स्त्री दूसरी स्त्री को सौंपती है।</p>



<p>मंडप के बीचों-बीच, धुआं उठते हवन कुंड और मंत्रोच्चार के बीच, जब दूल्हा अपनी जेब से या किसी थाली से एक चांदी का सिक्का (रुपया) उठाता है, तो सबकी सांसें थम जाती हैं। वह सिक्का उस भखरा सिंदूर में डुबोया जाता है। दूल्हा दुल्हन की नाक के एकदम सिरे से-जिसे <strong>&#8216;अग्रभाग&#8217;</strong> कहते हैं- वहां से शुरू करके पीछे तक एक लंबी लकीर खींचता है। यह लकीर जितनी लंबी और स्पष्ट होती है, माना जाता है कि पति की उम्र और घर की बरकत उतनी ही लंबी होगी।</p>



<h2 class="wp-block-heading">आखिर यह नारंगी ही क्यों?</h2>



<p>अक्सर लोग पूछते हैं कि लाल क्यों नहीं? नारंगी ही क्यों? इसका जवाब किसी विज्ञान की किताब में नहीं, बल्कि हमारी मान्यताओं और प्रकृति के करीब होने में छिपा है।</p>



<ol start="1" class="wp-block-list">
<li><strong>हनुमान जी और सिंदूर का नाता:</strong> बिहार की संस्कृति में &#8216;बजरंगबली&#8217; का अटूट स्थान है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब हनुमान जी ने माता सीता को अपनी मांग में सिंदूर लगाते देखा और पूछा कि वे ऐसा क्यों करती हैं, तो सीता माता ने कहा था कि इससे श्री राम प्रसन्न होते हैं और उनकी आयु लंबी होती है। यह सुनकर हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लपेट लिया। वह सिंदूर <strong>&#8216;सिंदूरी नारंगी&#8217;</strong> था। तब से, नारंगी रंग को शक्ति, निष्ठा और अमर सुहाग का रंग माना गया।</li>



<li><strong>सूर्य की पहली किरण:</strong> नारंगी रंग उगते हुए सूरज (उषाकाल) का प्रतीक है। बिहार में &#8216;छठ&#8217; महापर्व है, जहाँ डूबते और उगते सूर्य की पूजा होती है। यह भखरा सिंदूर उसी सूर्य की ऊर्जा का प्रतीक है, जो एक नए वैवाहिक जीवन की शुरुआत करता है।</li>



<li><strong>शुद्धता और प्रकृति:</strong> पारंपरिक भखरा सिंदूर &#8216;मर्करी सल्फाइड&#8217; या प्राकृतिक खनिजों से बनता है। इसे बनाने की प्रक्रिया काफी कठिन होती थी। यह चमकीला नारंगी रंग सौभाग्य (Good Luck) का सूचक माना जाता है। लाल रंग जहाँ जुनून और प्रेम का प्रतीक है, वहीं नारंगी रंग त्याग, तपस्या और सौम्यता का संगम है।</li>
</ol>



<h2 class="wp-block-heading">मंडप का वह जादुई पल</h2>



<p>जरा कल्पना कीजिए। आधी रात का वक्त है। कोहबर की दीवारों पर बने चित्र गवाह हैं। मंगल गीत गाती महिलाएं-<strong> &#8220;सूनु सूनु बाबा अरज मोर, सिन्दूर जे लेबऊ बेमिसाल&#8230;&#8221; (सुनिए बाबा, मेरी विनती सुनिए, जो सिंदूर मुझे मिलेगा वह बेमिसाल हो)।</strong></p>



<p>दुल्हन के सिर पर जब वह गाढ़ा नारंगी रंग बिखरता है, तो वह केवल एक श्रृंगार नहीं रह जाता। भखरा सिंदूर की खासियत यह है कि यह थोड़ा दानेदार और भारी होता है। जब यह मांग में भरता है, तो कुछ कण दुल्हन की नाक पर गिरते हैं। बिहार में कहा जाता है, <strong>&#8220;नाक पर सिंदूर गिरना मतलब पति का बहुत प्यार मिलना।&#8221;</strong> उस वक्त दुल्हन की झकी हुई पलकें और वह नारंगी आभा, उसे साक्षात लक्ष्मी का रूप दे देती है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">विरासत का बोझ और गौरव</h2>



<p>भखरा सिंदूर का महत्व शादी के बाद भी खत्म नहीं होता। बिहार की महिलाएं किसी भी बड़े तीज-त्योहार पर, चाहे वह <a href="https://www.groundtalk.in/dharohar-samvad/vat-savitri-vrat/" type="link" id="https://www.groundtalk.in/dharohar-samvad/vat-savitri-vrat/">&#8216;वट सावित्री&#8217;</a> हो या <a href="https://www.groundtalk.in/dharohar-samvad/jitiya-vrat-katha/" type="link" id="https://www.groundtalk.in/dharohar-samvad/jitiya-vrat-katha/">&#8216;जिउतिया&#8217;</a>, इसी भखरा सिंदूर का इस्तेमाल करती हैं। यह आधुनिक &#8216;लिक्विड सिंदूर&#8217; या &#8216;स्टिक&#8217; जैसा नहीं है जिसे बस एक बिंदी की तरह लगा लिया जाए। इसे लगाने के लिए वक्त चाहिए, धैर्य चाहिए और सम्मान चाहिए।</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>आज के दौर में जब सब कुछ इंस्टेंट हो गया है, बिहार की शादियां अभी भी इस नारंगी रंग की वजह से अपनी जड़ों से जुड़ी हुई हैं। यह रंग याद दिलाता है कि हम चाहे न्यूयॉर्क में बस जाएं या दिल्ली के किसी फ्लैट में, हमारी जड़ें उस पीतल की सिन्दूरदानी और उस भखरा सिंदूर के दानेदार अहसास में ही छिपी हैं।</p>
</blockquote>



<p>यह सिंदूर एक पुल है- मायके और ससुराल के बीच का, परंपरा और आधुनिकता के बीच का। जब एक बेटी अपनी मां को वह गहरा नारंगी सिंदूर लगाए देखती है और फिर वही रंग उसकी अपनी मांग में सजता है, तो उसे अहसास होता है कि वह अब उस महान स्त्री-शृंखला का हिस्सा बन गई है जिसने सदियों से इस संस्कृति को सहेज कर रखा है।</p>



<p>भखरा सिंदूर की वह महक और उसका वह जिद्दी नारंगी रंग, जो धोने के बाद भी माथे पर एक हल्की सी लकीर छोड़ जाता है, वही तो असली पहचान है बिहार के सुहाग की।</p>
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		<title>शादीशुदा पुरुष का दूसरी महिला के साथ रहना अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
		<link>https://www.groundtalk.in/bharat/allahabad-high-court-live-in-relationship-married-man-not-crime/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[विश्वजीत कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 27 Mar 2026 14:50:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[live in relationship law india]]></category>
		<category><![CDATA[marriage and live in law india]]></category>
		<category><![CDATA[इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला लिव-इन रिलेशनशिप पर]]></category>
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		<category><![CDATA[वयस्कों का साथ रहना कानून]]></category>
		<category><![CDATA[शादीशुदा पुरुष लिव इन रिलेशनशिप]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>शुक्रवार का दिन था। अदालत में एक ऐसा मामला सुनवाई के लिए आया, जो सिर्फ एक कपल की</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>शुक्रवार का दिन था। अदालत में एक ऐसा मामला सुनवाई के लिए आया, जो सिर्फ एक कपल की कहानी नहीं था, बल्कि समाज और कानून के बीच खड़ी उस रेखा की पहचान भी था, जिसे अक्सर लोग मिलाकर देख लेते हैं।</p>



<p>यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, तो इसके लिए उसके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून और सामाजिक नैतिकता को अलग-अलग समझना जरूरी है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">शाहजहांपुर से शुरू हुई यह कानूनी लड़ाई</h2>



<p>मामला उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर का है। महिला की मां ने इस संबंध का विरोध करते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद कपल ने केस रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया और रिट याचिका दाखिल की।</p>



<p>शिकायत में महिला की मां ने आरोप लगाया कि उनकी बेटी के साथ रह रहा पुरुष पहले से शादीशुदा है और उसने उनकी बेटी का विवाह के लिए अपहरण किया है। उन्होंने इसे अपराध बताते हुए उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की।</p>



<h2 class="wp-block-heading">अदालत की नजर में कानून बनाम सामाजिक नैतिकता</h2>



<p>हालांकि, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से साथ रह रहे हैं, तो इसे केवल नैतिक आधार पर अपराध नहीं माना जा सकता।</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>जस्टिस जे जे मुनिर और तरुण सक्सेना की डिवीजन बेंच ने कहा <strong>&#8220;समाज की नजर में कोई रिश्ता गलत हो सकता है, लेकिन अदालत का दायित्व है कि वह उसे कानून के दायरे में देखकर फैसला करे और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे।&#8221;</strong></p>
</blockquote>



<h2 class="wp-block-heading">जब कोर्ट ने पुलिस और परिवार दोनों को दी चेतावनी</h2>



<p>कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यदि किसी रिश्ते में कोई आपराधिक तत्व नहीं है, तो केवल सामाजिक नैतिकता के आधार पर किसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए और स्पष्ट निर्देश दिए कि कपल के खिलाफ किसी प्रकार की कठोर कार्रवाई न की जाए।</p>



<p>अदालत ने यह भी आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को फिलहाल गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, कोर्ट ने महिला के परिवार को कड़ी चेतावनी दी। अदालत ने कहा कि परिवार का कोई भी सदस्य कपल को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाएगा। उन्हें यह भी निर्देश दिया गया कि वे न तो कपल के घर में प्रवेश करें और न ही फोन, मैसेज या किसी तीसरे व्यक्ति के जरिए उनसे संपर्क करने की कोशिश करें।</p>



<h2 class="wp-block-heading">एक फैसला, जो अधिकारों की बात करता है</h2>



<p>इस फैसले के जरिए हाई कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि वयस्कों को अपनी पसंद से जीवन जीने का अधिकार है और कानून इस अधिकार की रक्षा करता है, भले ही समाज की राय इससे अलग क्यों न हो।</p>
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		<title>आस्था की गूंज: कोडुंगल्लूर भरणी का अनसुना सच</title>
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		<dc:creator><![CDATA[सत्यम मिश्रा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Mar 2026 07:54:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धरोहर संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Bharani paattu meaning]]></category>
		<category><![CDATA[Devi possession story]]></category>
		<category><![CDATA[Foreign vlogger trance India]]></category>
		<category><![CDATA[Indian temple mystery]]></category>
		<category><![CDATA[Kerala temple trance ritual]]></category>
		<category><![CDATA[Kodungallur Bhagavathy temple ritual]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अंधेरे की एक अपनी लय होती है, और जब वह लय केरल के त्रिशूर जिले में स्थित कोडुंगल्लूर</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>अंधेरे की एक अपनी लय होती है, और जब वह लय केरल के त्रिशूर जिले में स्थित कोडुंगल्लूर मंदिर की लाल दीवारों से टकराती है, तो वह एक आदिम चीख में बदल जाती है। मार्च की उमस भरी एक दोपहर, जब सूरज ताड़ के पेड़ों के पीछे छिपने की कोशिश कर रहा था, एक विदेशी व्लॉगर का कैमरा एक ऐसी घटना को कैद कर गया जिसने डिजिटल दुनिया में &#8216;तार्किकता&#8217; और &#8216;चमत्कार&#8217; के बीच की बहस को फिर से जिंदा कर दिया। वह व्लॉगर, जो शायद सिर्फ एक <strong>&#8216;कलरफुल इंडिया&#8217;</strong> की रील बनाने आई थी, अचानक खुद उस आदिम ऊर्जा का हिस्सा बन गई जिसे स्थानीय लोग <strong>&#8216;देवी का प्रवेश&#8217;</strong> कहते हैं।</p>



<p>लेकिन क्या यह सिर्फ एक वीडियो की वायरल क्लिप है? या फिर यह उस अनसुलझे रहस्य का एक सिरा है जिसे हम आधुनिकता की चकाचौंध में भूल चुके हैं?</p>



<h2 class="wp-block-heading">आदिम चेतना का आह्वान: कोमरम और उनकी तलवारें</h2>



<p>कोडुंगल्लूर भरणी उत्सव कोई सामान्य धार्मिक जलसा नहीं है। यह सभ्यता के उस दौर की याद दिलाता है जहाँ धर्म अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव था। यहाँ &#8216;कोमरम&#8217; (Oracles) होते हैं- लाल कपड़ों में लिपटे पुरुष और महिलाएं, जिनके हाथों में दरांती जैसी तलवारें होती हैं और गले में भारी घुंघरू।</p>



<p>जब ये कोमरम मंदिर के चारों ओर दौड़ते हैं और अपनी ही तलवारों से अपने माथे पर प्रहार करते हैं, तो बहता हुआ रक्त कोई डरावना दृश्य नहीं, बल्कि समर्पण की चरम पराकाष्ठा बन जाता है। वह विदेशी व्लॉगर इसी <strong>&#8216;रक्त और आस्था&#8217;</strong> के चक्रव्यूह के बीच खड़ी थी। चेरमान पेरुमल के काल से चली आ रही यह परंपरा बताती है कि भक्ति सिर्फ शांत बैठना नहीं है; यह एक विस्फोट है। व्लॉगर का उस ऊर्जा में खो जाना (Trance) असल में मानव मस्तिष्क की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ संगीत की थाप, मंत्रों का शोर और सामूहिक हिस्टीरिया मिलकर व्यक्ति की व्यक्तिगत पहचान को मिटा देते हैं।</p>



<h2 class="wp-block-heading">&#8216;भरणी पाट्टू&#8217;: वह गालियाँ जो पवित्र हैं</h2>



<p>इस उत्सव का सबसे विवादित और दिलचस्प पहलू है <strong>&#8216;भरणी पाट्टू&#8217;</strong>&#8211; यानी देवी को दी जाने वाली गालियाँ। सुनने में यह किसी भी सभ्य समाज के लिए विचलित करने वाला हो सकता है, लेकिन कोडुंगल्लूर की मिट्टी में इन गालियों का अर्थ अलग है। समाजशास्त्री इसे <strong>&#8216;कैथार्सिस&#8217;</strong> (Catharsis) कहते हैं। मन के भीतर दबी हुई कुंठाओं और क्रोध को बाहर निकालने का एक जरिया।</p>



<p>हजारों साल पहले, जब जातिवाद और सामाजिक बेड़ियाँ बहुत सख्त थीं, तब यह उत्सव निचली जातियों के लिए एक <strong>&#8216;सेफ्टी वाल्व&#8217;</strong> की तरह था। वे मंदिर के गर्भगृह की ओर पत्थर फेंकते थे और देवी को ऐसी भाषा में संबोधित करते थे जो आम दिनों में वर्जित थी। वह व्लॉगर जब वहां पहुंची, तो उसने सिर्फ एक विदेशी चेहरे को नहीं देखा, बल्कि उसने उस सामूहिक मुक्ति को महसूस किया। जब हज़ारों लोग एक साथ चिल्लाते हैं, तो वह आवाज केवल शोर नहीं रहती, वह एक कंपन बन जाती है जो किसी के भी अवचेतन मन को झकझोर सकती है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">कैमरे के पीछे की मनोवैज्ञानिक सच्चाई</h2>



<p>इंटरनेट पर लोग पूछ रहे हैं- <strong>&#8220;क्या उस विदेशी महिला के शरीर में सच में देवी आई थी?&#8221;</strong></p>



<p>विज्ञान इसे <strong>&#8216;Dissociative State&#8217;</strong> या <strong>&#8216;Trance&#8217;</strong> कह सकता है, जहाँ व्यक्ति बाहरी उत्तेजनाओं (जैसे ढोल की तेज आवाज और सामूहिक नृत्य) के कारण अपनी सुध-बुध खो देता है। लेकिन ग्राउंड टॉक के नजरिए से देखें तो यह सवाल ही गलत है। सवाल यह नहीं है कि क्या वह देवी थी, सवाल यह है कि कोडुंगल्लूर की वह &#8216;ऊर्जा&#8217; कितनी वास्तविक है कि वह सात समंदर पार से आए एक ऐसे व्यक्ति को भी घुटनों पर ले आती है जिसका उस संस्कृति से कोई पुराना नाता नहीं था।</p>



<p>यह घटना दिखाती है कि मनुष्य के भीतर एक ऐसा हिस्सा आज भी जीवित है जो तर्क (Logic) से नहीं, बल्कि स्पंदन (Vibration) से संचालित होता है। वह व्लॉगर उस पल में कोई पर्यटक नहीं थी; वह एक माध्यम बन गई थी उस पुरानी कहानी को दोहराने का, जो कहती है कि प्रकृति के कुछ रहस्य कैमरे के लेंस से ज्यादा गहरे होते हैं।</p>



<h2 class="wp-block-heading">सामाजिक समरसता और रक्त का तिलक</h2>



<p>कोडुंगल्लूर मंदिर का इतिहास <strong>&#8216;कन्नगी&#8217;</strong> की कहानी से जुड़ा है। वही कन्नगी जिसने अन्याय के खिलाफ पूरा मदुरै शहर जला दिया था। यहाँ की देवी कोमल नहीं हैं; वे उग्र हैं, वे न्यायप्रिय हैं। उत्सव के दौरान &#8216;कावु थींडल&#8217; की रस्म होती है, जहाँ मंदिर को अशुद्ध करने का एक प्रतीकात्मक नाटक किया जाता है ताकि उसे फिर से शुद्ध किया जा सके।</p>



<p>यह विरोधाभास ही भारत की असली पहचान है। जहाँ एक तरफ हम 5G और AI की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ हमारे पास कोडुंगल्लूर जैसे स्थान हैं जो हमें याद दिलाते हैं कि हम अपनी जड़ों से कितने करीब हैं। वह विदेशी व्लॉगर जब वहां पहुंची, तो उसने अनजाने में उस <strong>&#8216;ग्लोबल विलेज&#8217;</strong> की अवधारणा को सच कर दिया, जहाँ डर, विस्मय और श्रद्धा की कोई भाषा नहीं होती।</p>



<h2 class="wp-block-heading">&#8216;ग्राउंड टॉक&#8217; का नजरिए: परंपरा बनाम तार्किकता</h2>



<p>अक्सर हम ऐसी घटनाओं को या तो <strong>&#8216;अंधविश्वास&#8217;</strong> कहकर खारिज कर देते हैं या फिर <strong>&#8216;चमत्कार&#8217;</strong> मानकर पूजने लगते हैं। लेकिन सत्य इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है। कोडुंगल्लूर भरणी उत्सव एक जीवित संग्रहालय है- मानव व्यवहार का, विद्रोह का और अटूट विश्वास का।</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>जब वह महिला व्लॉगर उस भीड़ के बीच बेसुध हुई, तो वह किसी धर्म का प्रचार नहीं कर रही थी। वह उस <strong>&#8216;कलेक्टिव अनकॉन्शियस&#8217;</strong> (सामूहिक अवचेतन) का हिस्सा बन रही थी जिसकी बात मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग ने की थी। यह लेख उन पाठकों के लिए है जो सतह से नीचे उतरकर देखना चाहते हैं। जो यह समझना चाहते हैं कि क्यों आज भी, आधुनिक चिकित्सा और विज्ञान के युग में, एक इंसान को अपनी आस्था साबित करने के लिए तलवारों और लहू की जरूरत पड़ती है।</p>
</blockquote>



<p>कोडुंगल्लूर की वह दोपहर सिर्फ एक वायरल वीडियो नहीं थी, वह एक आईना थी। उस आईने में व्लॉगर ने शायद खुद को देखा, और हमने उस आदिम शक्ति को, जिसे हम आज भी पूरी तरह समझने का दावा नहीं कर सकते। यह उत्सव हमें सिखाता है कि कुछ चीजें देखने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए होती हैं- चाहे आप हाथ में आईफोन लिए एक व्लॉगर हों या हाथ में तलवार लिए एक कोमरम।</p>
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		<title>जानी शिकार: 12 साल में एक रात जब औरतों ने संभाली सत्ता</title>
		<link>https://www.groundtalk.in/ground-talk-special/jani-shikar-jharkhand-women-hunting-tradition-story/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[सत्यम मिश्रा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Mar 2026 07:39:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Ground Talk स्पेशल]]></category>
		<category><![CDATA[Jharkhand culture]]></category>
		<category><![CDATA[Jharkhand Jani Shikar]]></category>
		<category><![CDATA[Sigi Dai Kaili Dai story]]></category>
		<category><![CDATA[Tribal women power India]]></category>
		<category><![CDATA[Women Hunting Festival India]]></category>
		<category><![CDATA[आदिवासी परंपरा जनी शिकार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>इतिहास की किताबें अक्सर राजाओं की वीरता और सेनापतियों के विजय अभियानों से भरी होती हैं, लेकिन भारत</p>
<p>The post <a href="https://www.groundtalk.in/ground-talk-special/jani-shikar-jharkhand-women-hunting-tradition-story/">जानी शिकार: 12 साल में एक रात जब औरतों ने संभाली सत्ता</a> appeared first on <a href="https://www.groundtalk.in">Ground Talk</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>इतिहास की किताबें अक्सर राजाओं की वीरता और सेनापतियों के विजय अभियानों से भरी होती हैं, लेकिन भारत के दिल यानी झारखंड के घने जंगलों के बीच एक ऐसी कहानी दबी हुई है, जो रोंगटे खड़े कर देती है। यह कहानी किसी कागज़ पर नहीं, बल्कि आदिम समाज की नसों में दौड़ती है। एक ऐसी परंपरा, जो हर 12 साल में एक बार जी उठती है। इसे दुनिया <strong><a href="https://cm.jharkhand.gov.in/jani-shikaar" type="link" id="https://cm.jharkhand.gov.in/jani-shikaar">&#8216;जनी शिकार&#8217;</a></strong> के नाम से जानती है।</p>



<p>कल्पना कीजिए एक ऐसी सुबह की, जहाँ सूरज की पहली किरण के साथ ही गाँव की हवा बदल जाए। जहाँ चूल्हे की आग शांत हो पर औरतों की आँखों में प्रतिशोध और शौर्य की ज्वाला हो। जहाँ पुरुष घर की दहलीज के भीतर सिमट जाएँ और स्त्रियाँ मर्दाना लिबास पहनकर, हाथों में कुल्हाड़ी और तीर-धनुष लिए जंगलों की ओर कूच कर दें। यह कोई फिल्म का सेट नहीं, बल्कि एक जीवंत विरासत है।</p>



<h2 class="wp-block-heading"><strong>रोहतासगढ़ की वो रात: जब मुगलों के पसीने छूट गए</strong></h2>



<p>इस कहानी की जड़ें सैकड़ों साल पीछे, बिहार के रोहतासगढ़ किले तक जाती हैं। उस वक्त मुगलों का शासन था और उनकी नज़र आदिवासियों के अभेद्य किले पर थी। मुगल सेना ने कई बार हमला किया, लेकिन उरांव योद्धाओं के आगे उनकी एक न चली। आखिर में मुगलों ने एक कायराना चाल चली। उन्हें पता चला कि &#8216;सरहुल&#8217; के त्यौहार के बाद उरांव पुरुष नशे और थकान में डूबे होते हैं। उन्होंने उसी रात हमले की योजना बनाई।</p>



<p>किले के भीतर सन्नाटा था। पुरुष गहरी नींद में थे। लेकिन तभी दो परछाइयां जागीं- <strong>सिगी दई और कइली दई</strong>। इन दो युवतियों ने भांप लिया कि मौत दरवाजे पर खड़ी है। वक्त नहीं था कि सोए हुए मर्दों को जगाया जाए। उन्होंने तुरंत फैसला लिया। गाँव की अन्य महिलाओं को इकट्ठा किया गया, मर्दों की पगड़ियाँ बांधी गईं, उनके कपड़े पहने गए और चेहरे पर कालिख मली गई ताकि अँधेरे में वे पुरुष लगें।</p>



<p>जब मुगल सेना किले के भीतर घुसी, तो उनका सामना एक ऐसी फौज से हुआ जो बिजली की तरह टूट पड़ी। मुगलों को लगा कि उरांव पुरुष जाग गए हैं। वे बुरी तरह हारकर पीछे हटे। ऐसा एक बार नहीं, तीन बार हुआ। लेकिन चौथी बार, एक धोखेबाज़ ने मुगलों को बता दिया कि जो लड़ रहे हैं, वे मर्द नहीं बल्कि औरतें हैं। जब तक भेद खुला, तब तक सिगी दई और कइली दई ने अपनी वीरता से इतिहास के पन्नों पर अपना नाम खून से लिख दिया था। &#8216;जनी शिकार&#8217; इसी अदम्य साहस का उत्सव है।</p>



<h2 class="wp-block-heading"><strong>12 साल का सन्नाटा और फिर वो तूफ़ान</strong></h2>



<p>जनी शिकार हर साल नहीं मनाया जाता। इसके पीछे एक गहरा दर्शन है। यह 12 साल में एक बार आता है, ठीक उसी तरह जैसे कुंभ का मेला। गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि 12 साल का यह अंतराल उस पीढ़ी को तैयार करने का समय है, जो अपनी जड़ों को भूल न जाए।</p>



<p>जब 12 साल पूरे होते हैं, तो पहाड़ों और जंगलों में एक खास तरह की हलचल शुरू हो जाती है। पाहन (गाँव का पुजारी) मुनादी करवाता है। गाँव की महिलाएं अपने पुराने बक्सों से मर्दों के कुर्ते और धोती निकालती हैं। कुल्हाड़ियों की धार तेज़ की जाती है। इस दिन का इंतज़ार किसी उत्सव से ज्यादा एक &#8216;मिशन&#8217; की तरह होता है। माँ अपनी बेटी को बताती है कि कैसे सिगी दई ने तलवार पकड़ी थी, और दादी अपनी पोती को सिखाती है कि जंगल में बिना आवाज़ किए कैसे चला जाता है।</p>



<h2 class="wp-block-heading"><strong>शुरू होता है &#8216;रणचंडी&#8217; का अवतार</strong></h2>



<p>शिकार वाले दिन का नज़ारा किसी को भी हैरत में डाल सकता है। सुबह-सुबह महिलाएं नहा-धोकर तैयार होती हैं, लेकिन उनके श्रृंगार में काजल या बिंदी नहीं होती। वे माथे पर साफा बांधती हैं, हाथ में लाठी या तलवार लेती हैं और ढोल-नगाड़ों की थाप पर &#8216;अखड़ा&#8217; (गाँव का सार्वजनिक स्थल) पर जमा होती हैं।</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p>यहाँ से शुरू होता है <strong><a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9D%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%80_%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0#%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0" type="link" id="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9D%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%80_%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0#%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0">&#8216;जनी शिकार&#8217;</a></strong> का जुलूस। ये महिलाएं एक गाँव से दूसरे गाँव की ओर बढ़ती हैं। रास्ते में जो भी जानवर भेड़, बकरी या मुर्गा दिखता है, उसका शिकार किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि जिस गाँव की महिलाएं गुजरती हैं, उस गाँव के पुरुष उन्हें रोक नहीं सकते। वे अपनी छतों या दरवाजों के पीछे से चुपचाप इस मंजर को देखते हैं। यह उस दिन की याद दिलाता है जब पुरुषों की गैर-मौजूदगी में औरतों ने समाज की कमान संभाली थी।</p>
</blockquote>



<p>यह शिकार केवल भोजन के लिए नहीं है। यह एक प्रतीकात्मक संदेश है कि &#8220;अगर हमारे अस्तित्व पर आंच आई, तो हम संहार करना भी जानती हैं।&#8221; जंगल की झाड़ियों के बीच से गुजरती हुई इन महिलाओं की कतार किसी सेना की टुकड़ी जैसी लगती है। उनके लोकगीतों में युद्ध की ललकार होती है और कदमों में गज़ब की फुर्ती।</p>



<h2 class="wp-block-heading"><strong>अधिकार, सत्ता और सामूहिकता का संगम</strong></h2>



<p>जनी शिकार का सबसे खूबसूरत पहलू इसका सामाजिक ढांचा है। एक गाँव की महिलाएं जब शिकार करते हुए दूसरे गाँव पहुँचती हैं, तो वहां की महिलाएं उनका स्वागत करती हैं। वे उन्हें पानी पिलाती हैं, उनके पैर धोती हैं और फिर खुद भी उस जुलूस में शामिल हो जाती हैं। यह &#8216;सिस्टरहुड&#8217; या नारी शक्ति का वो रूप है जिसे मॉडर्न फेमिनिज्म आज तलाश रहा है।</p>



<p>रास्ते में जो भी जानवर शिकार किया जाता है, उसका मालिक कोई विरोध नहीं करता। उसे पता है कि यह 12 साल का कर्ज है जो उसे चुकाना है। यह आदिम साम्यवाद (Primitive Communism) का उदाहरण है, जहाँ सब कुछ सबका है और जीत पूरे समाज की है।</p>



<p>शाम होते-होते जब ये महिलाएं वापस अपने गाँव लौटती हैं, तो पूरा गाँव अखड़ा पर इकट्ठा होता है। जो शिकार किया गया है, उसे सामूहिक रूप से पकाया जाता है। लकड़ियों के बड़े-बड़े लट्ठे जलाए जाते हैं, माँस पकने की खुशबू हवाओं में तैरती है और मांदर की गूँज सात पहाड़ों के पार तक सुनाई देती है। उस रात कोई भूखा नहीं सोता। उस रात कोई खुद को कमतर नहीं समझता।</p>



<h2 class="wp-block-heading"><strong>क्या यह सिर्फ एक &#8216;हंटिंग गेम&#8217; है?</strong></h2>



<p>बाहरी दुनिया के लिए यह शायद एक क्रूर परंपरा लग सकती है, लेकिन गहराई से देखें तो यह <strong>&#8216;इको-सिस्टम&#8217;</strong> और <strong>&#8216;सांस्कृतिक प्रतिरोध&#8217;</strong> का हिस्सा है। आदिवासी कभी भी अपनी ज़रूरत से ज्यादा शिकार नहीं करते। वे जानते हैं कि जंगल को कैसे बचाना है। जनी शिकार में भी वे नियमों का पालन करते हैं। यह जंगलों पर अपने दावे को पुख्ता करने का एक तरीका है।</p>



<p>आदिवासी समाज में महिलाएं हमेशा से पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर रही हैं- चाहे वो खेती हो या वनोपज इकट्ठा करना। लेकिन जनी शिकार उन्हें एक दिन के लिए &#8216;शासक&#8217; बना देता है। यह दिन उन्हें याद दिलाता है कि वे केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उस सुरक्षा चक्र की धुरी हैं जिसने मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक को इस मिट्टी से खदेड़ा था।</p>



<h2 class="wp-block-heading"><strong>बदलते दौर की परछाइयां</strong></h2>



<p>आज जब हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, झारखण्ड के इन दुर्गम इलाकों में भी बदलाव की लहरें पहुँच रही हैं। नई पीढ़ी की लड़कियां जीन्स पहनकर कॉलेज जा रही हैं, हाथ में लैपटॉप है। लेकिन जब जनी शिकार का साल आता है, तो वही लड़कियां लैपटॉप छोड़कर हाथ में टांगी (कुल्हाड़ी) उठा लेती हैं। यह उनकी पहचान का सवाल है।</p>



<p>शहरों में रहने वाले लोग शायद इसे एक अजीबोगरीब &#8216;कल्ट&#8217; समझें, लेकिन उन महिलाओं से पूछिए जिनकी आँखों में उस दिन एक अजीब सी चमक होती है। वे उस दिन अपनी महान पूर्वजों सिगी दई और कइली दई की आत्मा को खुद के भीतर महसूस करती हैं। वे जानती हैं कि जब तक यह परंपरा ज़िंदा है, उनकी बहादुरी की कहानी कोई मिटा नहीं पाएगा।</p>



<p>रात का अँधेरा गहरा रहा है। मांदर की थाप अब धीमी पड़ चुकी है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से भी पुरानी यह संस्कृति एक बार फिर सो जाने को तैयार है- अगले 12 सालों के लिए। लेकिन उन औरतों के पैरों के निशान अभी भी जंगल की पगडंडियों पर ताज़ा हैं। वे निशान गवाह हैं कि इस दुनिया में एक ऐसी भी जगह है, जहाँ साल में एक बार ही सही, पर &#8216;शक्ति&#8217; अपने असली और आदिम रूप में प्रकट होती है।</p>



<p>अगली बार जब आप झारखण्ड की पहाड़ियों से गुजरें और हवा में किसी अनजान जड़ी-बूटी या शिकार के पकने की खुशबू आए, तो समझ जाइएगा कि यह मिट्टी आज भी अपनी बेटियों की वीरता का जश्न मना रही है।</p>
<p>The post <a href="https://www.groundtalk.in/ground-talk-special/jani-shikar-jharkhand-women-hunting-tradition-story/">जानी शिकार: 12 साल में एक रात जब औरतों ने संभाली सत्ता</a> appeared first on <a href="https://www.groundtalk.in">Ground Talk</a>.</p>
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