15000 km Kanwar Yatra of NK Raja from Samastipur
बिहार के समस्तीपुर जिले में एक छोटा सा गांव है- बटहा। इसी गांव की गलियों से निकला एक युवक आज पूरे देश में चर्चा का विषय बन चुका है।
नाम है निशेष कुमार (राजा), जिन्हें सोशल मीडिया पर लोग ‘NK Raja बिहारवाला’ के नाम से जानते हैं।
लेकिन यह कहानी किसी ट्रैवल ब्लॉगर या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की नहीं है। यह कहानी है उस संकल्प की, जो पसीने से नहीं, आस्था और देशभक्ति के जज्बे से लिखा जा रहा है।
एक पुराना सफर, लेकिन इस बार संकल्प और बड़ा
आपको जानकर हैरानी होगी कि लंबी यात्राएं NK Raja ‘बिहारवाला’ के लिए नई नहीं हैं। इससे पहले वे साइकिल से 12 ज्योतिर्लिंग, चार धाम और दुर्गम पंच केदार की यात्रा कर चुके हैं। सुल्तानगंज से केदारनाथ तक की पैदल कांवर यात्रा भी वे पहले ही पूरी कर चुके हैं।
लेकिन इस बार की यात्रा सिर्फ धार्मिक नहीं, भावनात्मक और राष्ट्रीय है।

15,000 KM की यात्रा, शहीदों के नाम
4 दिसंबर 2025 को सुल्तानगंज से गंगाजल उठाते वक्त उनके मन में सिर्फ अपनी मुक्ति की कामना नहीं थी।इस बार का संकल्प भारतीय शहीद जवानों और अहमदाबाद प्लेन क्रैश में जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि देने का है।
यह 15,000 किलोमीटर की पैदल यात्रा- न किसी प्रचार के लिए है, न किसी रिकॉर्ड के लिए। यह सफर है देश के नाम।
ओडिशा की तपती सड़कें और अगला पड़ाव
फिलहाल, NK Raja ओडिशा की सड़कों पर अपने कदम बढ़ा रहे हैं। लक्ष्य है- 14 फरवरी तक जगन्नाथ पुरी पहुंचना और वहां जल अर्पण करना।
इसके बाद यात्रा बढ़ेगी आंध्र प्रदेश के नंद्याल जिला, जहां स्थित है भगवान शिव का पावन ज्योतिर्लिंग- मल्लिकार्जुन।
ओडिशा से मल्लिकार्जुन तक का सफर पैदल तय करने में 3 से 4 महीने का वक्त लगेगा। लेकिन जिनके इरादे पहाड़ जैसे मजबूत हों, उनके लिए दूरी सिर्फ आंकड़ा बन जाती है।

12 ज्योतिर्लिंग, नेपाल और फिर घर वापसी
इस महायात्रा का लक्ष्य सिर्फ दक्षिण भारत नहीं है। NK Raja ‘बिहारवाला’ सभी 12 ज्योतिर्लिंगों में जल अर्पण करेंगे। इसके बाद वे नेपाल स्थित पशुपतिनाथ मंदिर पहुंचेंगे।
और अंत में- अपने ही जिले समस्तीपुर के थानेश्वर स्थान में जल अर्पण कर इस ऐतिहासिक यात्रा का समापन करेंगे।
क्यों खास है यह यात्रा?
आज जब 2 किलोमीटर के लिए भी लोग गाड़ी ढूंढते हैं। वहां 15,000 किलोमीटर पैदल चलना अपने आप में क्रांति है।
- मिट्टी से जुड़ाव: समस्तीपुर जैसे ग्रामीण इलाके से निकलकर यह साहस दिखाना,बताता है कि बिहार की मिट्टी में आज भी संघर्ष जिंदा है।
- शहीदों को सम्मान: यह यात्रा मन्नत नहीं,बल्कि देश के जवानों को समर्पित एक मौन श्रद्धांजलि है।
- सांस्कृतिक एकता: बिहार से दक्षिण भारत और फिर नेपाल तक की यह यात्राभारत की आत्मा को जोड़ती है।
संघर्ष, जो तस्वीरों में नहीं दिखता
पैदल यात्रा रोमांचक लगती है, लेकिन हकीकत में यह रोज़ की लड़ाई है- मौसम से, शरीर से और हालात से।
सोशल मीडिया पर दिखती मुस्कान के पीछे छाले, थकान और अकेलापन भी है। जिसे समझना हर किसी के बस की बात नहीं।

एक चलता-फिरता संदेश
NK Raja ‘बिहारवाला’ की यह यात्रा उन युवाओं के लिए जवाब है, जो छोटी मुश्किलों में हार मान लेते हैं।
जब वे लौटेंगे, तो सिर्फ तीर्थयात्री नहीं होंगे- वे श्रद्धा, सेवा और देशभक्ति का चलता-फिरता इतिहास होंगे।
