समस्तीपुर की आयुर्वेद वैद्य बैद्यनाथी दादी
बिहार के समस्तीपुर जिले में गंगा और बूढ़ी गंडक के बीच बसी उपजाऊ मिट्टी ने हमेशा से विद्वानों और साधकों को जन्म दिया है। इसी मिट्टी में सन 1920 के दशक (अनुमानित 1922-1924) के आस-पास एक ऐसी कन्या का जन्म हुआ, जिसे नियति ने करोड़ों लोगों के दुखों का हरण करने के लिए चुना था। उनका बचपन समस्तीपुर के एक साधारण किसान परिवार में बीता, जहाँ औषधियों का ज्ञान किताबी नहीं, बल्कि दादा-परदादाओं की मौखिक परंपरा से मिला था।
वह भोर की पहली किरण और झोले में बंद जड़ी-बूटियाँ
बैद्यनाथी दादी का जीवन किसी तपस्या से कम नहीं था। वे जब जवान हुईं और उनका विवाह उजियारपुर क्षेत्र के पास के एक गांव में हुआ, तब तक उनके पास जड़ी-बूटियों का वह अथाह भंडार जमा हो चुका था, जिसे आज के बड़े-बड़े आयुर्वेद संस्थान भी तरसते हैं। उनके बारे में कहा जाता था कि वे केवल हवा की नमी और मिट्टी की गंध सूंघकर बता देती थीं कि इस साल कौन सी बीमारी फैलने वाली है।
सुबह की पहली किरण फूटने से पहले ही, जब गांव के लोग गहरी नींद में होते थे, दादी चौर (मैदानी इलाकों) और बगीचों में निकल पड़ती थीं। वे पौधों से बात करती थीं। उनका मानना था कि अगर आप किसी पौधे को बिना अनुमति और बिना सम्मान के उखाड़ते हैं, तो उसकी औषधि मर जाती है। वे ‘सहदेई’, ‘भृंगराज’, ‘भूमि-आंवला’ और ‘गिलोय’ जैसी दुर्लभ बूटियों को बड़ी श्रद्धा से चुनतीं और अपने पुराने सूती थैले में भरकर घर लाती थीं।
हर घर की ‘देसी’ डॉक्टर और महामारी की योद्धा
समस्तीपुर का वह दौर ऐसा था जब चेचक (बड़ी माता), हैजा और कालाजार जैसे रोगों का खौफ छाया रहता था। अस्पताल मीलों दूर थे और सड़कें कच्ची। ऐसे में बैद्यनाथी दादी एक चलता-फिरता अस्पताल थीं।
- निदान की कला: वे मरीज की केवल तीन उंगलियों से नब्ज थामती थीं। यदि किसी को पीलिया (Jaundice) होता, तो वे उसे किसी खास जड़ का रस पिलाती थीं और परहेज का ऐसा सख्त अनुशासन बताती थीं कि मरीज कुछ ही दिनों में चंगा हो जाता।
- हड्डियों का जोड़: जड़ी-बूटियों के अलावा, उन्हें टूटी हुई हड्डियों को बैठाने का भी अद्भुत ज्ञान था। बिना किसी एक्सरे के, वे अपनी उंगलियों के स्पर्श से समझ जाती थीं कि हड्डी कहाँ से चटकी है। बांस की खपच्चियों और औषधीय तेलों के लेप से वे अपाहिज होने की कगार पर खड़े लोगों को अपने पैरों पर खड़ा कर देती थीं।
स्वच्छता का वह मौन आंदोलन
जब 1960 और 70 के दशक में ग्रामीण इलाकों में स्वच्छता का अभाव था, तब दादी ने एक अलख जगाई थी। वे केवल बीमार का इलाज नहीं करती थीं, बल्कि बीमारी की जड़ पर प्रहार करती थीं। वे घर-घर जाकर महिलाओं को समझाती थीं कि कुएं के पास पानी जमा न होने दें। वे कहती थीं, “मिट्टी और पानी अगर शुद्ध हैं, तो शरीर कभी अशुद्ध नहीं होगा।”
महामारी के समय, जब लोग अपनों को छोड़कर भाग जाते थे, तब यह बूढ़ी महिला नीम की टहनियों और विशेष धुआं (हवन जैसा) जलाकर घरों को जीवाणु मुक्त करती थी। उनके लिए ‘छुआछूत’ का मतलब जाति नहीं, बल्कि गंदगी थी। उन्होंने स्वच्छता को धर्म से जोड़ दिया था ताकि लोग डर के बजाय श्रद्धा से अपने परिवेश को साफ रखें।
मौन सेवा: जहाँ ‘फीस’ शब्द का वजूद न था
आज के दौर में चिकित्सा एक व्यापार है, लेकिन बैद्यनाथी दादी के लिए यह एक ‘ऋण’ था- धरती माँ का ऋण। उन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी किसी से एक धेला तक नहीं लिया।
“प्रकृति की दवा पर सबका हक है। अगर मैं इसे बेचूँगी, तो विधाता मुझसे यह हुनर छीन लेगा।”
यह उनके शब्द थे। कई बार संपन्न जमींदार उन्हें चांदी के सिक्के या अनाज की बोरियां भेंट करना चाहते थे, लेकिन वे केवल उतना ही लेती थीं जिससे उनका और उनके परिवार का रूखा-सूखा गुजारा हो सके। अक्सर वे गरीबों के घर से केवल एक लोटा पानी पीकर ही संतुष्ट हो जाती थीं। उनकी यह निस्वार्थ सेवा ही थी जिसने उन्हें ‘इंसान’ से ‘संस्था’ बना दिया।
समस्तीपुर की गलियों में वह अंतिम विदाई
समय का चक्र चलता रहा और बैद्यनाथी दादी की उम्र ढलने लगी। उनके हाथ कांपने लगे थे, लेकिन उनकी याददाश्त और नब्ज पहचानने की शक्ति अंत तक वैसी ही रही। सन 2005-2006 के आसपास, जब ठंड की एक ठिठुरती सुबह समस्तीपुर के खेतों पर कोहरा छाया हुआ था, इस महान ‘वैद्य’ ने अपनी अंतिम सांस ली।
उनकी मृत्यु की खबर जैसे ही फैली, आसपास के दर्जनों गांवों में चूल्हा नहीं जला। उजियारपुर, दलसिंहसराय और सरायरंजन के हजारों लोग उस ‘मिट्टी की मसीहा’ को अंतिम विदाई देने उमड़ पड़े। लोग रो रहे थे- इसलिए नहीं कि एक बूढ़ी महिला चली गई, बल्कि इसलिए कि उनके पास से वह ‘सुरक्षा कवच’ छिन गया था जो हर आधी रात को उनके सिरहाने खड़ा रहता था।
एक विस्मृत विरासत का सन्नाटा
आज बैद्यनाथी दादी की वह सिल-बट्टा शायद किसी कोने में धूल फांक रही होगी, या शायद उनके वंशजों ने उसे कहीं संभाल कर रखा होगा। लेकिन सबसे बड़ा नुकसान उस ज्ञान का हुआ जो उनके साथ ही चला गया। उन्होंने अपनी विद्या को किसी किताब में नहीं लिखा, क्योंकि वे मानती थीं कि यह विद्या ‘पात्र’ (सही व्यक्ति) को देखकर सिखाई जाती है, कागजों पर नहीं।
समस्तीपुर के बुजुर्ग आज भी नीम के पेड़ के नीचे बैठकर उनकी चर्चा करते हैं। वे बताते हैं कि कैसे एक मामूली सी दिखने वाली महिला, जिसके पास न कोई लैब थी न कोई स्टेथोस्कोप, सिर्फ अपनी रूहानी ताक़त और मिट्टी की समझ से यमराज के द्वार से मरीजों को खींच लाती थी।
वे पारंपरिक ‘स्वास्थ्य रक्षक’ थीं, जो बिना किसी पुरस्कार की चाह के, बिना किसी नाम की लालसा के, चुपचाप अपना काम करती रहीं। उनकी कहानी समस्तीपुर की उन तमाम गुमनाम नायक-नायिकाओं की प्रतिनिधि है, जिन्होंने आधुनिक चिकित्सा के आने से पहले भारत के गांवों को बचाए रखा।
