Khadi Wale Gandhi – Braj Mohan Sharma Samastipur
क्या आपने कभी सोचा है कि असली देशभक्ति कैसी दिखती होगी? क्या वो ऊंचे मंचों पर दिए गए भाषणों में है, या फिर उस खामोश ज़िंदगी में, जो बिना किसी शोर के दूसरों के लिए समर्पित कर दी गई? आज जब हम ‘देश सेवा’ को किसी पद या पावर से जोड़कर देखते हैं, तब समस्तीपुर की मिट्टी से निकले एक ऐसे इंसान की याद आती है जिसने आज़ादी के बाद सत्ता की कुर्सी नहीं, बल्कि गाँव की धूल भरी पगडंडियों को चुना।
आज ‘ग्राउंड टॉक’ पर कहानी उस शख्स की, जिसे दुनिया ब्रज मोहन शर्मा के नाम से जानती थी, लेकिन समस्तीपुर के बुजुर्गों के लिए वे आज भी बस ‘शर्मा जी’ हैं।
सरायरंजन की गलियाँ और वो फकीर मन
ब्रज मोहन शर्मा जी का जन्म 1924 के आसपास समस्तीपुर जिले के सरायरंजन प्रखंड के एक बेहद साधारण किसान परिवार में हुआ था। उस दौर में जब देश आज़ादी के जुनून में जल रहा था, सरायरंजन का यह किशोर अपनी आँखों में एक अलग ही सपना पाले हुए था। वे गांधी जी के विचारों से इतने प्रभावित थे कि छोटी सी उम्र में ही खादी और चरखे को अपना साथी बना लिया।
सोचिए, उस समय की जवानी कैसी रही होगी? जहाँ एक तरफ अंग्रेजों की बंदूकों का खौफ था, वहीं दूसरी तरफ शर्मा जी जैसे युवाओं का जज्बा। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ और शर्मा जी समस्तीपुर की सड़कों पर उतर आए। उन्हें जेल में डाला गया, अंग्रेजों की लाठियां सहीं, लेकिन उनका इरादा नहीं डिगा।
आज़ादी मिली, पर वे सत्ता के पीछे नहीं भागे
15 अगस्त 1947 को जब देश आज़ाद हुआ, तो कई क्रांतिकारी राजनीति में चले गए, बड़े-बड़े मंत्री बन गए। लेकिन ब्रज मोहन शर्मा जी ने कुछ और ही सोचा था। वे वापस अपने सरायरंजन लौट आए। उनका मानना था कि असली आज़ादी तब तक नहीं आएगी जब तक गाँव का आखिरी आदमी आत्मनिर्भर नहीं हो जाता।
उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी खादी और ग्रामोद्योग के नाम कर दी। सरायरंजन के खादी भंडार में जब वे चरखा चलाते थे, तो वो सिर्फ सूत नहीं कातते थे, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए एक आदर्श बुनते थे। उन्होंने ताउम्र सिर्फ हाथ से सिली हुई खादी पहनी। उनके पास न कोई बंगला था, न कोई गाड़ी। कंधे पर एक पुराना झोला, आंखों पर चश्मा और मन में गांधीवादी विचार—यही उनकी कुल जमा-पूंजी थी।
सेवा के बदले इनाम कैसा?
एक पत्रकार के तौर पर मुझे उनकी ज़िंदगी का सबसे भावुक हिस्सा वो लगता है जब उन्होंने सरकारी सुविधाओं को ठुकरा दिया था। कई बार लोगों ने उनसे कहा कि वे स्वतंत्रता सेनानी पेंशन या अन्य सरकारी सुविधाओं के लिए फॉर्म भरें, पर उनका जवाब दिल जीत लेने वाला था। वे कहते थे, “मैंने भारत माँ की सेवा अपनी खुशी के लिए की है, इसके बदले में सरकार से पैसे लेकर अपनी सेवा का मोल नहीं लगा सकता।”
आज के दौर में जहाँ लोग एक छोटे से काम का क्रेडिट लेने के लिए होड़ मचाते हैं, वहां ब्रज मोहन शर्मा जैसे लोग किसी अजूबे से कम नहीं लगते। उन्होंने सरायरंजन और आसपास के इलाकों में दलित बस्तियों में जाकर काम किया, छुआछूत के खिलाफ लड़े और शिक्षा की अलख जगाई। वे अक्सर पैदल ही निकल जाते थे, क्योंकि उनका मानना था कि जब तक आप ज़मीन पर नहीं चलेंगे, तब तक लोगों का दुख-दर्द नहीं समझ पाएंगे।
खामोश विदाई और एक सूनापन
समय बीतता गया और समस्तीपुर का यह ‘सफेद गांधी’ धीरे-धीरे बूढ़ा होने लगा, लेकिन उनकी वैचारिक मज़बूती वैसी ही रही। अंततः 12 दिसंबर 2012 को सरायरंजन की उसी मिट्टी ने अपने इस महान सपूत को हमेशा के लिए अपनी गोद में सुला लिया। उनके जाने के साथ ही समस्तीपुर के एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया।
अफ़सोस की बात यह है कि आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम ऐसे नायकों को भूलते जा रहे हैं। आज जब हम सरायरंजन से गुजरते हैं, तो शायद ही हमें कोई ऐसा स्मारक दिखे जो उनकी महानता को बयां करे। लेकिन अगर आप किसी पुराने खादी भंडार में जाकर बैठें या किसी बुजुर्ग के पास बैठें, तो उनकी बातों में शर्मा जी की सादगी आज भी महकती मिल जाएगी।
ब्रज मोहन शर्मा जी ने हमें सिखाया कि बड़ा बनने के लिए बड़े पद की ज़रूरत नहीं होती, बस एक बड़ा दिल चाहिए। उनकी ज़िंदगी हमें याद दिलाती है कि असली हीरो वो नहीं होते जो इतिहास की किताबों के कवर पेज पर होते हैं, बल्कि वो होते हैं जो चुपचाप समाज की नींव में पत्थर बनकर समा जाते हैं।
आज ‘ग्राउंड टॉक’ के ज़रिए हमारी कोशिश बस इतनी है कि ब्रज मोहन शर्मा जी की वो सादगी, वो खादी वाला झोला और वो निस्वार्थ सेवा का भाव समस्तीपुर के हर युवा के दिल तक पहुँचे। ताकि जब भी कोई सरायरंजन की गलियों से गुजरे, तो उसे याद रहे कि यहाँ कभी एक फकीर रहता था जिसने अपना सब कुछ हमें सौंप दिया और बदले में कुछ नहीं माँगा।
