दशरथ मांझी की कहानी भारत के इतिहास की सबसे प्रेरणादायक गाथाओं में से एक है। बिहार के गया जिले के गहलौर गांव में जन्मे एक गरीब मजदूर ने अपनी पत्नी की मौत के बाद अकेले ही पहाड़ से लड़ने का फैसला किया। 22 वर्षों तक छेनी और हथौड़े से पहाड़ काटकर उन्होंने 55 किलोमीटर की दूरी को सिर्फ 15 किलोमीटर में बदल दिया। गरीबी, भूख और समाज के तानों के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा। उनके इसी अद्भुत संघर्ष और निस्वार्थ सेवा से प्रभावित होकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें सम्मानपूर्वक अपनी कुर्सी पर बैठाया। ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी की यह कहानी आज भी साबित करती है कि सच्चा संकल्प किसी भी असंभव को संभव बना सकता है।
बिहार की तपती धरती और गया जिले के गहलौर की पथरीली वादियों में एक ऐसी कहानी दफन है, जो सदियों तक मानवता को प्रेरित करती रहेगी। यह कहानी है दशरथ मांझी की, जिन्हें दुनिया ‘द माउंटेन मैन’ के नाम से जानती है। अक्सर लोग कहते हैं कि पहाड़ से टकराना पागलपन है, लेकिन दशरथ मांझी ने साबित किया कि अगर संकल्प में शक्ति हो, तो पहाड़ को भी रास्ता देना पड़ता है।
एक त्रासदी जिसने संकल्प को जन्म दिया:
दशरथ मांझी का जन्म 1934 के आसपास एक बेहद गरीब मुसहर परिवार में हुआ था। सामाजिक भेदभाव और गरीबी के बीच उनका जीवन संघर्षपूर्ण था। लेकिन उनके जीवन का सबसे काला दिन 1959 में आया। उनकी पत्नी, फाल्गुनी देवी, पहाड़ के संकरे रास्ते से उनके लिए खाना ला रही थीं, तभी उनका पैर फिसला और वे गंभीर रूप से घायल हो गईं। गहलौर गाँव और निकटतम अस्पताल के बीच विशाल गहलौर पहाड़ खड़ा था। अस्पताल पहुँचने के लिए 55 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता था। समय पर इलाज न मिलने के कारण फाल्गुनी देवी ने दम तोड़ दिया। इसी शोक ने दशरथ मांझी के भीतर एक ऐसी आग जलाई जिसने इतिहास रच दिया। उन्होंने ठान लिया- “जो पहाड़ मेरे प्यार के बीच आया, उसे मैं खत्म कर दूँगा।”
22 साल, एक छेनी और एक हथौड़ा: असंभव को संभव बनाना
1960 में जब दशरथ मांझी ने पहाड़ पर पहली चोट की, तो गाँव वालों ने उन्हें ‘पागल’ करार दिया। उनके पास न तो बड़ी मशीनें थीं और न ही सरकारी सहयोग। उनके पास थी तो बस एक छेनी, एक हथौड़ा और अटूट इच्छाशक्ति।

डेटा पर आधारित कार्य का विवरण:
समय: 1960 से 1982 तक (लगातार 22 वर्ष)।
कार्य: 360 फीट लंबी, 30 फीट चौड़ी और 25 फीट ऊँची चट्टान को काटना।
परिणाम: वज़ीरगंज और अत्री के बीच की दूरी 55 किमी से घटकर मात्र 15 किमी रह गई।
तपती धूप हो या कड़कड़ाती ठंड, दशरथ मांझी ने कभी हार नहीं मानी। यहाँ तक कि भीषण सूखे के दौरान जब उनके पास खाने को कुछ नहीं था, तब भी वे जंगली घास और गंदा पानी पीकर पहाड़ का सीना चीरते रहे।
जब मुख्यमंत्री ने छोड़ दी अपनी कुर्सी:
सम्मान की पराकाष्ठा दशरथ मांझी का संघर्ष केवल पत्थरों से नहीं, बल्कि व्यवस्था से भी था। वे अपनी मांगों को लेकर पैदल चलकर दिल्ली तक गए थे। उनके निस्वार्थ भाव का सबसे बड़ा प्रमाण 2006 में देखने को मिला। जब वे पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ‘जनता दरबार’ में पहुँचे, तो मुख्यमंत्री ने उनके सम्मान में अपनी आधिकारिक मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी और दशरथ मांझी को उस पर बैठा दिया। यह भारतीय राजनीति का एक दुर्लभ क्षण था, जहाँ सत्ता ने एक साधारण मजदूर के श्रम के आगे शीश झुकाया था। इसी सम्मान के बाद गहलौर घाटी की सड़क को पक्का करने और क्षेत्र में विकास की नींव रखी गई।
तकनीकी और सामाजिक विश्लेषण: क्यों खास थे ‘मांझी’?
एक पत्रकार और डॉक्यूमेंट्री मेकर के नजरिए से देखें, तो दशरथ मांझी का काम केवल पत्थर काटना नहीं था। उन्होंने बिना किसी इंजीनियरिंग डिग्री के ‘अलाइनमेंट’ का सटीक ध्यान रखा ताकि वहां से न केवल लोग बल्कि एम्बुलेंस भी आसानी से निकल सके। इसके अलावा, उन्होंने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी आवाज उठाई। वे ‘मुसहर’ समुदाय से थे, जो उस समय बेहद हाशिए पर था। उनके काम ने साबित किया कि बदलाव के लिए किसी पद या प्रतिष्ठा की जरूरत नहीं, बस एक साफ इरादे की जरूरत है। उनका प्रसिद्ध नारा, “जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं”, आज संघर्ष का वैश्विक मंत्र बन चुका है।
विरासत और वर्तमान स्थिति:
17 अगस्त 2007 को पित्ताशय के कैंसर (Gallbladder Cancer) के कारण इस महामानव का निधन हो गया। बिहार सरकार ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी। उनके जीवन पर ‘मांझी: द माउंटेन मैन’ जैसी फिल्में बनीं, जिसने उनकी कहानी को सात समंदर पार तक पहुँचाया। आज भी गहलौर में वह रास्ता मौजूद है, जो दशरथ मांझी के बलिदान की गवाही देता है। हालाँकि, आज भी उनके परिवार की आर्थिक स्थिति और उस क्षेत्र में सुविधाओं की कमी एक बड़ा सवाल है। क्या हम केवल उनकी कहानी सुनकर रुक जाएंगे, या उनके जैसे जज्बे को अपने काम में उतारेंगे?
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