राम लगन बाबू – देसी बीज संरक्षण के सच्चे प्रहरी
समस्तीपुर | कल्याणपुर प्रखंड का एक छोटा सा गाँव, विशनपुर। धूल भरी सड़कें, खेतों की सोंधी खुशबू और दूर तक फैली हरियाली। यहाँ की हवाओं में आज भी एक ऐसे इंसान की रूह बसती है, जिसे दुनिया ने शायद भुला दिया, लेकिन मिट्टी उसे आज भी याद करती है। वह शख्स, जिसने बीजों की भाषा सीखी थी, जिसने लुप्त होती फसलों के कानों में अपनी साँसें फूँकी थीं। लोग उन्हें राम लगन बाबू कहते थे- किसानों का वो ‘बीज-मित्र’ जो हाइब्रिड के शोर में अपनी जड़ों को बचाने के लिए ताउम्र लड़ता रहा।
जब हाइब्रिड का ‘जहर’ घरों में दाखिल हुआ
कहानी शुरू होती है साठ के दशक के उत्तरार्ध में। वह दौर ‘हरित क्रांति’ का था। चारों तरफ शोर था- ज्यादा उपज, ज्यादा मुनाफा। बाजार रंगीन पैकेटों में बंद चमकीले बीजों से भर गया था। किसान खुश थे कि अब बोरियां जल्दी भरेंगी, लेकिन राम लगन बाबू की अनुभवी आँखें कुछ और ही देख रही थीं। वे देख रहे थे कि इन नए बीजों के साथ खेतों में रसायनों का जहर घुल रहा है। वे देख रहे थे कि सदियों से चली आ रही ‘मर्चा चावल’ की महक और ‘तिलकुट धान’ की मिठास गायब हो रही है।
एक दिन खेत की मेड़ पर बैठे राम लगन बाबू ने अपने हमजोली किसानों से कहा था, “ये जो बीज तुम बाजार से ला रहे हो, ये फसल नहीं, गुलामी की जंजीरें हैं। ये मिट्टी की कोख को बंजर कर देंगे।” उस वक्त लोगों ने उन्हें पागल समझा, पर वे जानते थे कि विरासत को बचाना ही असली विकास है।
साइकिल की सवारी और बीजों का सफर
राम लगन बाबू ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी पुरानी साइकिल उठाई और निकल पड़े समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर और दरभंगा के गाँवों की खाक छानने। उनका मिशन अजीब था- वे उन बुजुर्ग किसानों को ढूंढते थे जिनके पास आज भी दादा-परदादा के समय के पुराने बीज बचे हों।
कभी किसी के घर से दो मुट्ठी ‘मर्चा चावल’ मिला, तो कभी किसी कोठली के कोने से पुरानी अरहर। वे इन बीजों को अपने घर लाते, उन्हें बच्चों की तरह सहेजते और अपने छोटे से खेत में उन्हें फिर से जीवन देते। उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था बनाई जो आज के ‘सीड बैंक’ से कहीं ज्यादा मानवीय थी। वे किसानों को बीज देते और कहते, “पैसे मत देना, बस जब फसल कट जाए तो दो मुट्ठी बीज मुझे वापस कर देना, ताकि मैं किसी और की थाली में ये स्वाद पहुंचा सकूं।”
‘मर्चा चावल’ की वो खोई हुई खुशबू
राम लगन बाबू का सबसे बड़ा संघर्ष था बिहार की पहचान- ‘मर्चा चावल’ को बचाना। काली मिर्च जैसा दिखने वाला यह छोटा सा दाना जब पकता था, तो पूरे टोले में महक फैल जाती थी। हाइब्रिड की रेस में यह लगभग खत्म हो चुका था। राम लगन बाबू ने इसे न केवल बचाया, बल्कि गाँवों में फिर से बोने की प्रेरणा दी।
आज जब मर्चा चावल को ‘GI Tag’ मिलता है और दुनिया भर में इसकी चर्चा होती है, तो हमें उस बूढ़े इंसान की याद आनी चाहिए जिसने अपनी फटी हुई धोती की खूँट में बांधकर इन बीजों को मरने से बचाया था। वे कहते थे, “बीज सिर्फ अनाज नहीं होता, वह हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद है।”
वैज्ञानिकों के ‘मौन शिक्षक’
मजे की बात यह थी कि राम लगन बाबू के पास कोई बड़ी डिग्री नहीं थी, लेकिन पूसा (डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय) के वैज्ञानिक भी उनकी समझ का लोहा मानते थे। वे अक्सर वैज्ञानिकों से उलझ जाते थे। वे पूछते थे, “साहब, आपके लैब वाले बीज बाढ़ में क्यों सड़ जाते हैं? मेरा देसी बीज पंद्रह दिन पानी में डूबा रहे तब भी सर उठाकर खड़ा रहता है।” उनके पास मिट्टी की वो तासीर थी जिसे कोई माइक्रोस्कोप नहीं देख सकता था।
अंतिम समय और अधूरा सपना
साल 2010 के आसपास, जब यह ‘बीज ऋषि’ हमेशा के लिए सो गया, तो विशनपुर की मिट्टी ने अपने सबसे सच्चे बेटे को खो दिया। उनके जाने के साथ ही वो ‘जीता-जागता पुस्तकालय’ भी शांत हो गया। आज उनकी वो ‘बीज कोठियां’ शायद धूल खा रही होंगी, या शायद उनके परिवार ने उन्हें सहेज कर रखा हो, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या हमने उनके संघर्ष को समझा?
आज हम ‘ऑर्गेनिक खेती’ का महंगा लेबल लगाकर जो अनाज खरीदते हैं, राम लगन बाबू ने उसके लिए दशकों पहले अपनी चप्पलें घिस दी थीं। उन्होंने कभी कोई पुरस्कार नहीं मांगा, कभी किसी अखबार की हेडलाइन नहीं बनना चाहा। उन्हें बस इस बात की फिक्र थी कि आने वाली पीढ़ियां कहीं ‘बेस्वाद’ अनाज खाने को मजबूर न हो जाएं।
एक रिपोर्टर की आख़िरी बात
दोस्तों, राम लगन बाबू केवल एक किसान नहीं थे, वे एक विचार थे। एक ऐसा विचार जो हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने को कहता है। आज जब हम समस्तीपुर की सड़कों से गुजरें और खेत लहलहाते देखें, तो याद रखना कि उन खेतों की रगों में जो देसी खून दौड़ रहा है, उसमें कहीं न कहीं राम लगन बाबू का पसीना मिला हुआ है।
वह इंसान तो चला गया, पर क्या हम उनके बचाए हुए उन बीजों को अपनी थाली में जगह दे पाएंगे? क्या हम फिर से उस ‘मर्चा चावल’ की महक को अपने आंगन में लौटा पाएंगे? राम लगन बाबू की सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम किसान को सिर्फ ‘अन्नदाता’ न समझें, बल्कि उसे मिट्टी का वैज्ञानिक मानें।
