सत्तू और कानून के सहारे किसानों के रक्षक - रामलषण सिंह
वो साठ का दशक रहा होगा। समस्तीपुर कचहरी के बाहर इमली के उस पुराने पेड़ के नीचे एक शख्स अक्सर बैठा दिखाई देता था। बदन पर एक साधारण सा धोती-कुर्ता, पैरों में घिसी हुई चप्पलें और बगल में दबा एक पुराना चमड़े का झोला। उस झोले में दो ही चीजें सबसे कीमती थीं- एक ‘बटाईदारी कानून’ की मोटी किताब और दूसरी एक कपड़े में बंधी सत्तू की पोटली।
जब उस दौर के बड़े-बड़े नामी वकील मुवक्किलों से नोटों की गड्डियां गिन रहे होते थे। तब ये शख्स किसी गरीब किसान के फटे हुए पुराने कागजों को चश्मा ठीक करते हुए बड़ी बारीकी से देख रहा होता था। लोग उन्हें ‘रामलषण बाबू’ कहते थे। उनका मेहनताना क्या था? बस दो मुट्ठी सत्तू और एक लोटा ताजा पानी। वे अक्सर हंसकर कहते थे, “जब पेट भरा हो और नीयत साफ हो, तो कानून खुद-ब-खुद इंसाफ का रास्ता दिखा देता है।”
जब ‘खतियान’ किसानों की ढाल बना
उस दौर के बिहार के गाँवों में एक अजीब सा सन्नाटा और खौफ हुआ करता था। आजादी तो मिल गई थी, जमींदारी प्रथा भी कागजों पर खत्म हो चुकी थी, लेकिन दबंगई वैसी ही थी। अनपढ़ किसानों को डरा-धमकाकर या धोखे से अंगूठा लगवाकर उनकी पुरखों की जमीनें हथिया लेना रोज का काम था। रातों- रात पीढ़ियों से जोत रहे खेत किसी और के नाम चढ़ जाते थे और किसान अपनी ही मिट्टी पर ‘अतिक्रमी’ बना दिया जाता था।
ऐसे अंधेरे समय में रामलषण बाबू एक मशाल की तरह उभरे। उन्हें कानून की ऐसी गहरी समझ थी कि वो ज़मीन के असली हकदार को उसकी फटी हुई रसीदों से पहचान लेते थे। वे डरे हुए किसान के कंधे पर हाथ रखकर कहते, “अरे पगले, रो मत! ये देख खतियान, इसमें तेरे दादा का नाम दर्ज है। ये मिट्टी तेरी है, और ये किताब इसकी गवाही दे रही है।”
वे घंटों बैठकर उन किसानों की ‘अर्जी’ तैयार करते थे। उनकी लिखावट में एक ऐसी कशिश और ईमानदारी होती थी कि जब वह कागज जज के सामने पहुँचता था, तो उसमें से पसीने और मिट्टी की खुशबू आती थी। वे कोर्ट के भीतर खड़े होकर बड़ी-बड़ी दलीलें नहीं देते थे, लेकिन कोर्ट के बाहर ऐसी कानूनी बिसात बिछाते थे कि बड़े से बड़ा जमींदार भी तकनीकी पेंच में फंसकर रह जाता था।
गाँव-गाँव घूमता एक ‘चलता-फिरता पुस्तकालय’
उनका कार्यक्षेत्र केवल कचहरी की चारदीवारी नहीं थी। वे एक ‘भ्रमणशील पाठशाला’ थे। शिवाजीनगर और उसके आस-पास के गाँवों में जब उनकी पुरानी साइकिल की घंटी बजती थी, तो दूर खेतों में काम कर रहे किसानों को भरोसा हो जाता था कि उनका ‘रक्षक’ आ गया है। वे किसी बरगद की छाँव में बैठ जाते और गाँव वालों को उनके अधिकार समझाते।
वह दौर ऐसा था जब आम आदमी पुलिस और कचहरी के नाम से कांपता था। रामलषण बाबू ने उस डर की जड़ें काट दीं। उन्होंने किसानों को सिखाया कि रसीद क्या होती है, लगान का क्या मतलब है और अगर कोई तुम्हारी मेहनत की फसल लूट ले, तो कैसे कानूनी तरीके से उसे अपनी दहलीज पर वापस लाना है। उन्होंने कभी किसी से एक पैसा नहीं मांगा। लोग अक्सर भावुक होकर कहते, “बाबू, कुछ तो ले लीजिए।” तो वे अपना वही झोला खोलकर दिखा देते और कहते, “सत्तू है मेरे पास, बस थोड़ा नमक और प्याज मिल जाए तो बादशाह हूँ मैं।”
एक फकीर, जिसने बेघरों को घर दिलाए
उनकी जिंदगी का सबसे मार्मिक पहलू ये था कि उन्होंने दूसरों के घरों और खेतों की रक्षा में अपनी पूरी उम्र गला दी, लेकिन खुद के लिए कभी कोई पक्का मकान नहीं बनाया। वे एक आधुनिक ‘फकीर’ थे। शाम को जब वे थक-हारकर वापस लौटते, तो उनके चेहरे पर थकावट नहीं, बल्कि एक रूहानी सुकून होता था। वह सुकून, जो किसी गरीब की आँखों में अपनी खोई हुई ज़मीन वापस पाने की खुशी देखकर मिलता है।
समस्तीपुर की कचहरी में आज भी कुछ पुराने मुंशी मिल जाएंगे जो किस्से सुनाते हैं कि कैसे एक बार एक बड़े रसूखदार ने उन्हें मोटी रकम देकर खरीदने की कोशिश की थी। रामलषण बाबू ने एक शब्द नहीं कहा, बस अपनी सत्तू की पोटली बांधी, अपना झोला उठाया और वहां से चल दिए। उनकी वह ‘चुप्पी’ उस रसूखदार के अहंकार पर सबसे करारा तमाचा थी।
सादगी का वह आखिरी सफर
रामलषण बाबू का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं था, बल्कि एक भरोसे का टूट जाना था। जब वे इस दुनिया से विदा हुए, तो उनके पीछे कोई बैंक बैलेंस नहीं था, कोई धन-दौलत नहीं थी। लेकिन अगर कुछ था, तो वह था हज़ारों किसानों की आँखों का पानी और वह अटूट विश्वास कि इंसाफ सिर्फ अमीरों की जागीर नहीं है।
आज भी जब शिवाजीनगर के किसी खेत की मेड़ पर दो किसानों के बीच हक की बात होती है, तो किसी न किसी बुजुर्ग की जुबान पर उनका नाम जरूर आता है। वे कोई बड़े नामचीन वकील नहीं थे, वे तो बस एक ऐसे इंसान थे। जिन्होंने सत्तू की ताकत और कानून की सच्चाई को मिलाकर एक ऐसा इतिहास लिख दिया। जिसे समस्तीपुर की मिट्टी कभी नहीं भूलेगी। उनका वह पुराना झोला आज भले ही कहीं ओझल हो गया हो, लेकिन उनका संघर्ष आज भी हर उस किसान की मुस्कान में जिंदा है। जिसकी ज़मीन को उन्होंने उजड़ने से बचाया था।
