Royal Kanyadaan by Omprakash Kushwaha in Samastipur
आज के दौर में, जब ज़्यादातर लोग अपनी ज़मीन, प्रॉपर्टी और बैंक बैलेंस बढ़ाने की दौड़ में लगे हैं। उसी दौर में बिहार के समस्तीपुर से एक ऐसी कहानी सामने आती है, जो दिल को छू जाती है।
एक ऐसा शख्स, जो अपनी मेहनत की कमाई उन बेटियों की खुशियों पर लुटा देता है। जिन्हें वह जानता तक नहीं।
हम बात कर रहे हैं मोरवा प्रखंड के हुसैनीपुर गाँव के रहने वाले ओमप्रकाश कुशवाहा जी की।
पेशे से वह एक चर्चित प्रॉपर्टी डीलर हैं, लेकिन दिल से वह हर उस बेबस पिता के लिए सहारा बनना चाहते हैं। जिसके पास अपनी लाडली के हाथ पीले करने के लिए साधन नहीं होते।
एक वादा, जो इबादत बन गया
साल 2024…
8 मार्च का दिन…
पूरा देश महाशिवरात्रि की भक्ति में डूबा हुआ था।
उसी दिन समस्तीपुर की धरती पर कुछ ऐसा हो रहा था, जिसने इंसानियत पर भरोसा और मज़बूत कर दिया।
ओमप्रकाश जी ने उस दिन 31 कन्याओं के सामूहिक विवाह का संकल्प लिया था।

लेकिन जैसे-जैसे मदद की पुकार बढ़ती गई, वैसे-वैसे संख्या भी बढ़ती गई।
31 बेटियाँ… फिर 35…
और ओमप्रकाश जी?
उन्होंने एक कदम भी पीछे नहीं हटाया।
सीना और चौड़ा किया और हर बेटी को पूरे सम्मान के साथ विदा किया।
अब, 15 फरवरी 2026 को, एक बार फिर हुसैनीपुर की मिट्टी उसी पवित्र उत्सव की गवाह बनने जा रही है।
इस बार संकल्प और भी बड़ा है—51 कन्याओं का सामूहिक विवाह।
न चंदा, न सरकार—सिर्फ़ खुद की जेब और नेक नीयत
अक्सर ऐसे बड़े आयोजनों के पीछे राजनीतिक दलों या सरकारी योजनाओं का नाम जुड़ा होता है।
लेकिन यहाँ कहानी बिल्कुल अलग है।
ओमप्रकाश कुशवाहा न किसी नेता के आगे हाथ फैलाते हैं,
न ही किसी सरकारी योजना का इंतज़ार करते हैं।
यह पूरा आयोजन उनकी अपनी गाढ़ी कमाई से होता है। उनका साफ़ कहना है- अगर ईश्वर ने सामर्थ्य दिया है, तो उसका सही इस्तेमाल किसी मजबूर पिता की आँखों से आँसू पोंछने में होना चाहिए।
शादी नहीं, एक बाप का अरमान
इसे सिर्फ़ “सामूहिक विवाह” कहना शायद कम होगा।
ओमप्रकाश जी इसे एक उत्सव की तरह मनाते हैं।
यहाँ शादियाँ औपचारिक नहीं होतीं।
यहाँ वही रस्में निभती हैं, वही भावनाएँ होती हैं, और वही अपनापन महसूस होता है,
जो एक पिता अपनी सगी बेटी की शादी में करता है।
हज़ारों लोगों के लिए छप्पन भोग का इंतज़ाम, भव्य सजावट, और माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए नामी कलाकारों की प्रस्तुति, सब कुछ पूरी तरह ‘रॉयल’।
वह नहीं चाहते कि किसी बेटी के मन में यह टीस रह जाए कि उसकी शादी किसी मजबूरी में हुई।
वह चाहते हैं कि हर बेटी को वही सम्मान और खुशी मिले, जो किसी अमीर घर की शादी में मिलती है।

हुसैनीपुर से इंसानियत का संदेश
आज मोरवा का यह छोटा सा गाँव चर्चा का केंद्र बन चुका है।
ओमप्रकाश कुशवाहा ने यह साबित कर दिया है कि समाज बदलने के लिए न पद चाहिए, न कुर्सी।
बस एक साफ़ नीयत और बड़ा दिल काफ़ी होता है।
एक प्रॉपर्टी डीलर के रूप में उन्होंने कई मकान बनवाए होंगे,
लेकिन एक इंसान के रूप में उन्होंने कई परिवारों का घर बसाया है।
उनकी यह पहल उन कुरीतियों पर करारा प्रहार है,
जो बेटियों को बोझ समझती हैं।
वह समाज को यह संदेश दे रहे हैं कि
बेटियाँ बोझ नहीं,
बल्कि ईश्वर का दिया हुआ वह आशीर्वाद हैं,
जिनके सम्मान के लिए पूरी दुनिया को साथ खड़ा होना चाहिए।
दुआओं का सफर
15 फरवरी 2026 को,
जब 51 जोड़े अग्नि के सात फेरे लेंगे,
तो ओमप्रकाश कुशवाहा के चेहरे पर जो संतोष होगा,
वह किसी भी प्रॉपर्टी डील से मिलने वाले मुनाफ़े से कहीं बड़ा होगा।
जब 51 बेटियाँ अपने नए घरों के लिए विदा होंगी,
तो उनके साथ ओमप्रकाश जी के लिए
लाखों दुआएँ भी जाएँगी।
समस्तीपुर के मोरवा की गलियों से शुरू हुआ यह सफ़र
अब एक आंदोलन बन चुका है—
एक ऐसा आंदोलन, जो बताता है कि
इंसानियत आज भी ज़िंदा है।
सलाम है ओमप्रकाश कुशवाहा जी के इस जज़्बे को,
जिन्होंने खुद को एक सफल व्यवसायी से ऊपर उठाकर
एक सच्चे निस्वार्थ सेवक के रूप में स्थापित किया है।
