शारदा देवी मंदिर – बिहार का ताजमहल
बिहार की माटी में सिर्फ़ फसलें नहीं उगतीं, यहाँ संघर्ष और संवेदनाओं की ऐसी गाथाएं भी जन्म लेती हैं जो पत्थर को भी मोम कर दें। पूर्वी चंपारण के एक गुमनाम से गाँव ‘भुवन छपरा’ की पगडंडियों पर चलते हुए जब आपकी नज़र 65 फीट ऊँचे एक सफ़ेद शिखर पर पड़ती है, तो पहली बार में यह किसी भव्य देवालय जैसा जान पड़ता है। लेकिन हकीकत में यह ईंट-गारे की कोई इमारत नहीं, बल्कि एक पति के पश्चाताप, कृतज्ञता और उस बेइंतहा मोहब्बत का दस्तावेज़ है, जिसे दुनिया ‘मंदिर’ कह रही है।
यह कहानी बालकिशुन राम की है, पर इसकी रूह उनकी दिवंगत पत्नी शारदा देवी में बसती है। बात तब की है जब बालकिशुन के पास भविष्य के नाम पर सिर्फ़ अंधेरा और हाथों में मजदूरी का फावड़ा था। पिता को खो चुके बालकिशुन के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ ही सबसे बड़ा लक्ष्य था। लेकिन तभी उनकी जिंदगी में शारदा आईं। एक ऐसी स्त्री, जिसने अपने पति के हाथों के छालों को अपनी आँखों की नमी से पढ़ लिया था।
गहने बेचकर पति को पढ़ाया
बालकिशुन पढ़ना चाहते थे, पर गरीबी ने पैरों में बेड़ियाँ डाल रखी थीं। तब शारदा ने वो किया जो आज के दौर में मुमकिन नहीं लगता। उन्होंने अपनी सुहाग की निशानियाँ, अपने चांदी के गहने- जो एक गाँव की औरत के लिए उसका स्त्री-धन और सबसे बड़ा गौरव होते हैं- हंसते-हंसते बेच दिए। उन्होंने बालकिशुन के हाथ से फावड़ा छीनकर थमा दी कलम और किताब। उन्हीं गहनों की राख से बालकिशुन के करियर की मशाल जली। साल 1987 में जब वे पंचायत सचिव बने, तो वह सिर्फ़ एक सरकारी पद नहीं था, बल्कि एक पत्नी के विश्वास की जीत थी।
मजदूर से अधिकारी बनने का सफर
दशकों का साथ रहा, संघर्ष के दिन बीते और खुशहाली ने घर में दस्तक दी। लेकिन नियति का क्रूर हाथ 2022 की एक शाम सब कुछ छीन ले गया। शारदा देवी का साया हमेशा के लिए उठ गया। बालकिशुन के लिए वह घर, वह आंगन, सब बेमानी हो गए। उन्हें बार-बार वह गहने याद आते, जो उनकी पढ़ाई के लिए बिक गए थे। उन्हें वह त्याग याद आता जिसने एक मजदूर को ‘अधिकारी’ बनाया था।
रिटायरमेंट के बाद जब हाथ में करीब 60-65 लाख रुपये आए, तो समाज ने उम्मीद की होगी कि बालकिशुन अब आराम की जिंदगी जिएंगे, या बच्चों के लिए शहर में कोठियां बनाएंगे। लेकिन बालकिशुन के भीतर एक बेचैनी थी। उन्हें लगा कि जिस औरत ने अपना सब कुछ मुझ पर वार दिया, उसे मैं क्या लौटा पाया? उन्होंने तय किया कि वे अपनी पत्नी को एक मंदिर में बिठाएंगे- एक ऐसा स्थान जहाँ काल की गति भी उनकी यादों को मिटा न सके।
पत्नी के नाम पर बना मंदिर
तीन साल तक निर्माण चला। एक-एक ईंट रखने में बालकिशुन ने अपनी उम्र भर की यादें पिरोईं। आज जब वह मंदिर बनकर तैयार है, तो गाँव के लोग इसे ‘बिहार का ताजमहल’ कहते हैं। लेकिन बालकिशुन के लिए यह ताजमहल नहीं, एक कर्ज की अदायगी है। मंदिर के गर्भगृह में जब वे अपनी पत्नी की आदमकद प्रतिमा के सामने खड़े होते हैं, तो उनकी आँखें आज भी उसी तरह डबडबा जाती हैं जैसे साढ़े तीन दशक पहले उन गहनों के बिकने पर हुई होंगी।
मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर जब बालकिशुन शून्य में ताकते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे वे आज भी शारदा से पूछ रहे हों- “क्या अब तुम्हारा कर्ज उतर गया?” पर शायद वे भी जानते हैं कि दुनिया की कोई भी दौलत, कोई भी मंदिर, उस चांदी की पायल की जगह नहीं ले सकता जिसे बेचकर उनके हाथों में पहली किताब आई थी।
पत्रकार की कलम से
भुवन छपरा का यह देवालय गवाह है कि प्रेम अगर सच्चा हो, तो वह महलों का मोहताज नहीं होता, बल्कि समर्पण के पत्थरों से भी खड़ा किया जा सकता है। शाम के धुंधलके में जब मंदिर के शिखर पर दीप जलता है, तो वह सिर्फ़ उजाला नहीं करता, बल्कि उस मरमिटने वाले प्रेम की गवाही देता है जो मौत के बाद भी ज़िंदा है।
