जयपुर। प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की ताजा रिपोर्ट सामने आई है। इसके अनुसार, देश में कुत्तों के काटने (डॉग बाइट) के मामलों में बीते दो वर्षों में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि वर्ष 2022 में जहां 21,89,909 मामले सामने आए थे। वहीं 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 37,15,713 तक पहुंच गया है। जो लगभग दोगुना है।
नमन मिश्रा की रिपोर्ट
गुजरात, असम और केरल में चौंकाने वाली बढ़ोतरी
रिपोर्ट के अनुसार गुजरात में वर्ष 2022 में डॉग बाइट के 1,69,363 मामले दर्ज किए गए थे। जो 2024 में बढ़कर 3,92,837 हो गए। वहीं, असम में यह संख्या 39,919 से बढ़कर 1,66,232 तक पहुंच गई। यानी चार गुना से अधिक की वृद्धि हुई। इस दौरान, सबसे ज्यादा उछाल केरल में देखने को मिला। जहां 2022 में सिर्फ 4,000 मामले दर्ज थे। लेकिन 2024 में यह आंकड़ा 1,15,046 तक पहुंच गया, जो करीब 28 गुना ज्यादा है।
महाराष्ट्र टॉप पर, तमिलनाडु दूसरे स्थान पर
इसके अलावा पीआईबी की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में सबसे ज्यादा डॉग बाइट के मामले महाराष्ट्र में दर्ज किए गए। जहां कुल 4,85,345 घटनाएं सामने आईं। इसके बाद, तमिलनाडु में 4,80,927 मामले दर्ज हुए। गुजरात 3,92,837 मामलों के साथ तीसरे, कर्नाटक 3,61,494 मामलों के साथ चौथे और बिहार 2,63,930 मामलों के साथ पांचवें स्थान पर रहा।
राजस्थान में भी बढ़ता डॉग बाइट ग्राफ
हालांकि, राजस्थान में भी कुत्तों के काटने के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 की तुलना में 2023 में डॉग बाइट के मामलों में 17.61 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जबकि 2023 के मुकाबले 2024 में यह बढ़ोतरी 35.74 प्रतिशत तक पहुंच गई। वहीं देशभर में 2022 की तुलना में कुल मामलों में 39.39 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। जबकि 2023 के मुकाबले 2024 में 21.73 प्रतिशत का इजाफा हुआ।
रेबीज से मौतें भी बढ़ीं
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डॉग बाइट के साथ-साथ रेबीज से होने वाली मौतों की संख्या में भी इजाफा दर्ज किया गया है। परिणामस्वरूप, रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में रेबीज से 21 लोगों की मौत हुई थी। जो 2023 में बढ़कर 50 हो गई। वर्ष 2024 में रेबीज के कारण 54 लोगों की जान गई। जबकि 27 फरवरी 2025 तक एक मौत दर्ज की जा चुकी है। महाराष्ट्र में बीते दो वर्षों से हर साल रेबीज के कारण 14 लोगों की मौत हो रही है।
बच्चे सबसे ज्यादा शिकार
रिपोर्ट्स के मुताबिक, डॉग बाइट के शिकार होने वालों में 20 प्रतिशत से अधिक बच्चे 15 वर्ष की उम्र तक के हैं। इस वजह से यह स्थिति बेहद चिंताजनक मानी जा रही है। क्योंकि बच्चे अक्सर अनजाने में कुत्तों के पास चले जाते हैं, और खतरे को समझ नहीं पाते।
क्यों बढ़ रहे हैं कुत्तों के हमले
इसकी एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि, अधिकतर डॉग अटैक स्ट्रीट डॉग्स द्वारा किए जाते हैं। इसके अलावा, गंदा भोजन, कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनके व्यवहार में बदलाव को प्रमुख कारण माना जा रहा है। शहरी इलाकों में खुले कचरे और भोजन के अवशेष भी आक्रामकता को बढ़ाते हैं।
हाई-बीम लाइट और मौसम भी वजह
इसके अलावा, रात के समय सड़कों पर चलने वाली गाड़ियों की हाई-बीम एलईडी लाइट्स से कुत्तों की नींद प्रभावित होती है। जिससे वे चिड़चिड़े और आक्रामक हो जाते हैं। इसी कारण कई बार कुत्ते अचानक वाहनों या राहगीरों पर हमला कर देते हैं। इसके अलावा बरसात के मौसम में भी कुत्तों की आक्रामकता बढ़ जाती है।
कैसे करें बचाव और नियंत्रण
वहीं दूसरी ऑर, डॉग बाइट और रेबीज के मामलों पर नियंत्रण के लिए नगर निगम स्तर पर नियमित वैक्सीनेशन, नसबंदी और स्ट्रीट डॉग्स की देखभाल को जरूरी माना गया है। कॉलोनियों और विकास समितियों को भी इनके खान-पान, स्वास्थ्य और पुनर्वास पर ध्यान देना चाहिए। बीमार या घायल कुत्तों का समय पर इलाज जरूरी है। क्योंकि बीमारी के कारण कुत्ते अधिक आक्रामक हो जाते हैं। बच्चों को स्ट्रीट डॉग्स से दूर रखना और एनजीओ व आमजन के सहयोग से पॉपुलेशन कंट्रोल के प्रयास करने से डॉग बाइट की घटनाओं में बड़ी कमी लाई जा सकती है।
