नमन मिश्रा की रिपोर्ट:
भोपाल। कम आय और बढ़ती जरूरतों के बीच फंसी 35 से 54 वर्ष आयु वर्ग की पीढ़ी, जिसे आमतौर पर ‘सैंडविच जनरेशन’ कहा जाता है, आज गंभीर मानसिक दबाव से गुजर रही है। यह वह वर्ग है जो एक ओर बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारियां निभा रहा है, तो दूसरी ओर बच्चों की पढ़ाई, बेहतर भविष्य और सामाजिक अपेक्षाओं को पूरा करने की जद्दोजहद में लगा है।
महंगाई, बदलती जीवनशैली और सीमित आय के बीच संतुलन बनाना इस पीढ़ी के लिए दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। इसी असंतुलन का सीधा असर उनकी मानसिक सेहत पर दिखने लगा है, जिसके चलते मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
कर्ज में दबा मध्यम वर्ग
आज के समय में अच्छी शिक्षा, सुरक्षित भविष्य और “सम्मानजनक जीवनशैली” का दबाव इतना बढ़ चुका है कि मध्यम वर्ग के लोग अपनी क्षमता से अधिक कर्ज लेने को मजबूर हो रहे हैं। बच्चों की पढ़ाई के लिए महंगे निजी स्कूल, घर और गाड़ी की ईएमआई, पारिवारिक जिम्मेदारियां और रोजमर्रा के खर्च इन सबका बोझ आय से कहीं ज्यादा हो चुका है। आय का बड़ा हिस्सा हर महीने ईएमआई में चला जाता है। बचत की गुंजाइश खत्म होती जा रही है और आपात स्थिति में संभलने का विकल्प भी नहीं बचता। यही आर्थिक असुरक्षा धीरे-धीरे मानसिक तनाव में बदल जाती है।
एक्स्ट्रा जॉब, ज्यादा आय… लेकिन कम जीवन
कर्ज चुकाने और खर्च पूरे करने के लिए इस पीढ़ी के कई लोग अतिरिक्त काम कर रहे हैं। कहीं फ्रीलांसिंग, कहीं पार्ट-टाइम जॉब, तो कहीं व्यापार के साथ दूसरी कमाई के साधन। इससे आय भले बढ़ रही हो, लेकिन इसका खामियाजा निजी जीवन को भुगतना पड़ रहा है। लंबे काम के घंटे, लगातार स्क्रीन टाइम और आराम की कमी के कारण परिवार के साथ बिताया जाने वाला क्वालिटी टाइम लगभग खत्म हो गया है। रिश्तों में दूरी, थकान और चिड़चिड़ापन मानसिक दबाव को और गहरा कर रहा है।
मानसिक तनाव के लक्षण बढ़े
लगातार आर्थिक और सामाजिक दबाव के चलते कई तरह की मानसिक और शारीरिक समस्याएं सामने आ रही हैं। चिंता, घबराहट, नींद न आना, चिड़चिड़ापन और काम में एकाग्रता की कमी आम होती जा रही है। इसके साथ ही ब्लड प्रेशर बढ़ना, एंग्जायटी, सिरदर्द और थकान जैसी समस्याएं भी देखी जा रही हैं। कुछ मामलों में लोग तनाव से राहत पाने के लिए नशे का सहारा लेने लगते हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ जाती है।
सामाजिक दबाव भी बड़ा कारण
सैंडविच जनरेशन पर सिर्फ आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव भी भारी पड़ रहा है। बच्चों के जन्मदिन, पारिवारिक समारोह, शादियां और सामाजिक आयोजनों में “प्रतिष्ठा के अनुसार” खर्च करने की मजबूरी तनाव को कई गुना बढ़ा देती है। इसके अलावा घर और गाड़ी जैसे बड़े फैसले भी अक्सर जरूरत से ज्यादा सामाजिक तुलना के आधार पर लिए जा रहे हैं, जिसका सीधा असर कर्ज और मानसिक शांति पर पड़ता है।
समय पर आय न मिलना, असुरक्षा और बढ़ी
निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों और छोटे व्यापारियों के लिए समय पर आय न मिलना या अनिश्चित कमाई एक बड़ी समस्या बन चुकी है। ऐसे में घरेलू खर्च और ईएमआई चलाने के लिए कई बार मजबूरी में अधिक ब्याज पर उधार लेना पड़ता है। यह वित्तीय अस्थिरता मानसिक दबाव को और गहरा करती है, क्योंकि भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है।
बुजुर्गों की सेहत भी चिंता का कारण
इस पीढ़ी पर वृद्ध माता-पिता के इलाज और देखभाल की जिम्मेदारी भी होती है। निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च बेहद महंगा है और सामाजिक दबाव के कारण लोग वहां इलाज कराने को मजबूर होते हैं। सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं से कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन गंभीर बीमारियों का खर्च आज भी मानसिक तनाव का बड़ा कारण बना हुआ है।
नतीजा: मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा असर
आर्थिक दबाव, सामाजिक अपेक्षाएं और समय की कमी इन सबका सम्मिलित असर सैंडविच जनरेशन की मानसिक सेहत पर पड़ रहा है। तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अनावश्यक कर्ज, सामाजिक तुलना और जीवनशैली का दबाव कम किए बिना इस समस्या से निपटना मुश्किल होगा। मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना, खर्च और आय के बीच यथार्थवादी संतुलन बनाना और सामाजिक दबाव से बाहर निकलना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है।
