इंदौर के राजवाड़ा में रंगपंचमी के अवसर पर निकलती ऐतिहासिक गेर
भारत में होली का त्योहार हर जगह बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। कहीं फूलों की होली खेली जाती है, कहीं लठमार होली की परंपरा है, तो कहीं रंगों और गुलाल से सड़कों पर जश्न मनाया जाता है। लेकिन अगर बात सबसे अनोखे और विशाल रंग उत्सव की हो, तो मध्यप्रदेश का शहर इंदौर सबसे अलग नजर आता है।
इंदौर में होली के पांचवें दिन मनाई जाने वाली रंगपंचमी केवल एक त्योहार नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक अनुभव है। इस दिन शहर में एक भव्य रंग यात्रा निकलती है जिसे ‘गेर’ कहा जाता है। जब यह गेर निकलती है तो ऐसा लगता है मानो पूरा शहर रंगों के समुद्र में डूब गया हो। हजारों लोग सड़कों पर उतर आते हैं, ढोल-नगाड़ों की गूंज होती है, और हवा में उड़ता गुलाल पूरे माहौल को एक अलग ही रंग में रंग देता है। यह परंपरा केवल उत्सव नहीं बल्कि इंदौर की पहचान बन चुकी है।
क्या है ‘गेर’?
मालवा क्षेत्र की बोली में ‘गेर’ शब्द का अर्थ होता है – सामूहिक जुलूस या यात्रा। लेकिन इंदौर की गेर केवल एक जुलूस नहीं है। यह एक ऐसा विशाल उत्सव है जिसमें पूरा शहर शामिल होता है।
रंगपंचमी के दिन सुबह से ही इंदौर के ऐतिहासिक राजवाड़ा क्षेत्र में लोगों की भीड़ जुटनी शुरू हो जाती है। धीरे-धीरे ढोल, बैंड और DJ की धुन पर लोग रंगों के साथ नाचते-गाते जुलूस के रूप में आगे बढ़ते हैं। इस जुलूस में ट्रक, ट्रैक्टर और बड़े टैंकर शामिल होते हैं जिनमें रंग और गुलाल भरा होता है। कई जगहों पर विशेष मशीनों और रंग तोपों के जरिए हवा में गुलाल उड़ाया जाता है। जब हजारों लोग एक साथ रंगों में सराबोर होकर नाचते हैं तो पूरा शहर एक विशाल उत्सव में बदल जाता है।
होल्कर काल से जुड़ी है यह परंपरा
इंदौर की रंगपंचमी की गेर की परंपरा करीब दो सौ साल पुरानी मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार इसकी शुरुआत होल्कर राजवंश के समय हुई थी।
उस समय इंदौर होल्कर शासकों की राजधानी था। त्योहारों के अवसर पर राजा और प्रजा एक साथ उत्सव मनाते थे। होली और रंगपंचमी के दौरान सैनिक, कलाकार और नागरिक ढोल- नगाड़ों के साथ शहर में जुलूस निकालते थे। समय के साथ यह परंपरा और भी भव्य होती गई। आज भी गेर की शुरुआत इंदौर के ऐतिहासिक राजवाड़ा महल से होती है, जो होल्कर काल की याद दिलाता है।
धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक संदर्भ
रंगपंचमी को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। माना जाता है कि होली के बाद पांचवें दिन वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और रंगों के माध्यम से उत्सव मनाने की परंपरा इसी विश्वास से जुड़ी है।
कई लोग इसे भगवान कृष्ण की रंग लीला से भी जोड़ते हैं। ब्रज क्षेत्र में भी होली के बाद रंगपंचमी का उत्सव मनाया जाता है, जहां रंगों के साथ उत्सव और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार रंगों और गुलाल से वातावरण की नकारात्मकता दूर होती है और समाज में खुशहाली और सकारात्मकता फैलती है।
जब इंदौर बन जाता है रंगों का शहर
रंगपंचमी के दिन इंदौर की सड़कों का दृश्य किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं होता। सुबह से ही लोग सफेद कपड़े पहनकर सड़कों पर निकल पड़ते हैं। जैसे- जैसे गेर आगे बढ़ती है, लोग रंगों में सराबोर होते जाते हैं। ढोल की थाप और DJ की धुन पर लोग नाचते हैं, और ट्रकों से उड़ता गुलाल हवा में रंगों के बादल बना देता है।
कई जगहों पर टैंकरों से रंगीन पानी की बौछार की जाती है। इस दौरान पूरा वातावरण गुलाबी, लाल और पीले रंगों से भर जाता है। कुछ ही मिनटों में सड़कें और इमारतें भी रंगों से रंग जाती हैं। ऐसा लगता है मानो पूरा शहर एक साथ उत्सव मना रहा हो।
लाखों लोगों की भीड़
इंदौर की गेर देखने के लिए हर साल भारी संख्या में लोग पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश के अलग-अलग राज्यों से पर्यटक भी यहां आते हैं। अनुमान के अनुसार इस उत्सव में एक से दो लाख लोग शामिल होते हैं। कई विदेशी पर्यटक भी इस अनोखे रंग उत्सव को देखने के लिए इंदौर पहुंचते हैं। राजवाड़ा और आसपास के इलाकों में इतनी भीड़ होती है कि कई बार ऊपर से देखने पर केवल रंगों का समुद्र ही दिखाई देता है।
गेर के अलग-अलग रूप
इंदौर में कई संगठन और अखाड़े अपनी-अपनी गेर निकालते हैं। इनमें से कुछ गेर बहुत प्रसिद्ध हैं।
- तोरिया गेर
- राधा-कृष्ण गेर
- राजवाड़ा गेर
इन गेर में अलग-अलग तरह की झांकियां, पारंपरिक संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी देखने को मिलते हैं। कई जगह मालवा की लोक संस्कृति को भी प्रदर्शित किया जाता है।
प्रशासन की बड़ी तैयारी
इतनी बड़ी भीड़ को संभालना आसान नहीं होता। इसलिए प्रशासन भी इस उत्सव के लिए विशेष तैयारी करता है।
रंगपंचमी के दिन पूरे क्षेत्र में पुलिस बल तैनात किया जाता है। ड्रोन कैमरों के जरिए निगरानी की जाती है और मेडिकल टीम भी तैयार रहती है। कई जगह ट्रैफिक डायवर्जन किया जाता है ताकि भीड़ को नियंत्रित किया जा सके।
इंदौर की पहचान बन चुकी है गेर
आज इंदौर की रंगपंचमी की गेर केवल एक स्थानीय त्योहार नहीं रह गई है। यह पूरे देश में प्रसिद्ध हो चुकी है।
जैसे मथुरा की लठमार होली और बरसाने की फूलों की होली प्रसिद्ध है, वैसे ही इंदौर की गेर को भी भारत के सबसे अनोखे रंग उत्सवों में गिना जाता है। यह उत्सव इंदौर की संस्कृति, परंपरा और सामूहिक उत्साह को दर्शाता है।
एक अनुभव जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल
जो लोग पहली बार इंदौर की गेर देखते हैं, उनके लिए यह अनुभव अविस्मरणीय होता है। जब हजारों लोग एक साथ नाचते-गाते रंगों में डूब जाते हैं तो ऐसा लगता है मानो पूरा शहर एक परिवार की तरह उत्सव मना रहा हो।
हवा में उड़ते गुलाल, ढोल की गूंज और लोगों के चेहरे पर मुस्कान – यह सब मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाते हैं जिसे केवल देखा और महसूस किया जा सकता है। जब पूरा शहर एक साथ उत्सव मनाता है तो वह केवल रंगों का त्योहार नहीं रहता, बल्कि लोगों के बीच प्रेम, भाईचारे और खुशी का प्रतीक बन जाता है।
शायद यही कारण है कि लोग कहते हैं –
अगर आपने इंदौर की गेर नहीं देखी, तो आपने रंगों का असली त्योहार अभी तक नहीं देखा।
