मोबाइल रेडिएशन और स्क्रीन टाइम से बढ़ रहीं मानसिक व शारीरिक समस्याएं
नमन मिश्रा की रिपोर्ट
जयपुर। डिजिटल युग में मोबाइल फोन जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई, कामकाज, मनोरंजन और आपसी संवाद हर जरूरत मोबाइल से पूरी हो रही है। लेकिन यही तकनीक जब कम उम्र के बच्चों के हाथों में पहुंच रही है, तो उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर इसका गंभीर असर देखने को मिल रहा है।
शहर के चिकित्सकों के अनुसार मोबाइल से जुड़ी समस्याओं के मामलों में करीब 30 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जिनकी उम्र 8 वर्ष या उससे कम है।
इन बच्चों में कम्युनिकेशन की कमी, चिड़चिड़ापन, ब्रेन डेवलपमेंट में रुकावट, आंखों से जुड़ी दिक्कतें, हाथों की ग्रिप कमजोर होना और सेंस ऑर्गन का सही तरीके से काम न कर पाना जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। पहले ये दिक्कतें किशोर या बड़े बच्चों में देखने को मिलती थीं, लेकिन अब छोटे बच्चों में भी स्ट्रेस, हेडेक और एंग्जायटी जैसे लक्षण सामने आ रहे हैं।
मोबाइल बन रहा बच्चों को शांत कराने का आसान लेकिन खतरनाक तरीका
आज कई परिवारों में यह आम नजारा बन चुका है कि बच्चों को शांत कराने, खाना खिलाने या व्यस्त रखने के लिए उनके हाथ में मोबाइल या टैबलेट थमा दिया जाता है। शुरुआत में यह अभिभावकों को आसान समाधान लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत बच्चों को मोबाइल एडिक्शन की ओर धकेल देती है।
पांच से आठ साल तक के बच्चे घंटों कार्टून, गेम्स और शॉर्ट वीडियो देखने के आदी हो रहे हैं
इससे उनका सामाजिक व्यवहार प्रभावित हो रहा है और वे वास्तविक दुनिया से कटते जा रहे हैं।बच्चों के ब्रेन पर क्यों ज्यादा असर डालता है मोबाइल विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों का स्कल (खोपड़ी) बड़ों की तुलना में काफी पतला होता है।
ऐसे में मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाला रेडिएशन सीधे ब्रेन पर असर डालता है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों की रोशनी कमजोर होना, ध्यान केंद्रित न कर पाना और नींद से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।
केस 1
खातीपुर निवासी 5 वर्षीय निकिता (बदला हुआ नाम) को दो साल की उम्र से ही मोबाइल और टैबलेट की आदत लग गई थी। माता-पिता दोनों कामकाजी थे, इसलिए निकिता को शांत रखने के लिए अक्सर फोन या टैबलेट दे दिया जाता था। जब स्कूल जाने की उम्र हुई, तो वह पेंसिल पकड़ नहीं पा रही थी। लिखने की कोशिश करने पर उसके दाएं हाथ में दर्द होता था।
जांच के बाद सामने आया कि मोबाइल चलाते समय वह बाएं हाथ में डिवाइस पकड़ती थी और दाएं हाथ से केवल स्क्रीन स्क्रॉल करती थी। इस कारण दाएं हाथ की ग्रिप और होल्डिंग क्षमता विकसित नहीं हो पाई। करीब तीन महीने तक हैंड और फिंगर एक्सरसाइज कराई गईं, तब जाकर उसकी स्थिति में कुछ सुधार हुआ।
केस 2
जयपुर निवासी 8 वर्षीय रोहन (बदला हुआ नाम) एक संयुक्त परिवार में रहता है। घर में बड़े लोग अक्सर वेब सीरीज देखते थे, जिसकी वजह से रोहन को भी स्क्रीन देखने की आदत लग गई। दो साल पहले उसने गलती से एक डरावनी और हिंसक वेब सीरीज देख ली।
इसके बाद से उसे रात में पैनिक अटैक आने लगे। वह अचानक डरकर उठ जाता, रोने लगता, आसपास के लोगों को मारने लगता और उसे ऐसा महसूस होता कि कोई उसे नुकसान पहुंचाने आ रहा है। पिछले दो वर्षों से उसका इलाज चल रहा है।

अभिभावकों को बरतनी होगी सावधानी
विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे बच्चों को किसी भी हालत में मोबाइल और टैबलेट से दूर रखना चाहिए। सबसे जरूरी बात यह है कि माता-पिता खुद भी बच्चों के सामने मोबाइल का सीमित उपयोग करें। अगर बच्चों को मनोरंजन देना ही है, तो कहानियां, पारंपरिक कार्टून या सीमित समय के लिए टेलीविजन बेहतर विकल्प हो सकते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि अभिभावक बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण रखें, उनसे बातचीत करें, आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा दें और उन्हें वास्तविक दुनिया से जोड़ें, ताकि उनका मानसिक और शारीरिक विकास संतुलित रूप से हो सके।
