विश्वजीत कुमार, पटना| बिहार की राजनीति हमेशा से देश की राजनीति का अहम केंद्र रही है। यहाँ विकास की रफ्तार भले ही सवालों के घेरे में रहती हो, लेकिन राजनीतिक हलचल इतनी तेज होती है कि उसकी गूँज पटना से सीधे दिल्ली तक सुनाई देती है। इन दिनों चर्चा का सबसे बड़ा विषय है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का अचानक राज्यसभा की ओर रुख करना और उसके साथ-साथ उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री।
नीतीश कुमार भारतीय राजनीति के उन नेताओं में गिने जाते रहे हैं जिन्होंने लंबे समय तक खुद को परिवारवाद सेअलग थलग रखा। उन्होंने कई मौकों पर यह कहा कि राजनीति को परिवार की विरासत नहीं बनना चाहिए। उनका एक बयान अक्सर चर्चा में रहता है “परिवारवाद और समाजवाद साथ-साथ नहीं चल सकते, जब परिवारवाद शुरू होता है तो समाजवाद खत्म हो जाता है।” यही वजह थी कि बिहार की राजनीति में उन्हें एक अलग तरह के नेता के रूप में देखा जाता था, जो अपने परिवार को राजनीति से दूर रखते हैं।
लेकिन राजनीति में समय और परिस्थितियाँ कब बदल जाए कोई नहीं जानता और वही हुआ बिहार में भी। हालिया घटनाक्रम ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद जब जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन की सरकार बनी तो नीतीश कुमार ने ही मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस समय भी कई राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा था कि यह कार्यकाल शायद उनका आखिरी कार्यकाल हो सकता है और भाजपा बिहार में पहली बार अपने मुख्यमंत्री बनाएगी।
अब जब नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं और बिहार की राजनीति में उनके बेटे निशांत कुमार की एंट्री हो रही है तो परिवारवाद पर बहस होना स्वाभाविक है। बेदाग छवि और लोकप्रियता के चरम पर विराजमान ये वही नीतीश कुमार हैं जो सार्वजनिक मंचों से अक्सर लालू प्रसाद यादव पर परिवार को बढ़ावा देने और केवल उनकी ही चिंता करने को लेकर सवाल करते रहे हैं। वे राहुल गांधी और तेजस्वी यादव जैसे नेताओं को परिवारवाद का अवतार कहते नहीं थकते थे, अब उन्होंने अपने बेटे को बिहार की राजनीति में लाकर अपने ही बनी -बनाई व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए।
हालांकि, नीतीश कुमार ने भले ही अपने परिवार को राजनीति में नहीं बढ़ाया और उनके बेटे का अब राजनीती में एंट्री हुई हो, परंतु दूसरे राजनेताओं के बेटे-बेटियों और पत्नियों को तो बढ़ाया ही।
बिहार और परिवारवाद
भारतीय राजनीति में परिवारवाद कोई नई बात नहीं है। देश के कई बड़े राजनीतिक दलों में यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। बिहार में भी इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। लालू प्रसाद यादव के परिवार को ही देख लीजिये जहाँ लालू प्रसाद यादव के बाद उनकी पत्नी राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री रहीं। उनके बेटे तेजस्वी यादव नितीश कुमार के कार्यालकाल में ही उप-मुख्यमंत्री एवं तेजा प्रताप यादव भी मंत्री बने।

दलित राजनीति के बड़े चेहरे रहे राम विलास पासवान ने लोकजनशक्ति की स्थापना की थी। उनके निधन के बाद पार्टी और राजनीतिक विरासत उनके बेटे चिराग पासवान के हाथों में चली गई। चिराग से मतभेद के कारण उनके चाचा और पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद पशुपति पारस ने अलग पार्टी बनाकर उनसे दुरी बना ली। रामविलास पासवान के भतीजे प्रिंस राज भी समस्तीपुर से सांसद रहे हैं।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष और भारत सरकार में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम के 15वें मंत्री के रूप में कार्यरत हैं। मांझी के परिवार में भी राजनीतिक विरासत दिखाई देती है। उनके बेटे संतोष कुमार सुमन बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं और पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं। परिवार के अन्य सदस्य पत्नी, बहु और समधन भी राजनीति में सक्रिय हैं। इससे साफ है कि मांझी की राजनीतिक विरासत भी धीरे-धीरे परिवार के भीतर ही आगे बढ़ रही है।

भाजपा नेता और बिहार सरकार में वर्त्तमान उप- मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी परिवारवाद की हीं उपज हैं। उनके पिता सकुनी चौधरी बिहार के बड़े नेता रहे हैं और कई बार विधायक व मंत्री रह चुके हैं।

बिहार सरकार में मंत्री और जदयू नेता अशोक चौधरी भी एक राजनीतिक विरासत वाले परिवार से आते हैं। उनके पिता महावीर चौधरी बिहार की राजनीति में सक्रिय रहे और विधायक तथा मंत्री भी रहे। अब उनकी बेटी साम्भवी चौधरी भी राजनीति में सक्रिय हो चुकी हैं और संसद तक पहुँच चुकी हैं। यह उदाहरण दिखाता है कि राजनीति में तीसरी पीढ़ी भी सक्रिय हो रही है।

हालाँकि परिवारवाद को लेकर राजनीति में हमेशा दो तरह की राय रही है। एक पक्ष इसे लोकतंत्र के खिलाफ मानता है और कहता है कि इससे योग्य और जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए रास्ते बंद हो जाते हैं। वहीं दूसरा पक्ष यह तर्क देता है कि अगर जनता किसी राजनीतिक परिवार के सदस्य को चुनती है तो इसमें गलत क्या है। लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता का ही होता है।
परिवारवाद के नए राजकुमार निशांत और उनकी नई नवेली टीम

निशांत कुमार के साथ युवा विधायकों की एक टीम तैयार की गयी है जो उनके राजीनीतिक करियर को चमकाएंगे। इसमें इस्लामपुर के विधायक रूहेल रंजन प्रमुख माने जा रहे हैं, जो बीआईटी मेसरा में उनके साथ पढ़ चुके हैं। इसके अलावा पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सदानंद सिंह के पुत्र शुभानंद मुकेश, जनता दल यूनिटेड के नेता दिनेश कुमार सिंह, एलजेडी सांसद वीणा देवी की बेटी और जेडीयू विधायक कोमल सिंह, तथा बाहुबली नेता आनंद मोहन के पुत्र और जेडीयू विधायक चेतन आनंद जैसे युवा चेहरे शामिल किए गए हैं। जितने भी लोग इस फ़ेहरिस्त में शामिल हैं उनमें से ज्यादातर लोगों की परिवारिक पृष्ठभमि राजनीति है।
अंततः, सवाल सिर्फ निशांत कुमार की एंट्री या उनकी टीम का नहीं है, बल्कि उस नैतिक आधार का है जिस पर नितीश कुमार की राजनीति खड़ी होने का दावा करती रही है। जब नीतीश कुमार जैसे नेता, जिन्होंने वर्षों तक परिवारवाद के खिलाफ अपनी पहचान बनाई, उसी राह पर चलते नजर आते हैं, तो यह बदलाव कम और अपने नैतिक मूल्यों का राजनैतिक पतन ज्यादा लगता है। ‘टीम निशांत’ में शामिल अधिकांश चेहरों की राजनीतिक विरासत यह संकेत देती है कि बिहार की राजनीति में “परिवार” अब भी सबसे मजबूत योग्यता बना हुआ है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह लोकतंत्र का स्वाभाविक विस्तार है या फिर सीमित दायरों में सिमटती सत्ता का खेल? कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस परिवारवाद पर सबसे ज्यादा हमले किए गए, वही अब सबसे सुरक्षित राजनीतिक रास्ता बन चुका है। बस चेहरे बदल गए हैं, पर परंपरा वही है।
नीतीश कुमार की अपने बेटे को स्थापित करने की महत्वाकांक्षा दरअसल उनके उसी मूल पर चोट करती है, जिसने उन्हें वर्षों तक अलग पहचान दी। नीतीश कुमार अब उस भीड़ से अलग नहीं दिखते, जिसके वह कभी सबसे मुखर विरोधी हुआ करते थे। ऐसे में बिहार की राजनीति में परिवारवाद अब शायद ही कभी एक बड़े मुद्दे की तरह उभरे। और अगर उभरा भी, तो औपचारिक बहस बनकर रह जाएगा। धीरे से आएगा और चुपचाप गायब हो जाएगा।
इसे बिहार जैसे गरीब और संसाधन-संकट से जूझते राज्य के लिए विडंबना ही कहा जाएगा, जहाँ राजनीति से बदलाव की उम्मीद की जाती है, लेकिन वही राजनीति अब वंश और विरासत के दायरे में सिमटती नजर आ रही है।
