रात का सन्नाटा जब गहरा होता है और मैहर की पहाड़ियों पर कोहरा छा जाता है, तब 1063 सीढ़ियों के ऊपर स्थित ‘मां शारदा’ के मंदिर के कपाट भारी बेड़ियों और तालों से सील कर दिए जाते हैं। मंदिर के पुजारी नीचे उतर आते हैं और पूरा पहाड़ निर्जन हो जाता है। लेकिन सुबह जब सूर्य की पहली किरण के साथ मंदिर के पट खुलते हैं, तो अंदर का नजारा विज्ञान के हर तर्क को ध्वस्त कर देता है।
माता के चरणों में ताजे लाल फूल चढ़े होते हैं, जल अर्पित किया हुआ होता है और गर्भगृह में एक दिव्य सुगंध महक रही होती है। सवाल उठता है कि परिंदा भी जहाँ पर न मार सके, वहाँ हर सुबह सबसे पहले पूजा कौन कर जाता है?
कौन है वो ‘अदृश्य’ भक्त?
स्थानीय बुंदेलखंडी लोक-मान्यता और सदियों पुरानी वीरगाथाओं की मानें तो यह भक्त कोई और नहीं, बल्कि 12वीं शताब्दी के महान योद्धा ‘आल्हा’ हैं। वही आल्हा, जिन्होंने अपने भाई ऊदल के साथ मिलकर 52 युद्ध लड़े और जिन्हें कभी कोई हरा नहीं पाया।
वहीं इतिहास कहता है कि आल्हा महोबा के राजा परमर्दिदेव के सेनापति थे, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान जैसी महाशक्ति से लोहा लिया था। लेकिन लोककथाओं की दुनिया में आल्हा मरे नहीं हैं; वे ‘अमर’ हैं।
ब्रह्म मुहूर्त का वो रहस्यमयी शृंगार
मंदिर के मुख्य पुजारी और वहां पीढ़ियों से रह रहे लोग बताते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त (तड़के 2 से 4 बजे के बीच) में अक्सर मंदिर के भीतर से घंटियों की गूंज सुनाई देती है। “हमने कभी उन्हें देखा नहीं, लेकिन उनकी उपस्थिति को महसूस किया है। जो फूल सुबह चरणों में मिलते हैं, वे इस पहाड़ी पर कहीं नहीं उगते। वे फूल कहाँ से आते हैं, यह आज भी एक अनसुलझी पहेली है।” – एक स्थानीय निवासी का बयान।
विज्ञान बनाम विश्वास: जब कैमरे भी हो गए फेल
इस रहस्य को डिकोड करने के लिए कई बार कोशिशें की गईं। बताया जाता है कि कुछ साल पहले मंदिर परिसर में नाइट-विजन सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे। लेकिन जब सुबह फुटेज देखी गई, तो उस विशेष समय के दृश्य या तो धुंधले थे या कैमरों में तकनीकी खराबी आ गई थी।
इतना ही नहीं, कई लोगों ने रात में मंदिर में छिपकर ‘सच’ जानने की कोशिश की, लेकिन कहा जाता है कि जो भी वहां रात में रुका, वह या तो मानसिक संतुलन खो बैठा या फिर अपनी बात बताने की स्थिति में नहीं रहा। यही कारण है कि आज प्रशासन भी रात के समय पहाड़ पर किसी को रुकने की अनुमति नहीं देता।
आल्हा का अखाड़ा: जहाँ आज भी गूंजती है तलवारों की खनक!
मंदिर से कुछ ही दूरी पर ‘आल्हा का अखाड़ा’ और ‘आल्हा तालाब’ स्थित है। पथरीली चट्टानों के बीच बना यह अखाड़ा आज भी उस कालखंड की गवाही देता है। कहा जाता है कि आल्हा आज भी अदृश्य रूप में यहाँ अपनी शक्ति का अभ्यास करते हैं।
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