नदियों में ऑक्सीजन की कमी और जलकुंभी संकट
सीवेज, बढ़ता बीओडी और हरी दिखने वाली ‘जलकुंभी’ के पीछे छुपा जहर। भोजताल से नर्मदा तक सांसें खो रही हैं, हमारी जीवनदायिनी नदियां
नमन मिश्रा की रिपोर्ट:
भोपाल। भारत की जीवनदायिनी नदियां आज एक ऐसे संकट से गुजर रही हैं। जो दिखाई तो कम देता है, लेकिन इसके परिणाम विनाशकारी हैं। यह संकट है पानी में घुलित ऑक्सीजन की लगातार होती कमी।
हालिया रिपोर्ट्स और वैज्ञानिक अध्ययनों ने चेतावनी दी है कि हमारी नदियां ‘हाइपोक्सिया’ (ऑक्सीजन की भारी कमी) का शिकार हो रही हैं। भोपाल की जीवन रेखा मानी जाने वाली ‘बड़ा तालाब’ (भोजताल), नर्मदा और आसपास की कलियासोत जैसी नदियां भी इस खतरे से अछूती नहीं हैं।
नदियों में ऑक्सीजन कम होने के पीछे का विज्ञान
दरअसल, पानी में ऑक्सीजन कम होने की प्रक्रिया को वैज्ञानिक रूप से बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड के बढ़ने से समझा जा सकता है। सामान्यत पानी में ऑक्सीजन दो तरह से आती है। सीधे वातावरण से घुलकर और पानी के अंदर मौजूद पौधों के प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस) से। जब हम नदियों में बिना उपचार किया हुआ सीवेज (मल-मूत्र) और औद्योगिक कचरा बहाते हैं, तो पानी में ‘कार्बनिक पदार्थों’ की मात्रा बढ़ जाती है।
इन पदार्थों को तोड़ने के लिए पानी में मौजूद बैक्टीरिया को बहुत अधिक ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है। इस प्रक्रिया में बैक्टीरिया पानी की सारी घुलित ऑक्सीजन सोख लेते हैं। इसे ही बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) का बढ़ना कहते हैं। जैसे-जैसे बीओडी बढ़ता है, घुलित ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है। 2025 की CPCB रिपोर्ट बताती है कि भारत में 296 ऐसे नदी खंड हैं जहाँ बीओडी का स्तर तय मानकों से कहीं ज्यादा है।
जलकुंभी: प्रदूषण का जीता-जागता विज्ञापन
भोपाल के तालाबों और नदियों के किनारों पर बिछी जलकुंभी (Water Hyacinth) की हरी चादर कोई प्राकृतिक सुंदरता नहीं है। बल्कि पानी के जहरीले होने का प्रमाण है।
- मल-मूत्र का संबंध: जलकुंभी उन जलाशयों में तेजी से फैलती है। जहां ‘नाइट्रोजन’ और ‘फास्फोरस’ की मात्रा अधिक होती है। ये तत्व मुख्य रूप से मानवीय मल-मूत्र और नालों के पानी में पाए जाते हैं।
- सांसों पर पहरा: यह पौधा पानी की सतह को पूरी तरह ढक लेता है। जिससे सूरज की रोशनी नीचे नहीं पहुंच पाती और अंदरूनी जलीय पौधे ऑक्सीजन पैदा करना बंद कर देते हैं। जब यह जलकुंभी मरती है, तो इसके सड़ने की प्रक्रिया पानी की बची-कुची ऑक्सीजन को भी खत्म कर देती है। जिससे पानी पूरी तरह ‘मृत’ हो जाता है।
- जहरीली गैसों का उत्सर्जन: ऑक्सीजन रहित पानी में मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें बनती हैं, जो न केवल दुर्गंध पैदा करती हैं। बल्कि पर्यावरण के लिए भी घातक हैं।
भोपाल के संदर्भ में वर्तमान स्थिति
फिलहाल, भोपाल के ‘बड़ा तालाब’ और ‘नर्मदा’ जैसी नदियों के संरक्षण के लिए नमामि गंगे और अन्य स्थानीय योजनाओं के तहत प्रयास किए जा रहे हैं। CPCB के 2025 के आंकड़ों के अनुसार, महाकुंभ जैसे बड़े आयोजनों के दौरान प्रयागराज में तो स्थिति नियंत्रित रही। लेकिन भोपाल जैसे शहरी केंद्रों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की क्षमता और नालों के सीधे प्रवेश को रोकना अभी भी बड़ी चुनौती है।
अध्ययन बताते हैं कि 1900 के मुकाबले आज नदियां वातावरण से लगभग 100 करोड़ टन ऑक्सीजन खींच रही हैं। जो उनके प्राकृतिक चक्र के बिगड़ने का सबूत है। यदि समय रहते मल-मूत्र के सीधे विसर्जन और जलकुंभी के प्रसार को नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में हमारी नदियां केवल कचरा ढोने वाले नाले बनकर रह जाएंगी।
