महाकवि विद्यापति की रहस्यमयी गाथा
बिहार की मिट्टी के कण-कण में लोककथाएं रची- बसी हैं, लेकिन मिथिलांचल के मधुबनी जिले के एक छोटे से गाँव बिस्फी से निकली एक आवाज़ ऐसी थी। जिसने न केवल साहित्य का भूगोल बदला, बल्कि स्वयं ईश्वर को भी जमीन पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया। यह गाथा है ‘मैथिल कोकिल’ विद्यापति की—एक ऐसा कवि जिसकी कलम से भक्ति की सरिता बही। जिसके शब्दों ने साक्षात शिव को अपना दास बना लिया।
बिस्फी के आँगन से राजदरबार तक का सफर
14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब समाज संस्कृत के भारी- भरकम बोझ तले दबा था, तब विद्यापति ने एक क्रांतिकारी निर्णय लिया। उन्होंने अपनी मातृभाषा मैथिली को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। उनके पिता गणपति ठाकुर राजा गणेश्वर के दरबारी थे। जिससे राजनीति और कूटनीति उन्हें विरासत में मिली थी। लेकिन विद्यापति का मन तो राधा-कृष्ण के प्रेम और शिव की अघोर भक्ति में रमा था। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था— “देसिल बयना सब जन मिट्ठा” (अपनी मातृभाषा सबको मीठी लगती है)। इसी एक मंत्र ने उन्हें महलों के कवि से जन-जन का कंठहार बना दिया।
उगना: जब शिव ने शर्त पर भरी चाकरी
विद्यापति की भक्ति का सबसे रोमांचक अध्याय तब शुरू होता है। जब उनकी ‘नचारी’ (शिव के भजन) से मंत्रमुग्ध होकर महादेव कैलाश छोड़कर उनके घर आ धमके। शिव ने एक सांवले सेवक का रूप धरा और अपना नाम ‘उगना’ बताया। लेकिन भगवान ने एक कठिन शर्त रखी थी- “जिस दिन मेरा भेद खुला, मैं उसी पल अंतर्ध्यान हो जाऊँगा।”

सालों तक जगत के पालनहार विद्यापति के घर की लकड़ी काटते रहे। उनके लिए पानी भरते रहे और उनकी पालकी ढोते रहे। यह इतिहास का वह विरल क्षण था जहाँ भक्त बड़ा था और भगवान सारथी बने हुए थे। एक बार जब प्यास से तड़पते विद्यापति के लिए उगना अपनी जटा से गंगाजल निकाल लाए, तब कवि को सत्य का आभास हुआ। उन्होंने शिव के पैर पकड़ लिए, पर शिव ने फिर अपनी शर्त दोहरा दी। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन जब विद्यापति की पत्नी सुशीला ने अज्ञानता में उगना को जलती लकड़ी (लूकठी) से पीटना चाहा, तो भक्त का हृदय अपने आराध्य का अपमान सह नहीं सका। उनके मुँह से निकल गया- “रुको, ये साक्षात महादेव हैं!” और उसी क्षण उगना ओझल हो गए। आज भी मधुबनी के भवानीपुर का मंदिर इस वियोग और उस अलौकिक मिलन का साक्षी है।
साहित्य का वो जादू जिसने बंगाल तक को जीत लिया
विद्यापति केवल भक्ति के कवि नहीं थे, वे एक दूरदर्शी इतिहासकार भी थे। उनकी रचनाएँ ‘कीर्तिलता’ और ‘कीर्तिपताका’ उस दौर के राजनैतिक संघर्षों का जीवंत दस्तावेज हैं। वहीं उनकी ‘पदावली‘ ने राधा- कृष्ण के प्रेम को ऐसी ऊँचाई दी कि बंगाल के महान संत चैतन्य महाप्रभु इनके पदों को गाते हुए भावविभोर होकर मूर्छित हो जाते थे। यही कारण है कि विद्यापति को ‘अभिनव जयदेव’ की उपाधि मिली। वे बिहार के साथ-साथ बंगाल और ओडिशा के भी पूजनीय बन गए।
समस्तीपुर का वो चमत्कारी अंत: जब गंगा खुद चलकर आईं
विद्यापति के जीवन का समापन उनके जीवन की तरह ही दैवीय था। जब उन्हें अपनी मृत्यु का आभास हुआ, तो वे गंगा स्नान की इच्छा लेकर बिस्फी से निकले। चलते-चलते जब वे आज के समस्तीपुर जिले के विद्यापतिनगर (मऊ बाजितपुर) पहुँचे, तो शरीर ने साथ देना छोड़ दिया। गंगा की धारा अभी भी कुछ कोस दूर थी। विद्यापति ने वहीं बैठकर माँ गंगा को पुकारा- “हे माँ! क्या एक पुत्र अपनी अंतिम सांसों में अपनी माँ की गोद तक नहीं पहुँच पाएगा?”

वहीं कहते हैं कि उस रात प्रकृति ने एक बड़ा चमत्कार देखा। माँ गंगा स्वयं अपनी धारा बदलकर खुद महाकवि के चरणों तक पहुँच गईं। इसी पवित्र स्थान पर विद्यापति ने अपना पार्थिव शरीर त्यागा। आज इसे ‘विद्यापति धाम’ के रूप में जाना और पूजा जाता है। जहां हर साल लाखों लोग उस महाकवि को नमन करने आते हैं। जिसने मृत्यु को भी अपनी शर्तों पर जिया।
एक कालजयी विरासत का जीवंत सत्य
आज सदियों बाद भी विद्यापति मिथिला की धड़कनों में बसते हैं। उनकी विरासत केवल पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मिथिला के हर विवाह गीत, हर मुंडन संस्कार और हर मंदिर की गूँज में जीवित है। उन्होंने मैथिली को वह गौरव दिलाया कि आज वह भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शान से दर्ज है।
एक पत्रकार और स्टोरीटेलर के नज़रिए से देखें तो विद्यापति हमें सिखाते हैं कि जब कला, समर्पण और अपनी मिट्टी के प्रति प्रेम मिलता है, तो वह काल को भी जीत लेता है। मधुबनी की गलियों से शुरू हुआ वह सफर समस्तीपुर के गंगा तट पर भले ही थमा हो, लेकिन उनकी अमर पंक्तियाँ— “जय जय भैरवि असुर भयाउनि” —आज भी बिहार के आकाश में गूँजती हैं और हमें अपनी जड़ों पर गर्व करना सिखाती हैं। यह गाथा केवल एक कवि की नहीं, बल्कि उस अटूट विश्वास की है जिसने ईश्वर को भी इंसान का नौकर बनने पर मजबूर कर दिया।
