समस्तीपुर का वो काला दिन, जब सच में लगा था कि बिहार की धड़कन रुक गई है।
समस्तीपुर के लोग 13 अप्रैल 2006 की उस दोपहर को कभी भूल नहीं सकते। आज भी अगर मुसरीघरारी बाजार का नाम लिया जाए, तो कई बुज़ुर्गों की आँखों के सामने वही खौफनाक मंजर घूम जाता है।
वो एक आम-सी दोपहर थी। बाजार में रोज़ की तरह चहल-पहल, चाय की दुकानों पर पंचायत चुनाव को लेकर बहस, हंसी-मज़ाक… किसी को क्या पता था कि कुछ ही पलों में ये जगह गोलियों की आवाज़ से कांप उठेगी।
जब अचानक मौत बाइक पर सवार होकर आई
अखिलेश राय अपने करीबी राम उदेश राय के साथ एक चाय की दुकान पर बैठे थे। माहौल बिल्कुल सामान्य था। तभी अचानक बाइक से कुछ लोग आते हैं। कोई चेतावनी नहीं, कोई बहस नहीं—बस सीधी गोलियों की बौछार।

AK-47 और AK-56 जैसी खतरनाक राइफलों से चली करीब सौ से ज़्यादा गोलियाँ। चंद सेकंड में सब खत्म। लोग समझ ही नहीं पाए कि क्या हुआ। जब धुआँ छटा, तो ज़मीन पर दो लहूलुहान शरीर पड़े थे।ये सिर्फ दो लोगों की हत्या नहीं थी। ये समस्तीपुर की राजनीति में एक युग के अंत की घोषणा थी।
मसीहा या बाहुबली?
जिसे समझना आज भी आसान नहीं अखिलेश राय को लेकर समस्तीपुर में आज भी राय बंटी हुई है। कोई उन्हें बाहुबली कहता है, तो कोई मसीहा। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है।
उनकी मौत की खबर जैसे ही फैली, पूरा जिला उबल पड़ा। गुस्से में समर्थकों ने करीब 200 दुकानें जला दीं। सड़कों पर आग थी, डर था और बेबसी भी। सरकार तक हिल गई थी।
अब सवाल उठता है—आख़िर एक आदमी के लिए लोग इतना पागल क्यों हो गए? वो ‘न्यायालय’ जो आधी रात को भी खुला रहता था। इसका जवाब उन गलियों में छिपा है, जहाँ सरकार और सिस्टम अक्सर आख़िरी आदमी तक नहीं पहुँच पाते।

अखिलेश राय के समर्थकों के लिए वे सिर्फ नेता नहीं थे। वे वो इंसान थे, जिनके दरवाज़े पर गरीब, मज़लूम और बेसहारा बेझिझक पहुँच जाते थे।
कहते हैं, आधी रात को भी अगर किसी पर ज़ुल्म हुआ हो, तो अखिलेश राय सुनते थे। फैसला करते थे। यही वजह थी कि लोग उन्हें “गरीबों की आवाज़” कहते थे। उन्होंने समाज के उस तबके को ताकत का एहसास कराया, जिसे अक्सर राजनीति में सिर्फ वोट समझा जाता है।
टेंडर, ताकत और दुश्मनी का जाल
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही कड़वा है।पत्रकारिता की नज़र से देखें तो अखिलेश राय को यूँ ही ‘टेंडर किंग’ नहीं कहा जाता था। रेलवे हो या ग्रामीण सड़क निर्माण (REO-2), कहा जाता है कि समस्तीपुर में ठेकों की दुनिया उनकी मर्ज़ी से चलती थी।
यही पैसा, यही रसूख धीरे-धीरे दुश्मनों की फेहरिस्त बढ़ाता चला गया। गैंगवार शुरू हुई। वर्चस्व की लड़ाई तेज़ होती गई। और आखिरकार वही लड़ाई मुसरीघरारी की उस सड़क पर उनका इंतज़ार कर रही थी।
मौत के बाद भी एकजुट कर देने वाला नाम
अखिलेश राय की सबसे हैरान करने वाली बात उनकी मौत के बाद सामने आई। समस्तीपुर के मगरदही स्मारक पर हर साल उनकी पुण्यतिथि पर जो दृश्य दिखता है, वो बिहार की राजनीति में कम ही देखने को मिलता है। राजद, जदयू, भाजपा, कांग्रेस- सबके झंडे एक साथ।
विरोधी भी सिर झुकाते हैं। सब एक सुर में कहते हैं- “वो सामाजिक न्याय के लिए लड़े।” एक कहानी जो आज भी अधूरी है। अखिलेश राय की हत्या के बाद समस्तीपुर की राजनीति वैसी कभी नहीं रही।
वो एक ऐसे शख्स थे, जिन्होंने ज़िंदगी अपने नियमों पर जी- और उसी की कीमत भी चुकाई। आज भी जब कोई मुसरीघरारी बाजार से गुजरता है, तो लगता है जैसे उस चाय की दुकान की दीवारों में गोलियों की आवाज़ कैद हो। एक मसीहा… या एक बाहुबली…जो भी थे। लेकिन उनकी कहानी ने समस्तीपुर को हमेशा के लिए बदल दिया।

अखिलेश राय अच्छा था या बुरा, इस पर आज भी बहस जारी है। लेकिन एक बात सर्वमान्य है कि गरीब और सताए हुए लोग आज भी उनकी मृत्यु का शोक मनाते हैं। कुछ लोग उनकी निंदा करते हैं की वह एक अपराधी था ,कुछ लोगों का कहना था कि वह अच्छे लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करता था और बुरे लोगों के साथ बुरा।
कुछ ऐसे बुजुर्गों से भी मिला हूँ जो यह बताते हुए रोने लगते हैं कि अखिलेश राय के मौत के बाद उनक सहारा टूट गया। जब अखिलेश राय जीवित थे, तब उन्हें भोजन, बच्चों की शिक्षा या चिकित्सा सहायता की चिंता नहीं थी।
चाहे अच्छा हो या बुरा, यह हमेशा से ही बहस का विषय रहा है और रहेगा, लेकिन अखिलेश राय एक ऐसे व्यक्ति थे जिनका नाम समस्तीपुर के साथ हमेशा जुड़ा रहेगा।
मेरी निजी राय – अगर अखिलेश राय इतना कुख्यात व्यक्ति था तो फिर लाखों की संख्या में लोग उसके अंतिम संस्कार में क्यों शामिल हुए?
कर्पुरी ठाकुर की मृत्यु के बाद समस्तीपुर में किसी व्यक्ति के अंतिम संस्कार में इतनी भारी भीड़ कभी नहीं देखी गई। अखिलेश राय का अंतिम संस्कार इस बात का प्रमाण था कि वे एक कुख्यात व्यक्तित्व से कहीं बढ़कर थे।
आपकी बात और भावनाओं का सम्मान करता हूँ।
अखिलेश राय को लेकर समाज में दो राय रही हैं और यही वजह है कि वे आज भी चर्चा का विषय हैं। मेरा उद्देश्य किसी को महिमामंडित करना या दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उस सामाजिक सच्चाई को सामने लाना है जिसे लोग जीते रहे हैं।
इतिहास गवाह है कि कई व्यक्तित्व ऐसे रहे हैं जिन्हें सत्ता और कानून एक नजर से देखता है, जबकि समाज का एक बड़ा तबका उन्हें अपने अनुभवों से परखता है। अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ इस बात का संकेत है कि बहुत से लोगों के लिए वे केवल “कुख्यात” नहीं, बल्कि एक सहारा भी थे।
मेरी कोशिश यही है कि समस्तीपुर की जमीन से जुड़े ऐसे चरित्रों को एकतरफा नहीं, बल्कि समाज की नज़र से समझा जाए।
बहस होनी चाहिए, लेकिन तथ्यों और संवेदनाओं के साथ।