मध्यप्रदेश के इंदौर और भोपाल में बीते एक महीने से दूषित पानी ने एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट खड़ा कर दिया है। जगह- जगह उल्टी, दस्त और संक्रमण की शिकायतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव बना दिया। वहीं इंदौर में अब तक कुल 32 लोगों की मौत इस त्रासदी की भयावह तस्वीर सामने रखती है।
इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में यह संकट सबसे ज्यादा गहराया। जहां पानी की सप्लाई में गंदगी और सीवेज मिलावट के बाद सैकड़ों लोग बीमार पड़े। हालात ऐसे बने कि दिसंबर के आखिरी हफ्ते से जनवरी के अंत तक अस्पतालों में मरीजों की भीड़ उमड़ पड़ी। कई परिवारों के लिए यह समय सिर्फ बीमारी का नहीं, बल्कि अपनों को खोने का दर्द बन गया।
एक महीने तक अस्पतालों में जूझती जिंदगियां
वहीं, इस त्रासदी में कई ऐसे मरीज रहे, जो हफ्तों तक अस्पतालों में भर्ती रहे। कुछ की हालत इतनी गंभीर हुई कि उन्हें वेंटिलेटर, डायलिसिस और आईसीयू तक ले जाना पड़ा। हाल ही में 65 वर्षीय अनिता कुशवाह की मौत के साथ मृतकों की संख्या 32 तक पहुंच गई। जो लंबे समय से इलाज के दौरान जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही थीं।
दूसरी ओरस्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक, अधिकांश मरीजों में शुरुआत में सामान्य डायरिया जैसे लक्षण दिखेलेकिन समय के साथ संक्रमण ने किडनी फेल्योर, सेप्सिस और कार्डियक अरेस्ट जैसी गंभीर स्थितियां पैदा कर दीं।दूसरी ओरस्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक, अधिकांश मरीजों में शुरुआत में सामान्य डायरिया जैसे लक्षण दिखेलेकिन समय के साथ संक्रमण ने किडनी फेल्योर, सेप्सिस और कार्डियक अरेस्ट जैसी गंभीर स्थितियां पैदा कर दीं।
राहत और डर के बीच की स्थिति
हालांकि राहत की बात यह है कि अब तक 450 से अधिक मरीज ठीक होकर अस्पताल से डिस्चार्ज किए जा चुके हैं। लेकिन संकट पूरी तरह टला नहीं है। फिलहाल भी तीन मरीज अस्पताल में भर्ती हैं। जिनमें से दो की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है और वे आईसीयू में हैं।
इलाके के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 24 घंटे सक्रिय हैं। अब नए मरीजों की संख्या में कमी आई है। लेकिन स्वास्थ्य विभाग किसी भी स्थिति से निपटने के लिए अलर्ट मोड पर है। एम्बुलेंस और मेडिकल स्टाफ को अब भी तैनात रखा गया है।
पानी की सप्लाई पर सवाल
फिलहाल, नगर निगम का कहना है कि जांच और सुधार के बाद कुछ इलाकों में पानी की सप्लाई दोबारा शुरू कर दी गई है। फिलहाल करीब 30 प्रतिशत हिस्से में एक दिन छोड़कर पानी दिया जा रहा है। जबकि बाकी क्षेत्रों में मेन पाइपलाइन का काम अंतिम चरण में है।
हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि लोग अब भी नल के पानी पर भरोसा नहीं कर पा रहे। ज्यादातर परिवार आरओ और टैंकर के पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पूरी पाइपलाइन की लीकेज टेस्टिंग और सैंपल रिपोर्ट साफ नहीं आती, तब तक भरोसा लौटना मुश्किल है।
बड़ा सवाल: जिम्मेदारी किसकी?
इंदौर और भोपाल में फैली इस दूषित पानी त्रासदी ने शहरी जल आपूर्ति व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या समय रहते पाइपलाइन की जांच होती तो इतनी जानें बचाई जा सकती थीं? क्या शुरुआती शिकायतों को हल्के में लिया गया?
नतीजतन, यह सिर्फ एक इलाके या एक शहर की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की तस्वीर है। जहां थोड़ी सी लापरवाही सैकड़ों जिंदगियों पर भारी पड़ जाती है।

