बौआ दाई | मधुबनी पेंटिंग की आत्मा
आज जब हम बिहार की कला की बात करते हैं, तो ‘मधुबनी पेंटिंग’ का नाम आते ही चटक रंग, बड़े-बड़े शोरूम और विदेशों में बिकने वाली महंगी पेंटिंग्स दिमाग में आती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस कला को ज़िंदा रखने वाली वो उंगलियाँ किसकी थीं, जिन्होंने दशकों तक गुमनाम रहकर इस विरासत को सींचा? आज भले ही दुनिया उन्हें ‘पद्मश्री’ बौआ दाई के नाम से जानती हो, लेकिन उनके इस सफर की शुरुआत किसी सुर्ख़ियों से नहीं, बल्कि गरीबी और संघर्ष की उन टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों से हुई थी जिन्हें अक्सर इतिहास भुला देता है।
एक साधारण नाम, पर असाधारण काम
बौआ दाई कोई पढ़ी-लिखी कलाकार नहीं थीं। उन्होंने किसी आर्ट कॉलेज से डिग्री नहीं ली थी। दरअसल, मिथिलांचल के ग्रामीण अंचलों में ‘बौआ’ शब्द बड़े लाड़ का है, और ‘दाई’ का मतलब होता है—वो जो सबको रास्ता दिखाए। सच में, उन्होंने मिथिला की कला को एक ऐसा रास्ता दिखाया, जिस पर चलकर आज कई लोग करोड़ों कमा रहे हैं, भले ही वो खुद बरसों तक गुमनामी की चादर ओढ़कर बैठी रहीं।
उनका कैनवास कागज़ या कपड़ा नहीं था, बल्कि उनके घर की वो कच्ची दीवारें थीं जो मिट्टी और गोबर से लिपी होती थीं। उनके पास रंगों के डिब्बे नहीं थे। वे रसोई की हल्दी से पीला, सिंदूर से लाल और बेल के पत्तों को पीसकर हरा रंग तैयार करती थीं। उनके लिए पेंटिंग बनाना कोई ‘शौक’ नहीं था, बल्कि उनकी ‘इबादत’ थी।
“बाज़ार के रंग तो अब आए हैं, हमारे रंग तो पेड़ों और रसोई से निकलते थे। हल्दी, सिंदूर और पत्तों का जो रंग होता है, उसमें एक अलग ही महक होती है। वो रंग कभी फीके नहीं पड़ते क्योंकि उनमें प्रकृति का आशीर्वाद होता है।” — बौआ दाई
जीवन परिचय और गहरा जुड़ाव
मधुबनी के राजनगर (सिमरी गाँव) में जन्मी बौआ दाई जब 12 साल की उम्र में गौने के बाद जितवारपुर आईं, तो उनकी कला को ससुराल में एक नई पहचान मिली। भले ही उनका निवास स्थान मधुबनी रहा, लेकिन समस्तीपुर के साथ उनका रिश्ता एक ‘पड़ोसी’ का नहीं, बल्कि ‘सांस्कृतिक जड़’ का रहा है। समस्तीपुर के ग्रामीण अंचलों में उनके द्वारा सिखाई गई कला आज भी हज़ारों महिलाओं की जीविका का आधार है। उनके लिए समस्तीपुर की मिट्टी और वहाँ के लोकगीत हमेशा प्रेरणा के स्रोत रहे, जिसे उन्होंने अपनी पेंटिंग्स में ‘कोहबर’ और ‘अरिपन’ के ज़रिए अमर कर दिया।
जब दीवारों पर उतरी ‘मौन क्रांति’
1966 के उस भीषण अकाल को याद करते हुए बौआ दाई की आँखें भर आती थीं। उसी समय पहली बार मिथिला की इन दीवारों की कला को कागज़ पर उतारा गया। उन्हें अपनी कला की शुरुआत के बारे में एक बार कहा था:
“शुरुआत में हमने पेंटिंग इसलिए नहीं की थी कि हमें नाम कमाना था। उस समय घर में खाने की किल्लत थी। हमें कागज़ दिया गया और कहा गया कि इस पर वही बनाओ जो दीवार पर बनाती हो। हमें लगा कि शायद इन लकीरों से घर में दो वक्त की रोटी आ जाए।”- बौआ दाई
पेरिस से पद्मश्री तक का सफर
सोचिए, एक महिला जिसे अपनी स्थानीय भाषा के अलावा कुछ नहीं आता था, वो 1989 में फ्रांस की राजधानी पेरिस पहुँच गई। वहाँ उनकी ‘नाग कन्या’ की पेंटिंग्स देखकर दुनिया दंग रह गई थी। अपनी उस यात्रा पर उन्होंने कहा था:

साल 2017 में जब उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा ‘पद्मश्री’ से नवाज़ा गया, तो यह उस संघर्ष की जीत थी जो एक छोटे से गाँव के कच्चे आँगन से शुरू हुआ था।
बाज़ार की भीड़ में खो गई एक साधिका
आज मधुबनी पेंटिंग एक बड़ा ‘ब्रांड’ बन चुकी है। बड़े-बड़े व्यापारी गाँवों में आते हैं, औने-पौने दाम पर इन कलाकारों से काम कराते हैं और फिर उसे दिल्ली-मुंबई की गैलरी में लाखों में बेच देते हैं। बौआ दाई ने कभी अपनी कला का मोलभाव नहीं किया। उनके लिए कला ‘गुप्त दान’ जैसी थी। उन्होंने गाँव की दर्जनों लड़कियों को यह हुनर सिखाया। वे कहती थीं:
“आजकल लोग जल्दी में हैं, वे बस बेचना चाहते हैं। मैं अपनी बेटियों और बहुओं से यही कहती हूँ कि कला को पहले अपने भीतर उतारो, फिर कागज़ पर। लकीरें सीधी हों या टेढ़ी, उनमें आपकी रूह दिखनी चाहिए।”- बौआ दाई
हमारा फर्ज़ क्या है?
आपका फर्ज़ है कि हम सिर्फ उन लोगों की बात न करें जो चमक-धमक वाली दुनिया का हिस्सा हैं। हमें उन ‘बौआ दाई’ को भी याद करना होगा जिनके पैरों में कभी चप्पल तक नहीं थी, लेकिन जिनके हाथों ने इस मिट्टी को ‘स्वर्ण’ बना दिया।
बौआ दाई आज हमारे बीच एक जीवित मिसाल हैं, जो हमें सिखाती हैं कि असली कलाकार मरता नहीं है, वह अपनी कला की लकीरों में अमर हो जाता है। अगली बार जब आप कोई सुंदर पेंटिंग देखें, तो याद रखिएगा कि उसके पीछे किसी माँ की सालों की तपस्या और अभावों का रंग छिपा है।


