Sumitra Devi of Dalsinghsarai – The Unsung Lioness of Samastipur
इतिहास की किताबें अक्सर तारीखों और बड़े नामों के बोझ तले दब जाती हैं, और इस प्रक्रिया में अक्सर वे चेहरे छूट जाते हैं जिन्होंने असल में जमीन पर जंग लड़ी थी। बिहार के समस्तीपुर जिले का एक शहर है- दलसिंहसराय। आज यहाँ की सड़कों पर गाड़ियों का शोर है, लेकिन अगर आप वक्त की धूल झाड़कर 1942 के पन्नों को पलटें, तो आपको एक ऐसी औरत की पदचाप सुनाई देगी जिसने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं।
उनका नाम था श्रीमती सुमित्रा देवी। एक ऐसी ‘वीर नारी’ जिसकी न आज हमारे पास कोई तस्वीर है, न ही किसी चौराहे पर उनकी मूर्ति। लेकिन उनका साहस? वह आज भी समस्तीपुर की हवाओं में घुला हुआ है।
जब चूल्हे की आग, इंकलाब की मशाल बनी
अगस्त 1942 का वह दौर था जब गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। समस्तीपुर में क्रांति की आग धधक रही थी। अंग्रेज फौजी गांवों में घुसकर तांडव मचा रहे थे, क्रांतिकारियों के घरों को फूंका जा रहा था और अनाज लूटा जा रहा था। उस वक्त दलसिंहसराय की एक साधारण सी घरेलू महिला, सुमित्रा देवी, अपनी रसोई की दहलीज लांघकर बाहर खड़ी हो गईं।
उन्होंने देखा कि पुरुष या तो जेलों में ठूंस दिए गए हैं या भूमिगत हैं। ऐसे में उन्होंने कमान संभाली। उन्होंने गांव की उन औरतों को इकट्ठा किया जिन्होंने कभी जोर से बात तक नहीं की थी। सुमित्रा देवी ने उन्हें समझाया कि अगर हम गोरों का रास्ता नहीं रोक सकते, तो उनका ‘पेट’ तो रोक ही सकते हैं।
रसद की घेराबंदी: सुमित्रा देवी का वो साहसी चक्रव्यूह
एक रणनीतिकार की तरह सुमित्रा देवी ने अंग्रेजों की सबसे कमजोर कड़ी पर हमला किया—उनकी रसद (भोजन और आपूर्ति)। उन्होंने जो किया, वह किसी भी सैन्य ऑपरेशन से कम नहीं था:
- सड़कों पर ‘नारी शक्ति’ का पहरा: सुमित्रा देवी ने महिलाओं का एक विशाल हुजूम तैयार किया और दलसिंहसराय की मुख्य सड़कों पर धरना दे दिया। उनका मकसद साफ था—अंग्रेज कैंपों तक अनाज, दूध और राशन नहीं पहुँचने देना।
- गोरे सिपाहियों से सीधा टकराव: जब राशन से लदी गाड़ियां रुकीं, तो अंग्रेज सिपाही आगबबूला हो गए। संगीने तानी गईं, डराया गया, लेकिन सुमित्रा देवी एक चट्टान की तरह डटी रहीं।
- अहिंसा का फौलादी रूप: वे बिना किसी हथियार के लड़ रही थीं। उनका हथियार था उनका शरीर और उनका अटूट संकल्प। उन्होंने अंग्रेजों की रसद व्यवस्था को ठप कर दिया, जिससे ब्रिटिश कैंपों में खलबली मच गई।
खून से सनी साड़ी, पर नहीं झुका हौसला
जब पुलिस ने इन निहत्थी महिलाओं पर लाठीचार्ज शुरू किया। सुमित्रा देवी सबसे आगे खड़ी थीं। एक के बाद एक लाठियां उनके शरीर पर बरस रही थीं। खून उनकी साड़ी को लाल कर रहा था, सिर और हाथों पर गहरे जख्म थे। लेकिन उनकी चीख में दर्द नहीं, ‘वंदे मातरम’ का उद्घोष था। वे कई बार घायल हुईं, अस्पताल तक पहुँचीं, लेकिन ठीक होते ही फिर उसी सड़क पर खड़ी हो गईं। अंग्रेज हैरान थे कि इस औरत के भीतर इतना साहस आता कहाँ से है?
आजादी मिली, और नायक गुमनाम हो गया
इस कहानी का सबसे ज्यादा झकझोर देने वाला हिस्सा 15 अगस्त 1947 के बाद शुरू होता है। जब देश आजादी का जश्न मना रहा था और लोग ऊंचे पदों की शपथ ले रहे थे, तब समस्तीपुर की यह वीरांगना चुपचाप अपने फटे हुए पुराने आंचल को समेटकर अपनी उसी पुरानी दुनिया में लौट गई- अपने चूल्हे-चौके की दुनिया में।
- सम्मान का मोह नहीं: उन्होंने कभी किसी सरकारी दफ्तर के बाहर पेंशन के लिए लाइन नहीं लगाई। उनके लिए देश की सेवा एक ‘इबादत’ थी, जिसके बदले में उन्हें कोई ताम्र-पत्र या सरकारी कागज़ नहीं चाहिए था।
- त्याग की पराकाष्ठा: सुमित्रा देवी ने अपनी वीरता का कभी ढिंढोरा नहीं पीटा। उन्होंने वापस एक साधारण ग्रामीण महिला का जीवन चुना, मानों वह भीषण युद्ध उन्होंने किसी पुरस्कार के लिए नहीं, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों की मुस्कान के लिए लड़ा था।
हमारी उपेक्षा और उनका मौन बलिदान
आज हम समस्तीपुर के गौरव की बात करते हैं, लेकिन सुमित्रा देवी का जिक्र कहीं नहीं मिलता। यह हमारे समाज की सबसे बड़ी विफलता है कि जिस महिला ने लाठियां खाकर हमारी आजादी की राह बनाई, आज हमारे पास उनकी एक अदद ‘रियल फोटो’ तक नहीं है। वे एक ऐसी ‘गुमनाम शहीद’ की तरह जीकर चली गईं, जिन्होंने इतिहास तो बनाया लेकिन उस पर अपना नाम लिखना भूल गईं।
सुमित्रा देवी की कहानी हमें याद दिलाती है कि आजादी सिर्फ भाषणों से नहीं आई थी, वह सुमित्रा जैसी हजारों उन माताओं के खून और पसीने से सींची गई थी। जिन्होंने त्याग को ही अपना सबसे बड़ा पुरस्कार मान लिया।
