पंडित गणेश दत्त झा – समस्तीपुर के संस्कारवान शिक्षाविद
बिहार की मिट्टी की एक तासीर है- यहाँ का आम आदमी भी जब कुछ रचने पर आता है, तो इतिहास की धारा मोड़ देता है। समस्तीपुर जिले का हसनपुर क्षेत्र आज भले ही आधुनिक चकाचौंध और राजनीति की शोर-शराबे वाली खबरों में रहता हो, लेकिन इसी मिट्टी के एक कोने में दफन है उस ‘मूक साधक’ की कहानी, जिसने अपने हिस्से की धरती बच्चों के भविष्य के नाम लिख दी थी।
हम बात कर रहे हैं पंडित गणेश दत्त झा की। वह नाम, जो आज की पीढ़ी के लिए शायद अनजान हो, लेकिन जिसकी नींव पर कभी इस क्षेत्र में शिक्षा का सूरज उगा था।
जब अक्षर ज्ञान ‘व्यापार’ नहीं, ‘संस्कार’ हुआ करता था
कल्पना कीजिए उस दौर की, जब न सड़कों का जाल था, न हाथ में स्मार्टफोन। शिक्षा का मतलब केवल सरकारी नौकरी पाना नहीं, बल्कि ‘इंसान’ बनना था। उस दौर में पंडित गणेश दत्त झा एक ऐसे व्यक्तित्व बनकर उभरे, जिन्होंने कॉन्वेंट स्कूलों की चकाचौंध आने से बहुत पहले ही यह समझ लिया था कि अगर जड़ें कमजोर हुईं, तो समाज का पेड़ सूख जाएगा।
उनका सपना बड़ा साधारण लेकिन क्रांतिकारी था- वे चाहते थे कि गाँव का बच्चा जब ‘अ’ बोले, तो उसे अपने ‘अक्षर’ के साथ-साथ अपनी ‘अस्मिता’ का भी बोध हो। उन्होंने देखा कि आधुनिकता की दौड़ में हमारी प्राचीन धरोहर, हमारी देवभाषा संस्कृत और हमारे नैतिक मूल्य पीछे छूट रहे हैं। यहीं से जन्म हुआ उस मूक क्रांति का, जिसे आज हम ‘प्राचीन गुरुकुल पद्धति’ का आधुनिक विस्तार कह सकते हैं।
अपनी धरती का दान: एक पिता का अपने समाज को तोहफा
कहते हैं कि इंसान को अपनी ज़मीन से सबसे ज्यादा मोह होता है। लेकिन पंडित जी का कलेजा अलग मिट्टी का बना था। उन्होंने किसी सरकारी मदद या बड़े चंदे का इंतज़ार नहीं किया। उन्होंने अपनी खुद की पुश्तैनी ज़मीन उस पाठशाला के नाम कर दी, ताकि गाँव के गरीब से गरीब बच्चे को सिर उठाकर पढ़ने की जगह मिल सके।
यह सिर्फ एक प्लॉट का दान नहीं था; यह उनके अपने परिवार के भविष्य के ऊपर पूरे समाज के भविष्य को रखने का साहस था। उन्होंने अपनी ज़मीन की छाती पर कलम की नींव रखी। आज जब हम एक-एक इंच ज़मीन के लिए अपनों का खून बहाते देखते हैं, तब पंडित गणेश दत्त झा जैसे लोग किसी फरिश्ते से कम नहीं लगते।
संस्कृत: जो मंत्रों से ज्यादा ‘मनुष्यता’ की भाषा थी
उनकी पाठशाला में संस्कृत केवल श्लोक रटने का जरिया नहीं थी। उन्होंने इसे वैज्ञानिक सोच के साथ जोड़ा। उनका मानना था कि संस्कृत हमारे मस्तिष्क के तारों को झंकृत करती है। वे बच्चों को सिखाते थे कि कैसे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जिया जाता है। उनकी कक्षाएं किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि अक्सर पेड़ों की छांव में लगती थीं, जहाँ पक्षियों का कलरव और गुरु की वाणी एक साथ गूंजती थी।
आज के एयर-कंडीशंड क्लासरूम्स में वह सुकून कहाँ मिलेगा, जो पंडित जी की उस कच्ची-पक्की पाठशाला की मिट्टी की सोंधी खुशबू में था? वहां ‘संस्कार’ सिलेबस का हिस्सा नहीं थे, बल्कि शिक्षक के आचरण में रचे-बसे थे।
गुमनामी की धूल और हमारा अपराध
विडंबना देखिए, आज हम उन कॉन्वेंट स्कूलों की फीस भरने के लिए लाइन में लगते हैं। जहाँ हमारे बच्चे अपनी मातृभाषा बोलने में शर्म महसूस करते हैं और उसी भीड़ में हम उस इंसान का नाम भूल गए। जिसने हमें पहला अक्षर सिखाया था। पंडित गणेश दत्त झा आज इतिहास के किसी धुंधले पन्ने पर सो रहे हैं। न उनके नाम पर कोई बड़ा स्मारक है, न ही आज की डिजिटल दुनिया में उनकी बहुत सारी तस्वीरें।
वह शख्स, जिसने अपना जीवन ‘मूक साधना’ में बिता दिया, क्या वह इतना भी हकदार नहीं कि हम उनके जन्म और मृत्यु की तिथियों को सहेज सकें? क्या हमारा समाज इतना कृतघ्न हो गया है कि वह अपने उन नायकों को याद न रखे जिन्होंने उनके पूर्वजों की आँखों में ज्ञान की जोत जगाई थी?
खोज जारी है: उस ‘मूक साधक’ की परछाई की तलाश
पंडित जी का इतिहास किसी लाइब्रेरी की किताबों में नहीं मिलेगा। उनका इतिहास हसनपुर के उन बुजुर्गों की झुर्रियों में छिपा है जिन्होंने उन्हें करीब से देखा था। उनका इतिहास उस पाठशाला की पुरानी दीवारों में दर्ज है, जो आज शायद किसी कोने में खामोश खड़ी अपने संस्थापक को याद कर रही होंगी।
उनकी कोई ‘रियल तस्वीर’ शायद किसी संदूक के नीचे दबी किसी पुरानी एल्बम में मिल जाए, या शायद उनकी असली तस्वीर वह हर बच्चा है जो आज भी संस्कारवान होकर समाज की सेवा कर रहा है।
पंडित गणेश दत्त झा जैसे लोग मरते नहीं हैं। वे उस बीज की तरह होते हैं जो खुद मिट्टी में मिलकर एक विशाल वटवृक्ष खड़ा कर देते हैं। आज ज़रूरत है उस वटवृक्ष की छांव को पहचानने की। समस्तीपुर की मिट्टी आज भी अपने इस बेटे की याद में उतनी ही नम है, जितनी वह तब थी जब पंडित जी ने पहली बार वहां शिक्षा का बीज बोया था।
