दरभंगा, बिहार: बिहार के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय आज खत्म हो गया। दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का 96 वर्ष की आयु में निधन न केवल एक परिवार की क्षति है, बल्कि यह उस युग का अंत है जहाँ ‘राजधर्म’ का अर्थ प्रजा की सेवा और शिक्षा का विस्तार था। यदि आप भारतीय विरासत और मिथिला की संस्कृति में रुचि रखते हैं, तो महारानी की जीवनी और दरभंगा के ‘दूसरे लाल किले’ का इतिहास आपको गर्व और प्रेरणा से भर देगा।
महारानी कामसुंदरी देवी: सादगी और संकल्प की एक प्रेरक जीवनी
22 अक्टूबर 1932 को मधुबनी के पवित्र गांव मंगरौनी में जन्मी कामसुंदरी देवी का जीवन किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं था। उनका विवाह महज 8 वर्ष की उम्र में ही दरभंगा के अंतिम महाराजा सर कामेश्वर सिंह से हुआ था। अक्टूबर 1962 में महाराजा के निधन के बाद, जब रियासतें खत्म हो रही थीं, तब उन्होंने महलों की चारदीवारी से निकलकर ज्ञान और संस्कृति के संरक्षण का बीड़ा उठाया।
महारानी ने ‘महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन’ के माध्यम से हज़ारों दुर्लभ पांडुलिपियों और ऐतिहासिक दस्तावेजों को सहेजा। उनका जीवन हमें सिखाता है कि पद और प्रतिष्ठा का असली मूल्य समाज के उत्थान में है। उन्होंने अपनी निजी संपत्ति और महलों को विश्वविद्यालयों के लिए दान करने में कभी संकोच नहीं किया, जिससे आज मिथिला शिक्षा का केंद्र बना हुआ है।

दरभंगा किला: भारत का दूसरा ‘लाल किला’ और उसका गौरवशाली इतिहास
दरभंगा की धरती पर खड़ा विशाल ‘राज किला’ अपनी लाल दीवारों के कारण “भारत का दूसरा लाल किला” कहलाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे किसने और क्यों बनवाया?
- निर्माण और प्रेरणा (कब और किसने?):
इस भव्य किले का निर्माण महाराजा कामेश्वर सिंह ने 1934 के विनाशकारी भूकंप के बाद शुरू करवाया था। 1930 के दशक में जब दरभंगा राज अपनी संपन्नता के चरम पर था, तब महाराजा ने दिल्ली के लाल किले की तर्ज पर इसे बनवाने का संकल्प लिया। इसके निर्माण का मुख्य उद्देश्य राज परिवार की सुरक्षा और मिथिला की स्थापत्य कला को वैश्विक पहचान दिलाना था।- वास्तुकला की भव्यता (क्यों है खास?):
किले की दीवारें इतनी विशाल और चौड़ी हैं कि उन पर पहले घुड़सवार और गाड़ियां चलती थीं। इसका मुख्य प्रवेश द्वार, जिसे ‘सिंह द्वार’ कहा जाता है, मुग़ल और इंडो-सारसेनिक वास्तुकला का अद्भुत मिश्रण है। किले के चारों ओर एक गहरी खाई (Moat) बनाई गई थी, जो इसे सुरक्षा की दृष्टि से अभेद्य बनाती थी।- दान की अनूठी मिसाल:
यह दुनिया का शायद इकलौता ऐसा किला है जिसका एक बड़ा हिस्सा आज शिक्षा के मंदिर में तब्दील हो चुका है। दरभंगा राज ने अपने भव्य महलों को कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय और ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के लिए दान कर दिया, जो उनकी महानता का जीवंत प्रमाण है।
ऐतिहासिक विश्लेषण: क्यों अमर रहेंगी महारानी?
दरभंगा राज केवल टैक्स वसूलने वाली जमींदारी नहीं थी। इस परिवार ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के निर्माण में सर्वाधिक आर्थिक सहयोग दिया। महारानी कामसुंदरी देवी इसी गौरवशाली परंपरा की अंतिम संरक्षक थीं। उनके निधन के साथ ही उस पीढ़ी का विदाई हो गई है जिसने ब्रिटिश भारत और स्वतंत्र भारत के बीच एक सेतु का काम किया।
विरासत की नई जिम्मेदारी:
महारानी कामसुंदरी देवी का जाना हमें याद दिलाता है कि ईंट-पत्थरों से बने किले तो वक्त के साथ कमजोर हो सकते हैं, लेकिन शिक्षा और सेवा की जो नींव उन्होंने रखी, वह कभी नहीं ढहेगी। आज हमें जरूरत है कि हम उनके द्वारा छोड़ी गई सांस्कृतिक विरासत और दरभंगा के इस ‘लाल किले’ के संरक्षण का संकल्प लें।

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