Lady Singham of Samastipur Traffic
समस्तीपुर का वह ओवरब्रिज, जिसके नीचे से गुजरने वाली ताजपुर रोड पर दिन के हर पहर वाहनों का रेला लगा रहता है। हॉर्न की कान फोड़ती आवाजें, धूल के गुबार और हर किसी को जल्द से जल्द अपनी मंजिल तक पहुँचने की हड़बड़ी। इस आपाधापी के बीच, अगर कोई महिला आपको पूरी मुस्तैदी के साथ सीटी बजाती और हाथ के इशारे से हजारों वाहनों के प्रवाह को नियंत्रित करती दिखे, तो समझ जाइये कि आप अंजू देवी के सुरक्षा घेरे में हैं।
53 साल की उम्र, जहाँ पहुंचते ही लोग अक्सर रिटायरमेंट की योजनाएँ बनाने लगते हैं या शरीर की थकान के आगे घुटने टेक देते हैं, वहीं अंजू देवी ने समस्तीपुर की सड़कों को ही अपना कार्यक्षेत्र और अनुशासन को अपना धर्म बना लिया है।
पसीने और धूल के बीच एक अटूट संकल्प
समस्तीपुर का ताजपुर रोड सिर्फ एक रास्ता नहीं है, यह समस्तीपुर की धड़कन है जो शहर के मुख्य हिस्सों को जोड़ती है। यहाँ लगने वाला जाम शहरवासियों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था। लेकिन जब से जिला प्रशासन ने अंजू देवी को यहाँ पर तैनात किया है, परिदृश्य काफी बदलने लगा है।
उनकी ड्यूटी सुबह के उस वक्त शुरू होती है जब सूरज अपनी पहली किरणें बिखेर ही रहा होता है, और तब तक जारी रहती है जब तक कि आखिरी मुसाफिर सुरक्षित अपने घर न पहुँच जाए। उनके चेहरे पर दिखने वाली झुर्रियां थकान की नहीं, बल्कि उन अनुभवों की गवाह हैं जिन्होंने उन्हें पत्थर सा मजबूत बना दिया है।
जब नियम और जिद का एकसाथ आमना-सामना होता है
ट्रैफिक संभालना सिर्फ हाथ हिलाना नहीं है; यह एक मानसिक युद्ध है। खासकर तब, जब शहर की सड़कों पर ई-रिक्शा (टोटो) चालकों की मनमानी अपने चरम पर हो। अक्सर देखा जाता है कि कुछ टोटो चालक सवारी बिठाने के चक्कर में सड़क के बीचों-बीच अपना वाहन खड़ा कर देते हैं, जिससे चंद सेकंडों में काफी लंबा जाम लग जाता है।
ऐसी स्थिति में अंजू देवी का एक अलग रूप देखने को मिलता है। वह केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि एक माँ और एक सख्त अनुशासनपालक की भूमिका में आ जाती हैं। जब कोई उनकी बातों की अनदेखी करता है, तो वह बिना डरे, पूरी सख्ती के साथ उसे नियम का पाठ भी पढ़ाती हैं। उनकी आवाज़ में वह वजन है जो बड़े-बड़े उद्दंड चालकों को भी कतार में आने पर मजबूर कर देता है।
“हिम्मत हारना मेरे स्वभाव में नहीं। अगर मैं थक गई या पीछे हट गई, तो इन सड़कों पर सन्नाटा नहीं, चीख-पुकार मच जाएगी। लोग मुझे देखते हैं, तो शायद उनमें भी यह भरोसा जगता है कि कोई है जो व्यवस्था बनाए रखने के लिए खड़ा है।” – अंजू देवी के कार्यों से झलकता भाव
उम्र: सिर्फ एक संख्या, प्रेरणा का एक स्रोत
अंजू देवी की कहानी उन तमाम रूढ़ियों को तोड़ती है जो समाज ने महिलाओं और उम्र को लेकर बना रखी हैं। 53 की उम्र में भी बिना थके घंटों खड़े रहकर ट्रैफिक संभालना शारीरिक रूप से जितना चुनौतीपूर्ण है, मानसिक रूप से उससे कहीं ज्यादा कठिन भी। लेकिन उनका जज्बा यह साबित करता है कि असली ताकत मांसपेशियों में नहीं, बल्कि इरादों में होती है।
शहर के लोग अब उन्हें सम्मान की नजर से देखते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे उन्हें देखकर मुस्कुराते हैं और राहगीर उनके समर्पण को सलाम करते हैं। वे अब समस्तीपुर के लिए सिर्फ एक ट्रैफिक कर्मी नहीं, बल्कि एक ‘रोल मॉडल’ बन चुकी हैं।
समर्पण की एक अनकही दास्तां
अंजू देवी की मुस्तैदी का आलम यह है कि चाहे चिलचिलाती धूप हो या मूसलाधार बारिश, ताजपुर रोड पर उनकी मौजूदगी सुनिश्चित रहती है। उनके लिए उनकी ड्यूटी महज़ एक नौकरी नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक कर्ज है जिसे वह रोज चुकाती हैं। सड़क पर अव्यवस्था फैलाने वालों के लिए वह जितनी सख्त हैं, जरूरतमंदों और बुजुर्गों को सड़क पार कराने में उतनी ही नरम।
समस्तीपुर जिला प्रशासन का यह फैसला कि अंजू देवी जैसे समर्पित कर्मियों को अग्रिम पंक्ति में रखा जाए, आज सार्थक सिद्ध हो रहा है। उन्होंने दिखाया है कि यदि मंशा साफ हो, तो संसाधनों की कमी या परिस्थितियों की जटिलता कभी आड़े नहीं आती।
एक मिसाल जो बदल रही है सोच
आज जब हम अंजू देवी को ताजपुर रोड के चौराहे पर देखते हैं, तो हमें अहसास होता है कि बदलाव किसी बड़े भाषण से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे निरंतर प्रयासों से ही आता है। समस्तीपुर की सड़कों पर पसीना बहाती यह महिला हमें सिखाती है कि जिम्मेदारी को अगर जुनून बना लिया जाए, तो दुनिया की कोई भी बाधा आपको रोक नहीं सकती।
अंजू देवी का यह ‘जलवा’ किसी फिल्मी पर्दे की चकाचौंध नहीं है, बल्कि यह वह चमक है जो ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से पैदा होती है। वे समस्तीपुर की असली ‘सिपहसालार’ हैं, जिनके हौसले के आगे जाम की हर समस्या घुटने टेक देती है।
