नमन मिश्रा की रिपोर्ट
भोपाल । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) एक ओर दुनिया की गति और उत्पादकता को कई गुना बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसका एक अंधेरा पक्ष भी सामने आने लगा है- तेजी से बढ़ता जल संकट। एआई मॉडल्स को चलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स भारी मात्रा में बिजली के साथ-साथ पानी भी इस्तेमाल करते हैं। यह पानी मुख्य रूप से सर्वर मशीनों को ठंडा रखने के लिए प्रयोग होता है। एआई की लोकप्रियता बढ़ने के साथ-साथ यह पानी की खपत वैश्विक संसाधनों पर गहरा दबाव डाल रही है।
शोध में चौंकाने वाले आंकड़े: सवाल-जवाब भी पी रहे पानी
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, रिवरसाइड के शोधकर्ता शाओलेई रेन द्वारा किए गए अध्ययन ने इस संकट की गंभीरता को और उजागर किया है। उनके अनुसार, GPT-3 जैसे बड़े एआई मॉडल्स को सिर्फ 10–50 सवालों का जवाब देने में लगभग 2 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। यह अनुमान पहले की 500 मिलीलीटर वाली धारणाओं से चार गुना अधिक है। एआई मॉडल्स जितने अधिक जटिल और बड़े होते जा रहे हैं, उतना ही अधिक ताप वे उत्पन्न करते हैं, और उतनी ही अधिक कूलिंग की ज़रूरत पड़ती है। यही वजह है कि आने वाले वर्षों में पानी की खपत लगातार बढ़ने का अनुमान है।
दुनिया भर में बढ़ती चिंता: यूके से भारत तक प्रभाव
पिछले कुछ वर्षों में कई देशों ने इस बढ़ती खपत को लेकर चिंता जताई है, खास तौर पर वे क्षेत्र जहां पहले से ही पानी की भारी कमी है। यूनाइटेड किंगडम में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि 2020 में एआई डेटा सेंटर्स प्रतिदिन 1.1 मिलियन लीटर पानी का उपयोग करते थे, जो 2025 के अंत तक 2.5 मिलियन लीटर प्रतिदिन और 2030 तक 5 मिलियन लीटर प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। भारत में भी यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। 2025 में डेटा सेंटर्स की कुल जल खपत 150.3 अरब लीटर तक पहुंच सकती है और 2030 तक यह बढ़कर 358.66 अरब लीटर तक पहुंचने का अनुमान है।
कूलिंग सिस्टम की असलियत: पानी क्यों जरूरी?
एआई के संचालन के लिए आवश्यक डेटा सेंटर्स में कूलिंग का सबसे बड़ा योगदान पानी की खपत में होता है। सर्वर्स लगातार तेज़ी से डेटा प्रोसेस करते हैं, जिसके कारण सीपीयू और जीपीयू का तापमान तेजी से बढ़ जाता है। पारंपरिक एयर कंडीशनिंग इन मशीनों को ठंडा करने में सक्षम नहीं है, इसलिए वाटर-बेस्ड कूलिंग टावर्स का उपयोग किया जाता है। इन कूलिंग टावर्स में पानी को वाष्पीकरण (इवेपोरेशन) विधि से ठंडा किया जाता है, और यही वाष्पीकरण पानी की सबसे बड़ी खपत का कारण है। इस प्रक्रिया में लगभग 80 प्रतिशत पानी भाप बनकर खत्म हो जाता है, जबकि केवल 20 प्रतिशत पानी दोबारा उपयोग किया जा सकता है। गर्म जलवायु, जैसे भारत, उरुग्वे और दक्षिणी अमेरिका के हिस्सों में यह खपत और भी अधिक हो जाती है क्योंकि कूलिंग की जरूरत ज्यादा होती है।
पारंपरिक तकनीकें नाकाफी, नई तकनीकों की लागत भारी
कूलिंग प्रक्रिया की पारंपरिक तकनीकें अब बड़े एआई मॉडल्स के लोड को संभालने में नाकाफी साबित हो रही हैं। हालांकि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन जैसी कंपनियां लिक्विड कूलिंग, सबमर्ज्ड कूलिंग और वेस्टवाटर रीसाइक्लिंग जैसी उन्नत तकनीकों पर काम कर रही हैं, लेकिन इन तकनीकों का व्यापक उपयोग अभी महंगा और सीमित है। हालांकि, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल ने दावा किया है कि वे 2030 तक “वॉटर पॉजिटिव” बन जाएंगे, यानी जितना पानी वे उपयोग करेंगे, उससे अधिक पानी पुनर्जीवित या वापस प्राकृतिक रूप से उपलब्ध कराएंगे। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि एआई की तेजी से बढ़ती मांग इन प्रयासों को चुनौती दे रही है।
टेक कंपनियों की खपत में तेज़ उछाल
दुनिया की प्रमुख टेक कंपनियों की जल खपत भी इस संकट का बड़ा संकेत है। गूगल ने अपनी 2024 की पर्यावरण रिपोर्ट में बताया कि उसके डेटा सेंटर्स ने साल भर में 5.56 बिलियन गैलन (21 अरब लीटर) पानी का उपयोग किया, जो 2025 में 6 बिलियन गैलन तक पहुंच सकता है। मेटा के 2024 के सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन अनुमान है कि कंपनी सालभर में 1.5–2 बिलियन गैलन पानी खर्च करती है। माइक्रोसॉफ्ट ने 2024 में कुछ नई कूलिंग तकनीकें अपनाकर खपत को घटाकर 1.5 बिलियन गैलन तक लाने में सफलता पाई, जबकि अमेजन वेब सर्विसेज (AWS) की अनुमानित खपत 1–2 बिलियन गैलन के बीच मानी जा रही है।
सूखाग्रस्त देशों में संकट और गहराया
सबसे ज्यादा दिक्कत उन क्षेत्रों में देखी जा रही है जहां पहले से ही पानी की कमी है। अमेरिका के एरिजोना राज्य के मेसा और मारिकोपा क्षेत्रों में गूगल का डेटा सेंटर अकेले सालाना 1.45 बिलियन गैलन पानी उपयोग करता है, जो लगभग 23,000 निवासियों की सालभर की जरूरत के बराबर है। इसी तरह दक्षिण अमेरिकी देश उरुग्वे में 2024 के भयानक सूखे के दौरान गूगल के डेटा सेंटर को लेकर व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए, क्योंकि बड़ी मात्रा में पानी कूलिंग के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था जबकि लोगों को पीने का पानी भी मुश्किल से मिल रहा था।
भारत के लिए बढ़ती चुनौती: बेंगलुरु बना जल संकट का केंद्र
भारत में स्थिति और भी जटिल हो सकती है। बेंगलुरु, जो पहले से ही जल संकट से जूझ रहा है, वहां 2024 तक डेटा सेंटर्स की दैनिक खपत 8 मिलियन लीटर तक पहुंच चुकी थी। आने वाले वर्षों में भारत में नए डेटा सेंटर्स की संख्या दोगुनी होने की संभावना है, जिसका सीधा असर शहरों की जल उपलब्धता पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत अपनी डिजिटल इकोनॉमी के विस्तार के साथ जल प्रबंधन को मजबूत नहीं करता, तो 2030 तक कई शहरों में भयंकर संकट देखने को मिल सकता है।
विशेषज्ञों की चेतावनी: “जहां डेटा सेंटर, वहीं जल संकट”
आईटी एक्सपर्ट मोहित साहू, जयपुर का कहना है कि “जैसे लैपटॉप में हीट को कूलिंग फैन से कम किया जाता है, वैसे ही एआई डेटा सेंटर की हीट को वाटर कूलिंग सिस्टम से कम किया जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया में पानी हवा में मिलकर खत्म हो जाता है, जिसकी वजह से जहां भी बड़े डेटा सेंटर बन रहे हैं, वहां जल संकट गहराने लगा है।” उन्होंने चेतावनी दी कि भारत जैसे देश में जहां पीने के पानी की उपलब्धता ही चुनौती है, वहां एआई इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार सोच-समझकर करना होगा।
भविष्य का दोराहा: एआई का विकास बनाम जल सुरक्षा
कुल मिलाकर, एआई भविष्य को बदल रहा है, लेकिन इसके साथ जुड़े पर्यावरणीय जोखिमों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। अगर कूलिंग तकनीकों में तेज़ी से सुधार नहीं हुए और कंपनियां जल संसाधनों का संतुलित उपयोग नहीं करतीं, तो आने वाले दशक में एआई जितना उपयोगी होगा, उतना ही जल संकट का कारण भी बन सकता है।
