होली पर उमड़ी हजारों श्रद्धालुओं की भीड़
वो जो गुलाल हवा में उड़ता हुआ दिखता है न? हकीकत में वह गुलाल नहीं, हजारों लोगों की सांसों का दम घोंटता हुआ एक गुबार है। आप घर से निकलते हैं कान्हा के संग होली खेलने, मन में श्रद्धा होती है, आंखों में सपने होते हैं। लेकिन जैसे ही आप मथुरा या वृंदावन की सीमा में दाखिल होते हैं। आपका सामना एक ऐसी कड़वी सच्चाई से होता है जिसे कोई ट्रैवल व्लॉगर आपको नहीं बताएगा।
भीड़ का वो सैलाब, जहाँ इंसान सिर्फ एक नंबर है
बांके बिहारी मंदिर की उन संकरी गलियों की कल्पना कीजिए, जहाँ आम दिनों में दो लोग कंधे से कंधा छीलकर चलते हैं। होली के वक्त वहाँ पैर रखने की जगह नहीं होती। आप चलते नहीं हैं, बल्कि भीड़ के रेले के साथ बहते हैं। यहाँ ‘निजी स्पेस’ जैसी कोई चीज नहीं बची है। आपके पीछे से कोई धक्का देगा, आपके आगे वाला गिरेगा, और आप बस प्रार्थना करेंगे कि आप सलामत बाहर निकल आएं।
वहाँ जाने का मतलब है- घंटों तक जाम में फंसे रहना। अगर आप यह सोच रहे हैं कि आप मंदिर के करीब पहुँचकर दर्शन कर लेंगे, तो भूल जाइए। सुरक्षा के नाम पर लगी बैरिकेडिंग और लोगों का अनियंत्रित हुजूम आपको यह सोचने पर मजबूर कर देगा कि क्या आप वाकई यहाँ भक्ति के लिए आए थे? वहाँ की भीड़ अब आस्था से ज्यादा ‘दहशत’ पैदा करती है। छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए तो यह जगह किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं होती।
परंपरा का नाम और फटते हुए कुर्ते: लठमार होली का सच
ब्रज की परंपराओं में ‘लठमार होली’ और ‘होरंगा’ का अपना एक इतिहास है। बरसाना और नंदगाँव की गलियों में जब औरतें लाठियां बरसाती हैं, तो वह एक धार्मिक भाव होता है। लेकिन आज के समय में, जब लाखों की संख्या में पर्यटक वहाँ पहुँचते हैं, तो यह उत्सव एक तमाशे में बदल जाता है।
बरसाना की लठमार होली में गोपियाँ (स्थानीय महिलाएं) हुरियारों (पुरुषों) पर लाठियां भांजती हैं। पुरुषों के पास सिर्फ एक ढाल होती है खुद को बचाने के लिए। लेकिन इस भीड़ में, जब आप एक पर्यटक के तौर पर जाते हैं, तो आपको अंदाजा भी नहीं होता कि आप किस स्थिति में फँसने वाले हैं। वहाँ ‘कपड़ा फाड़’ होली का भी एक रिवाज है। दाऊजी के हुरंगे में तो महिलाओं द्वारा पुरुषों के कुर्ते फाड़कर उन्हें कोड़ा बनाकर उन्हीं पर बरसाया जाता है।
कल्पना कीजिए, आप नए सफेद कुर्ते-पाजामे में सजे-धजे वहां पहुंचे और अगले ही पल भीड़ के बीच आपका कुर्ता चिथड़े-चिथड़े हो गया। यह वहां का ‘रिचुअल’ है, जिसे लोग मजे लेकर निभाते हैं, लेकिन एक अनजान व्यक्ति के लिए यह अपमानजनक और डरावना अनुभव हो सकता है। अगर आप शारीरिक और मानसिक रूप से इस ‘हुड़दंग’ के लिए तैयार नहीं हैं, तो ब्रज की गलियां आपको तोड़कर रख देंगी।
क्या आप वाकई होली खेल पाएंगे?
सीधा सा जवाब है- नहीं! आप होली नहीं खेलेंगे, बल्कि आप उस भगदड़ का हिस्सा बनेंगे जहाँ रंग के नाम पर आँखों में धूल और कीचड़ झोंका जाता है। बांके बिहारी मंदिर के भीतर जो गुलाल और पानी बरसता है, उसे पाने के लिए मची जद्दोजहद में कई लोग बेहोश हो जाते हैं। मंदिर प्रशासन और पुलिस की तमाम कोशिशों के बावजूद, स्थिति नियंत्रण से बाहर रहती है।
वहाँ जाने का मतलब है:
- प्रदूषण और एलर्जी: सस्ता और केमिकल वाला गुलाल आपकी त्वचा और आँखों को नुकसान पहुँचा सकता है।
- मोबाइल और पर्स की चिंता: भीड़ का फायदा उठाकर जेबकतरे सक्रिय रहते हैं। आप कान्हा को क्या निहारेंगे, आपका पूरा ध्यान अपनी जेब और फोन को बचाने में लगा रहेगा।
- घर की शांति बनाम वहां का शोर: जो सुकून आप घर पर परिवार के साथ गुझिया खाते हुए और अपनों को गुलाल लगाते हुए पा सकते हैं, वह वृंदावन की इस अफरा-तफरी में कहीं खो जाता है।
एक भावुक चेतावनी: आस्था को भीड़ का हिस्सा मत बनाइए
हम सबको लगता है कि ब्रज जाकर ही होली सार्थक होगी। लेकिन क्या कान्हा ने कभी कहा था कि भक्ति के नाम पर खुद को और दूसरों को जोखिम में डालो? जब आप वहां की भीड़ में पिस रहे होते हैं, तो न तो आपके मन में राधे-राधे का जाप होता है और न ही चेहरे पर मुस्कान। वहां सिर्फ एक ही चिंता होती है- ‘यहाँ से बाहर कैसे निकलें?’
ब्रज की मिट्टी पवित्र है, वहां की परंपराएं महान हैं, लेकिन आज का ‘कमर्शियल टूरिज्म’ और ‘रील बनाने का भूत’ उस पवित्रता को निगल रहा है। लोग सेल्फी लेने के चक्कर में दूसरों को धक्का देते हैं, कैमरा पकड़ने के चक्कर में मर्यादा भूल जाते हैं।
अगर आप इस बार भी वृंदावन जाने की सोच रहे हैं, तो एक बार ठंडे दिमाग से सोचिए। क्या आप उस धक्के-मुक्की के लिए तैयार हैं जहाँ आपकी सांसें उखड़ने लगें? क्या आप उस रिवाज के लिए तैयार हैं जहाँ सरेआम आपके कपड़े फाड़ दिए जाएं? क्या आप उन गलियों में फँसने को तैयार हैं जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखता?
होली तो प्यार का त्योहार है, अपनों के साथ बैठने का बहाना है। इसे सड़कों पर धक्के खाकर और फटे हुए कुर्ते के साथ ‘टूरिस्ट डेस्टिनेशन’ बनाने से बेहतर है कि अपने घर के आंगन को ब्रज बना लें।
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