Sama Chakeva Festival Mithila Bihar
बिहार के मिथिलांचल की हवाओं में जब धान की बालियों की सोंधी महक घुलने लगती है और कार्तिक की गुलाबी ठंड दस्तक देती है, तब गांवों की पगडंडियों पर एक अद्भुत दृश्य उभरता है। यह दृश्य है- मिट्टी की मूर्तियों, जलते दीयों और सुरीले लोकगीतों का। ‘सामा-चकेवा’ (Sama-Chakewa) केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह एक जीवित दस्तावेज है जो बताता है कि कैसे हजारों साल पुरानी एक पौराणिक कथा आज भी हमारी रगों में लोक- संस्कृति बनकर दौड़ रही है।
पौराणिक जड़ें: जब श्रीकृष्ण की नगरी में रचा गया षड्यंत्र
सामा-चकेवा की कहानी द्वापर युग के द्वारिका की गलियों से निकलती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की एक अत्यंत गुणवती और सुंदर पुत्री थी, जिसका नाम था सामा। सामा का मन शांत स्वभाव का था और वह अक्सर ऋषियों के आश्रम में जाकर आध्यात्मिक चर्चाओं में भाग लेती थी। श्रीकृष्ण के दरबार में ‘चूड़क’ नाम का एक अत्यंत ईर्ष्यालु और दुष्ट मंत्री (कुछ कथाओं में सेवक) था। उसने सामा के चरित्र पर झूठा आरोप लगाया और श्रीकृष्ण को विश्वास दिला दिया कि सामा का ऋषियों के साथ संबंध मर्यादा के विरुद्ध है।
क्रोध में आकर श्रीकृष्ण ने बिना सत्य जाने अपनी पुत्री सामा को पक्षी बन जाने का श्राप दे दिया। सामा विवश होकर पक्षी के रूप में जंगलों में भटकने लगी। जब सामा का भाई चकेवा (सम्ब) देशाटन से वापस लौटा और उसे अपनी बहन की दुर्दशा का पता चला, तो वह विचलित हो उठा। उसने अपनी बहन को निर्दोष साबित करने के लिए कठोर तपस्या की और अंततः श्रीकृष्ण को सत्य का बोध कराया। चकेवा ने भी पक्षी का रूप धारण किया ताकि वह अपनी बहन के साथ रह सके। भाई के इसी त्याग और संघर्ष ने सामा को फिर से मनुष्य रूप में वापस लाया।
मिट्टी को जीवंत करती उंगलियां: सृजन का उत्सव
छठ पूजा का पारण (समापन) होते ही मिथिला के घरों में एक अलग तरह का ‘शिल्पकार’ जाग उठता है। सामा-चकेवा की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसके पात्र बाजार के प्लास्टिक या सिंथेटिक खिलौनों से नहीं बनते। घर की बेटियां खुद नदी की शुद्ध चिकनी मिट्टी (केवाल मिट्टी) लाती हैं। दोपहर की धूप में बैठकर वे बड़े चाव से आकृतियां गढ़ती हैं।
इन मूर्तियों में सामा और चकेवा के अलावा कई अन्य पात्र होते हैं:
- चूड़क (खलांद): वह दुष्ट जिसने चुगली की थी। इसकी मूर्ति को थोड़ा डरावना और कुरूप बनाया जाता है।
- वृंदावन: घास-फूस से बना एक छोटा सा ढांचा।
- सतरंगिया: रंग-बिरंगे पक्षियों के जोड़े।
- मालिन: जो संदेशवाहक का काम करती थी। इन मूर्तियों को सुखाकर उन पर चावल के घोल (पिठार) और रंगों से नक्काशी की जाती है। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि लोक – संस्कृति में कला किसी डिग्री की मोहताज नहीं, बल्कि संस्कारों का हिस्सा है।
शाम की महफिल और लोकगीतों की मिठास
जैसे ही गोधूलि बेला होती है और आसमान में लाली छाती है, मिथिला की हर गली से ढोलक की थाप और महिलाओं के सुरीले स्वर गूँजने लगते हैं। लड़कियां अपनी-अपनी बांस की डलिया सजाती हैं, जिसमें जलते हुए दीये रखे जाते हैं। वे टोली बनाकर गांव के बाहर किसी खेत या मैदान में जुटती हैं।

वहां सबसे पहले ‘चूड़क’ (खलांद) की दाढ़ी जलाई जाती है, जो बुराई और चुगली के प्रति सामाजिक घृणा का प्रतीक है। महिलाएं एक लय में गाती हैं:
“साम चके साम चके अइहौ हे,
जोतला खेत में बैसिहौ हे!
सब के भैया बढ़िहौ हे,
चुगला के कोठी में आगि लगिहौ हे!”
(भावार्थ: हे सामा और चकेवा! आप वापस आएं और हमारे खेतों में बैठें। सबके भाई लंबी उम्र पाएं और चुगलखोर की कोठी (घर) में आग लग जाए।)
इन गीतों में भाई के लिए दुआ और दुश्मन के लिए तीखा व्यंग्य होता है।
प्रवासी पक्षियों का स्वागत: एक प्राचीन इको-सिस्टम
यदि हम सामा-चकेवा को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के चश्मे से देखेंगे, तो हम इसकी गहराई नहीं समझ पाएंगे। असल में, यह दुनिया का सबसे पुराना ‘बर्ड फेस्टिवल’ (Bird Festival) है। कार्तिक का महीना वह समय होता है जब साइबेरिया और अन्य ठंडे प्रदेशों से प्रवासी पक्षी हिमालय लांघकर मिथिला के तालाबों और चौर (जलक्षेत्रों) में आते हैं।
हमारे पूर्वजों ने इन पक्षियों को ‘सामा’ और ‘चकेवा’ का रूप मानकर उन्हें सुरक्षा देने का एक तरीका निकाला। बच्चों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि ये पक्षी हमारे अतिथि हैं और ये श्रीकृष्ण की पुत्री सामा के वंशज हैं। यह परंपरा हमें सिखाती है कि प्रकृति का संरक्षण कानून से नहीं, बल्कि आस्था और प्रेम से किया जाना चाहिए। पक्षियों के आगमन और उनके प्रति करुणा जगाने का यह तरीका अद्वितीय है।
वृंदावन की आग: भाई के संकल्प की परीक्षा
उत्सव के दौरान एक रस्म होती है ‘वृंदावन जलाना’। डलिया में घास-फूस से बना एक छोटा सा जंगलनुमा ढांचा होता है जिसे ‘वृंदावन’ कहा जाता है। लड़कियां इसमें आग लगाती हैं और भाई अपनी लाठी या छड़ी से उस आग को बुझाता है। यह दृश्य बेहद प्रतीकात्मक (Symbolic) है।
यह रस्म दर्शाती है कि यदि बहन के जीवन में कभी कोई विपत्ति (आग) आएगी, तो भाई उसे बुझाने के लिए खड़ा रहेगा। यह भाई-बहन के बीच बिना शब्दों के किया गया एक ऐसा सामाजिक अनुबंध है, जो हर साल दोहराया जाता है। इस दौरान गाए जाने वाले गीतों में ‘भैया’ को नायक की तरह पेश किया जाता है जो अपनी बहन की रक्षा के लिए किसी भी बाधा को पार कर सकता है।
चुगला की दाढ़ी: समाज के लिए एक कड़ा संदेश
सामा-चकेवा में ‘चुगला’ (चूड़क) का चरित्र आज के दौर में भी प्रासंगिक है। हर युग में ऐसे लोग होते हैं जो बिना वजह दूसरों के घर बर्बाद करते हैं। इस उत्सव में हर शाम चुगला की मूर्ति के चेहरे पर लगा ‘पटुआ’ (सन/जुट) जलाया जाता है। लड़कियां उसे चिढ़ाती हैं और समाज को चेतावनी देती हैं कि चुगली करने वाले का हश्र यही होगा।

यह रस्म बच्चों को नैतिकता का पाठ पढ़ाती है। यह सिखाती है कि सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। जिस तरह चकेवा ने अपनी बहन को न्याय दिलाया, उसी तरह समाज के हर भाई को अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहिए। यह उत्सव महिलाओं को एक ऐसा मंच प्रदान करता है जहाँ वे अपनी सामूहिक आवाज के जरिए सामाजिक बुराइयों पर प्रहार करती हैं।
कार्तिक पूर्णिमा: विदाई की वो भावुक रात
उत्सव का चरमोत्कर्ष कार्तिक पूर्णिमा की रात को आता है। यह ‘सामा’ की अपने मायके से विदाई का समय होता है। रात के सन्नाटे में, जब चांद पूरा खिला होता है, पूरा गांव नदी या तालाब के किनारे जमा होता है। विदाई के गीत इतने मर्मस्पर्शी होते हैं कि सुनने वालों की आंखें नम हो जाती हैं।
“कोन नगर से अइली सामा,
कोन नगर को जाय!
भैया के आंगन अइली सामा,
भाई जी के नैहर जाय!”
भाइयों को बुलाया जाता है। भाई अपनी बहन की डलिया से मिट्टी की मूर्तियों को अपने घुटने से हल्के से ‘तोड़ता’ है (यह पुनर्जन्म या बंधन मुक्ति का प्रतीक है)। इसके बाद दही, चूड़ा और मिठाई का प्रसाद एक-दूसरे को खिलाया जाता है। अंत में नम आंखों से मूर्तियों को विसर्जित कर दिया जाता है। विसर्जन का मतलब यह नहीं कि परंपरा खत्म हो गई, बल्कि इसका अर्थ है- “अगले बरस फिर आना।”
आधुनिकता का साया और सिमटती विरासत
आज के डिजिटल युग में, जहाँ मोबाइल और इंटरनेट ने बच्चों का बचपन छीन लिया है, सामा-चकेवा जैसी सामूहिक परंपराएं खतरे में हैं। शहरों में रहने वाली मिथिला की नई पीढ़ी अब शायद ही मिट्टी से खुद मूर्तियां बनाती हो। पलायन (Migration) के कारण गांव खाली हो रहे हैं, जिससे शाम की उन महफिलों की रौनक कम हुई है।
हालांकि, कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं और कलाप्रेमी अब इसे ‘महोत्सव’ के रूप में मनाकर बचाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन असली चुनौती इस उत्सव की ‘रूह’ को बचाने की है। यह उत्सव केवल मिट्टी के खिलौने नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक ताने-बाने का वो धागा है जो भाई-बहन को निस्वार्थ प्रेम से जोड़ता है। इसे बचाना केवल एक संस्कृति को बचाना नहीं, बल्कि मानवता और प्रकृति के बीच के उस संवाद को बचाना है जो अब कहीं खोता जा रहा है।
एक शाश्वत पुकार
सामा-चकेवा मिथिला की वह पुकार है जो सदियों से गूँज रही है। यह हमें याद दिलाती है कि हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएं, हमारी जड़ें उसी मिट्टी में हैं जिससे सामा और चकेवा की मूरतें बनती हैं। यह परंपरा हमें प्रेम, न्याय और करुणा का पाठ पढ़ाती है। जब तक बिहार के किसी आंगन में एक भी बेटी अपनी डलिया सजाकर “साम चके” गा रही है, तब तक यकीन मानिए कि इंसानी संवेदनाएं और भाई-बहन का वो पवित्र रिश्ता सुरक्षित है।
