चैत्र के पहले मंगलवार को मिथिला में मनाया जाने वाला बुढ़वा मंगल, जो होली का अंतिम उत्सव माना जाता है।
मिथिला की धरती पर जब चैत्र के पहले मंगलवार की सुबह होती है, तो हवाओं में अबीर की महक थोड़ी और गहरी हो जाती है। कैलेंडर कहता है कि होली बीत चुकी है, लेकिन मिथिला के गांवों के चौपाल कुछ और ही कहानी कहते हैं। यहाँ रंगों का त्यौहार थमा नहीं है, बल्कि एक ऐसे पड़ाव पर पहुँच गया है जिसे लोग ‘बुढ़वा मंगल’ कहते हैं। यह महज़ एक दिन नहीं है, बल्कि मिथिला की अल्हड़ता, महादेव के प्रति अगाध प्रेम और ‘बूढ़े’ हो रहे फागुन को एक बार फिर जी लेने की ज़िद है।
चौपाल पर जमता रंग और ढोल की थाप
बुढ़वा मंगल की सुबह बाकी दिनों जैसी नहीं होती। आम तौर पर होली के बाद लोग काम-धंधे में जुट जाते हैं, लेकिन मिथिला के ब्राह्मणों और अन्य समुदायों के बीच इस दिन एक अलग ही ‘मौज’ दिखती है। गाँव के ब्रह्मस्थान या किसी पुराने बरगद के पेड़ के नीचे ढोलक और झाल (मंजीरे) की आवाज गूंजने लगती है।
इस परंपरा की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी सामूहिकता है। यहाँ ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा सब मिट जाता है। ‘बुढ़वा मंगल’ का मतलब यह कतई नहीं है कि इसमें सिर्फ बुजुर्ग हिस्सा लेते हैं। दरअसल, ‘बुढ़वा’ शब्द यहाँ परिपक्वता और उस उल्लास का प्रतीक है जो वक्त के साथ और गहरा होता गया है। पुरुष टोली बनाकर निकलते हैं, चेहरों पर गाढ़ा गुलाल मल्हा जाता है और शुरू होता है ‘जोगिरा’ और ‘चैता’ का दौर।
मिथिला की होली बिना गाली और ठिठोली के अधूरी मानी जाती है। बुढ़वा मंगल के दिन इस ‘सभ्य फूहड़पन’ को एक सामाजिक स्वीकृति मिलती है। लोग एक-दूसरे को हास-परिहास में लपेटते हैं, पुराने किस्से दोहराए जाते हैं और भंग (ठंढई) का दौर चलता है। यह उस पुरुष सत्तात्मक समाज में एक ‘रिलीज वाल्व’ की तरह काम करता है, जहाँ साल भर की गंभीरता को एक दिन के लिए किनारे रख दिया जाता है।
पौराणिक तार: जब महादेव ने खेला था आखिरी रंग
बुढ़वा मंगल की परंपरा के पीछे कई लोककथाएं प्रचलित हैं, लेकिन सबसे प्रमुख कहानी महादेव और सती (या पार्वती) से जुड़ी है। लोक मान्यताओं के अनुसार, जब पूरी दुनिया होली मनाकर शांत हो जाती है, तब भगवान शिव अपने गणों के साथ श्मशान और कैलाश के बीच इस उत्सव को अपने अनूठे अंदाज में मनाते हैं।
कहा जाता है कि फाल्गुन पूर्णिमा को पूरी सृष्टि रंग खेलती है, लेकिन महादेव, जो वैरागी हैं, अपने भक्तों के प्रेम के वश में होकर चैत्र के पहले मंगलवार को ‘वृद्ध’ (बुजुर्ग) स्वरूप में प्रकट होते हैं और अपने प्रियजनों के साथ होली खेलते हैं। इसी कारण इसे ‘बुढ़वा मंगल’ कहा जाता है। हनुमान जी, जिन्हें शिव का ही अवतार माना जाता है, उनका दिन मंगलवार होने के कारण भी इस दिन का महत्व दोगुना हो जाता है।
एक अन्य किंवदंती के अनुसार, यह दिन विजय उत्सव का प्रतीक है। प्राचीन काल में राजा-महाराजा जब युद्ध जीतकर लौटते थे, तो प्रजा उनके स्वागत में गुलाल उड़ाती थी। अगर विजय की सूचना होली के बाद मिली, तो उसे आने वाले पहले मंगलवार को बड़े पैमाने पर मनाया जाता था। मिथिला के संदर्भ में, यह विद्यापति के पदों और शिव-शक्ति के मिलन का एक विस्तारित रूप है।
रीतियां जो आज भी जिंदा हैं
बुढ़वा मंगल के दिन मिथिला के घरों और मंदिरों में कुछ विशेष रीतियाँ निभाई जाती हैं:
- हनुमान आराधना और सिंदूर लेपन: सुबह-सुबह हनुमान मंदिरों में चोला चढ़ाया जाता है। लाल सिंदूर और चमेली के तेल का लेप लगाकर बजरंगबली से सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। माना जाता है कि हनुमान जी ने इसी दिन लंका दहन के बाद अपनी पूंछ की आग शांत की थी और विजय का रंग उत्सव मनाया था।
- दही-चूड़ा और मालपुआ का भोज: खाने के शौकीन मैथिलों के लिए यह दिन पकवानों का अंतिम उत्सव होता है। दही-चूड़ा, चीनी और बचे हुए होली के पकवानों के साथ ‘बड़ी-भात’ या ‘कढ़ी-बड़ी’ बनाने की परंपरा है।
- अबकी फागुन हमहुं खेलब…: ढोल की थाप पर विद्यापति के नचारी और शिव के विवाह के गीत गाए जाते हैं। डफ की आवाज के साथ जब “बाबा हरिहर नाथ” या “कनबा पर जटा छै” जैसे लोकगीत गूंजते हैं, तो ऐसा लगता है मानो साक्षात महादेव आंगन में उतर आए हों।
- अबीर का अंतिम टीका: इस दिन के बाद से लोग औपचारिक रूप से एक-दूसरे को रंग लगाना बंद कर देते हैं। यह फागुन को विदाई देने का तरीका है। लोग कहते हैं, “आजु बुढ़वा मंगल थिकै, फेर साल भरक लेल रं-अबिर स विदा भ जाओ” (आज बुढ़वा मंगल है, अब साल भर के लिए रंग-अबीर से विदा ले लो)।
सामाजिक सरोकार: रिश्तों की गर्माहट
बुढ़वा मंगल सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल का एक बड़ा जरिया है। मिथिला में एक कहावत है कि “होली के दिन तो सब मिलते हैं, लेकिन बुढ़वा मंगल को वही मिलता है जिसके दिल में सच्चा प्रेम हो।”
इस दिन अक्सर गाँव के उन लोगों के घर जाया जाता है, जिनसे किसी कारणवश मुख्य होली के दिन मुलाकात नहीं हो पाई थी। पुराने झगड़ों को सुलझाने और मनमुटाव मिटाने का यह आखिरी मौका होता है। युवा अपने बुजुर्गों के पैरों पर गुलाल रखकर आशीर्वाद लेते हैं, और बुजुर्ग उन्हें ‘जुग-जुग जीयो’ का आशीष देते हुए अपनी टोली में शामिल कर लेते हैं।
बदलते समय में बुढ़वा मंगल की चमक
आज के दौर में जब पलायन की वजह से मिथिला के गाँव खाली हो रहे हैं, बुढ़वा मंगल की वो पारंपरिक रौनक कुछ कम जरूर हुई है, लेकिन इसका जज्बा खत्म नहीं हुआ है। शहरों में रह रहे मैथिल समाज के लोग अब ‘बुढ़वा मंगल मिलन समारोह’ आयोजित करते हैं। वहां न कोई बड़ा होता है, न छोटा। बस होते हैं हाथ में अबीर की थपकी और जुबान पर ‘जोगिरा सारा रारा’ का उद्घोष।
यह त्यौहार हमें सिखाता है कि उत्सव कभी खत्म नहीं होता, वह बस अपना स्वरूप बदलता है। बुढ़वा मंगल उस ठहरी हुई खुशी का नाम है, जो भागदौड़ भरी जिंदगी में हमें रुकने, हंसने और फिर से अपनों से जुड़ने की याद दिलाती है। यह मिथिला की उस मिट्टी की सोंधी खुशबू है, जो चैत्र की चिलचिलाती धूप में भी फागुन की ठंडक का एहसास दिला जाती है।
मिथिला की ये गलियां, ये कीर्तन, और महादेव की ये मस्ती गवाह है कि जब तक धरती पर रंग रहेंगे, ‘बुढ़वा मंगल’ की ये अल्हड़ परंपरा पीढ़ियों तक ऐसे ही जीवंत बनी रहेगी।
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