पूजा कुमारी की रिपोर्ट
जयपुर: राजस्थान की राजधानी जयपुर धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरों से समृद्ध मानी जाती है। वैसे तो जयपुर को गुलाबी नगरी के रूप में भी जाना जाता हैं यह शहर अपनी शाही विरासत, भव्य किलों और ऐतिहासिक हवेलियों के लिए तो जाना ही जाता है।
लेकिन आज हम आपको एक मंदिर के बारे में अद्भुत रहस्य आपके समक्ष साझा करेंगे। आपको बता दें कि जयपुर में बसा एक मंदिर जो विश्व में एक मात्र मंदिर हैं जो अष्टसखियों के साथ और किशोरी जी कि छोटी बहन अनंग मंजरी और स्वम् राधा रानी संघ ठाकुर जी विराजमान हैं।
क्या आपको पता हैं जयपुर को हम गुप्त वृन्दावन कहते हैं?
जयपुर के रामगंज बाजार बड़ा चौपड़ के पास मैं लाडली जी का मंदिर स्थित हैं। ये मंदिर ठीक जैसे वृन्दावन के बरसाने में हमारी लाडली जी का मंदिर उपस्थित हैं ठीक वैसा है ये मंदिर। जबकि ये मंदिर जयपुर के रामगंज बाजार में मौजूद हैं। आपको बता दें कि लाडली जी का मंदिर बाजार के बीच शांत वातावरण में हैं, जैसे वृन्दावन में ऊँची अटारी हैं ठीक जयपुर में भी ऊँची अटारी हैं जहाँ पर बैठी हैं राधारानी जी।
आपको बता दें कि यहां भी ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़िया बनाया हुआ हैं ठीक वृन्दावन के बरसाने जैसा। क्योंकि हमारी राधारानी जी सबसे ऊँची हैं अनंत ब्रह्मांड में सबसे ऊंची है। जयपुर की धरती बहुत सौभाग्यशाली है। क्योंकि यहां स्वम् ठाकुर जी चल कर यहां आए। इसलिए जयपुर की धरती को साधारण तो नहीं कहा जा सकता हैं ये असाधारण धरती है। बिल्कुल बरसाने की महिमा है जयपुर में।
वृंदावन से जयपुर तक ठाकुर जी का सफर, इसलिए कहलाया जयपुर ‘गुप्त वृंदावन’
भगवान श्रीकृष्ण के प्रसिद्ध स्वरूप गोविंद देव जी का वृंदावन से जयपुर आना केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और धार्मिक घटना मानी जाती है। 16वीं– 17वीं शताब्दी में मुगल आक्रमणों के बढ़ते खतरे को देखते हुए, वृंदावन के कई प्राचीन ठाकुर जी के विग्रहों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया।
इसी दौरान जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय गोविंद देव जी की मूर्ति को वृंदावन से जयपुर लाए और सिटी पैलेस परिसर में भव्य मंदिर का निर्माण कराया। हालांकि इसके साथ ही मदन मोहन जी, गोपीनाथ जी, जुगल किशोर, राधा दामोदर जैसे अन्य ठाकुर जी भी जयपुर और आसपास के क्षेत्रों में स्थापित किए गए। वृंदावन के प्रमुख देव स्वरूपों के यहां विराजमान होने के कारण जयपुर को श्रद्धालुओं द्वारा ‘गुप्त वृंदावन’ कहा जाने लगा। आज भी गोविंद देव जी मंदिर जयपुर की आस्था और भक्ति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

राधा रानी जयपुर कैसे आई?
राधा रानी जयपुर कैसे आई ये समझने के लिए हमें सबसे पहले समझना होगा कि संप्रदाय क्या होता हैं – ललित संप्रदाय है जो कि विष्णु स्वामी संप्रदाय के अंतर्गत आता है। नाभा जी ही मक्तमाल में पेरित नारायण जी मिश्र का उल्लेख आता है जो कि बहुत बड़े भगवत आचार्य थे। उन्हीं की परंपरा में आगे जाकर प्रद्युम्न जी हुए।
आपको बता दें की वहाँ तक सब विष्णु स्वामी संप्रदाय में थे। उसके बाद प्रद्युम्न जी के पुत्र हुए आचार्य श्रीवंशली जी वो भी थे तो विष्णु स्वामी में ही पर उन्होंने अपना एक नया संप्रदाय नया पंथ अपने भावों के अनुसार जैसा किशोरी जी की कृपा से प्राप्त हुआ।
उन्होंने ललित संप्रदाय को आगे के कर आए। वैसे तो आचार्य श्रीवंशली जी की जन्म दिल्ली में हुआ था। जब उनका जन्म हुआ तब वो अपनी माता का दुग्धपान नहीं किया। अपनी माँ का माँ स्तन मुँह में नहीं लिया में नहीं लिया। इस परिस्थिति को देख कर सबलोग घबरा गए और पूरा दिन निकल गया लेकिन बच्चे ने दूध पान नहीं किया। कुछ लोग बरसाने के एक गोसाई को बुलाया गया तब उन्होंने सिर्फ़ राधे-राधे कहा बस बच्चा मुस्कुराने लगे और खुशी खुशी दूध पान किया।

गौरतलब हैं की वो हर समय साधारण रूप में बैठे रहते थे किसी से कुछ नहीं कहते थे। क्योंकि वो ज्यादा बातचीत नहीं करते थे। उन्हें राधा नाम बहुत पसंद था हर वक़्त राधा नाम जप किया करते थे। कुछ समय बाद जब वो अपने पिताजी के साथ जयपुर गए वहाँ से उनको पुष्कर जाना था पुष्कर स्नान करने के लिए तो वो जयपुर में रुके हुए थे।
वहाँ के राजा ने जयपुर के सभी विद्वान पंडितों को चंद्र महल आमंत्रित किया और एक प्रश्न पूछा कि जब पांचजन्य जो शंख हैं वो तो नित्य पार्षद हैं फिर कृष्णा जी कैसे प्राप्त किया? क्योंकि ये भगवान विष्णु जी के पास था। इसका जवाब कोई विद्वान पंडित ने नहीं दिया।
उसका उतर आचार्य श्री प्रद्युम्न जी से पूछा गया तो उन्होंने कहा की इसका जवान मेरा पुत्र दे देगा। उस समय उनके पुत्र 10 वर्ष के थे। उन्होंने कहा कि जैसे सभी पार्षद है जय- विजय ने भी अपने जन्म लिया। हिरण्यकश्यप और हिरणाक्ष ने भी जन्म लिया इसका यही मतलब हैं की जिस प्रकार उन्होंने जन्म लिया वो पर अंश रूप में लिया मुख्य रूप तो वहीं रहता हैं। जो मूल पार्षद रूप में विष्णु जी के पास पहुंच गया। उसके बाद वहाँ के राजा ने उनके चरण पकड़ लिया और कहा की आप यही रहें. वो बहुत प्रतिभाशाली थे।
क्या थी रंगीली गली की घटना?
आचार्य श्री वंशीअलि जब 27, 28 साल के थे। दिल्ली में राधाअष्टमी का उत्सव बहुत धूम धाम से मनाया करते थे और पैसे भी बहुत खर्च किया करते थे इस बात पर उनकी माता की नाराज हो गयी। उनको बोली की तुम बाबा जी नहीं हो तुम्हारे साथ परिवार वाले लोग रहते हैं इतना खर्चा मत किया करो।
बस क्या था अपनी माताजी से नाराज़ होकर वो वृंदावन चले गए उसके बाद उन्होंने ललित कुंज में 6 साल तपस्या किया उसके बाद किशोरी जी की सखी ललिता जी का उन्हें दर्शन प्राप्त हुआ उसके बाद उन्होंने उनको अपना गुरु मान लिया और उनके आदेश पर बरसाना जाकर गुरु मंत्र जपना शुरू किया। ये तपस्या 12 वर्षो तक किया तब जाकर किशोरी जी ने उनको अपनी मंदिर बुलाया।

जब आचार्य श्री वंशीअलि ऊपर जा रहे थे तो मुख्य द्वार पर पहुँचे तो मंदिर बंद हो रहा था तो उन्होंने गोसाई जी से कहा की मुझे लाडली जी ने मुझे बुलाया हैं जाने दीजिये तो गोसाई जी उन्हें जाने से रोक दिया और गुस्सा हो गए उसके बाद उन्होंने उन पर वार कर दिया।
जिसके बाद आचार्य श्री वंशीअलि के सर से रक्तधार फुटने लगा और वो दो रूप में हो गए। एक रूप रक्तरजीत वहीं मंदिर के बाहर रहें और दूसरा रूप किशोरी जी का दर्शन करने मंदिर के अंदर चले गए।
उसके बाद लाडली जी से उनको आशीर्वाद प्राप्त हुआ। ये देख कर गोसाई जी अपनी गलती पर उनसे क्षमा मांगी। इसके बाद जो अंदर गए हुए थे जब बाहर आए तो वहीं रक्तरजीत में आकर फिर से एक रूप बन गए। ये थी हमारी जयपुर की राधा रानी जी की अद्भुत रहस्यमई सच्ची कहानियां।
