12 साल में एक बार- जब महिलाएं बनती हैं योद्धा
इतिहास की किताबें अक्सर राजाओं की वीरता और सेनापतियों के विजय अभियानों से भरी होती हैं, लेकिन भारत के दिल यानी झारखंड के घने जंगलों के बीच एक ऐसी कहानी दबी हुई है, जो रोंगटे खड़े कर देती है। यह कहानी किसी कागज़ पर नहीं, बल्कि आदिम समाज की नसों में दौड़ती है। एक ऐसी परंपरा, जो हर 12 साल में एक बार जी उठती है। इसे दुनिया ‘जनी शिकार’ के नाम से जानती है।
कल्पना कीजिए एक ऐसी सुबह की, जहाँ सूरज की पहली किरण के साथ ही गाँव की हवा बदल जाए। जहाँ चूल्हे की आग शांत हो पर औरतों की आँखों में प्रतिशोध और शौर्य की ज्वाला हो। जहाँ पुरुष घर की दहलीज के भीतर सिमट जाएँ और स्त्रियाँ मर्दाना लिबास पहनकर, हाथों में कुल्हाड़ी और तीर-धनुष लिए जंगलों की ओर कूच कर दें। यह कोई फिल्म का सेट नहीं, बल्कि एक जीवंत विरासत है।
रोहतासगढ़ की वो रात: जब मुगलों के पसीने छूट गए
इस कहानी की जड़ें सैकड़ों साल पीछे, बिहार के रोहतासगढ़ किले तक जाती हैं। उस वक्त मुगलों का शासन था और उनकी नज़र आदिवासियों के अभेद्य किले पर थी। मुगल सेना ने कई बार हमला किया, लेकिन उरांव योद्धाओं के आगे उनकी एक न चली। आखिर में मुगलों ने एक कायराना चाल चली। उन्हें पता चला कि ‘सरहुल’ के त्यौहार के बाद उरांव पुरुष नशे और थकान में डूबे होते हैं। उन्होंने उसी रात हमले की योजना बनाई।
किले के भीतर सन्नाटा था। पुरुष गहरी नींद में थे। लेकिन तभी दो परछाइयां जागीं- सिगी दई और कइली दई। इन दो युवतियों ने भांप लिया कि मौत दरवाजे पर खड़ी है। वक्त नहीं था कि सोए हुए मर्दों को जगाया जाए। उन्होंने तुरंत फैसला लिया। गाँव की अन्य महिलाओं को इकट्ठा किया गया, मर्दों की पगड़ियाँ बांधी गईं, उनके कपड़े पहने गए और चेहरे पर कालिख मली गई ताकि अँधेरे में वे पुरुष लगें।
जब मुगल सेना किले के भीतर घुसी, तो उनका सामना एक ऐसी फौज से हुआ जो बिजली की तरह टूट पड़ी। मुगलों को लगा कि उरांव पुरुष जाग गए हैं। वे बुरी तरह हारकर पीछे हटे। ऐसा एक बार नहीं, तीन बार हुआ। लेकिन चौथी बार, एक धोखेबाज़ ने मुगलों को बता दिया कि जो लड़ रहे हैं, वे मर्द नहीं बल्कि औरतें हैं। जब तक भेद खुला, तब तक सिगी दई और कइली दई ने अपनी वीरता से इतिहास के पन्नों पर अपना नाम खून से लिख दिया था। ‘जनी शिकार’ इसी अदम्य साहस का उत्सव है।
12 साल का सन्नाटा और फिर वो तूफ़ान
जनी शिकार हर साल नहीं मनाया जाता। इसके पीछे एक गहरा दर्शन है। यह 12 साल में एक बार आता है, ठीक उसी तरह जैसे कुंभ का मेला। गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि 12 साल का यह अंतराल उस पीढ़ी को तैयार करने का समय है, जो अपनी जड़ों को भूल न जाए।
जब 12 साल पूरे होते हैं, तो पहाड़ों और जंगलों में एक खास तरह की हलचल शुरू हो जाती है। पाहन (गाँव का पुजारी) मुनादी करवाता है। गाँव की महिलाएं अपने पुराने बक्सों से मर्दों के कुर्ते और धोती निकालती हैं। कुल्हाड़ियों की धार तेज़ की जाती है। इस दिन का इंतज़ार किसी उत्सव से ज्यादा एक ‘मिशन’ की तरह होता है। माँ अपनी बेटी को बताती है कि कैसे सिगी दई ने तलवार पकड़ी थी, और दादी अपनी पोती को सिखाती है कि जंगल में बिना आवाज़ किए कैसे चला जाता है।
शुरू होता है ‘रणचंडी’ का अवतार
शिकार वाले दिन का नज़ारा किसी को भी हैरत में डाल सकता है। सुबह-सुबह महिलाएं नहा-धोकर तैयार होती हैं, लेकिन उनके श्रृंगार में काजल या बिंदी नहीं होती। वे माथे पर साफा बांधती हैं, हाथ में लाठी या तलवार लेती हैं और ढोल-नगाड़ों की थाप पर ‘अखड़ा’ (गाँव का सार्वजनिक स्थल) पर जमा होती हैं।
यहाँ से शुरू होता है ‘जनी शिकार’ का जुलूस। ये महिलाएं एक गाँव से दूसरे गाँव की ओर बढ़ती हैं। रास्ते में जो भी जानवर भेड़, बकरी या मुर्गा दिखता है, उसका शिकार किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि जिस गाँव की महिलाएं गुजरती हैं, उस गाँव के पुरुष उन्हें रोक नहीं सकते। वे अपनी छतों या दरवाजों के पीछे से चुपचाप इस मंजर को देखते हैं। यह उस दिन की याद दिलाता है जब पुरुषों की गैर-मौजूदगी में औरतों ने समाज की कमान संभाली थी।
यह शिकार केवल भोजन के लिए नहीं है। यह एक प्रतीकात्मक संदेश है कि “अगर हमारे अस्तित्व पर आंच आई, तो हम संहार करना भी जानती हैं।” जंगल की झाड़ियों के बीच से गुजरती हुई इन महिलाओं की कतार किसी सेना की टुकड़ी जैसी लगती है। उनके लोकगीतों में युद्ध की ललकार होती है और कदमों में गज़ब की फुर्ती।
अधिकार, सत्ता और सामूहिकता का संगम
जनी शिकार का सबसे खूबसूरत पहलू इसका सामाजिक ढांचा है। एक गाँव की महिलाएं जब शिकार करते हुए दूसरे गाँव पहुँचती हैं, तो वहां की महिलाएं उनका स्वागत करती हैं। वे उन्हें पानी पिलाती हैं, उनके पैर धोती हैं और फिर खुद भी उस जुलूस में शामिल हो जाती हैं। यह ‘सिस्टरहुड’ या नारी शक्ति का वो रूप है जिसे मॉडर्न फेमिनिज्म आज तलाश रहा है।
रास्ते में जो भी जानवर शिकार किया जाता है, उसका मालिक कोई विरोध नहीं करता। उसे पता है कि यह 12 साल का कर्ज है जो उसे चुकाना है। यह आदिम साम्यवाद (Primitive Communism) का उदाहरण है, जहाँ सब कुछ सबका है और जीत पूरे समाज की है।
शाम होते-होते जब ये महिलाएं वापस अपने गाँव लौटती हैं, तो पूरा गाँव अखड़ा पर इकट्ठा होता है। जो शिकार किया गया है, उसे सामूहिक रूप से पकाया जाता है। लकड़ियों के बड़े-बड़े लट्ठे जलाए जाते हैं, माँस पकने की खुशबू हवाओं में तैरती है और मांदर की गूँज सात पहाड़ों के पार तक सुनाई देती है। उस रात कोई भूखा नहीं सोता। उस रात कोई खुद को कमतर नहीं समझता।
क्या यह सिर्फ एक ‘हंटिंग गेम’ है?
बाहरी दुनिया के लिए यह शायद एक क्रूर परंपरा लग सकती है, लेकिन गहराई से देखें तो यह ‘इको-सिस्टम’ और ‘सांस्कृतिक प्रतिरोध’ का हिस्सा है। आदिवासी कभी भी अपनी ज़रूरत से ज्यादा शिकार नहीं करते। वे जानते हैं कि जंगल को कैसे बचाना है। जनी शिकार में भी वे नियमों का पालन करते हैं। यह जंगलों पर अपने दावे को पुख्ता करने का एक तरीका है।
आदिवासी समाज में महिलाएं हमेशा से पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर रही हैं- चाहे वो खेती हो या वनोपज इकट्ठा करना। लेकिन जनी शिकार उन्हें एक दिन के लिए ‘शासक’ बना देता है। यह दिन उन्हें याद दिलाता है कि वे केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उस सुरक्षा चक्र की धुरी हैं जिसने मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक को इस मिट्टी से खदेड़ा था।
बदलते दौर की परछाइयां
आज जब हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, झारखण्ड के इन दुर्गम इलाकों में भी बदलाव की लहरें पहुँच रही हैं। नई पीढ़ी की लड़कियां जीन्स पहनकर कॉलेज जा रही हैं, हाथ में लैपटॉप है। लेकिन जब जनी शिकार का साल आता है, तो वही लड़कियां लैपटॉप छोड़कर हाथ में टांगी (कुल्हाड़ी) उठा लेती हैं। यह उनकी पहचान का सवाल है।
शहरों में रहने वाले लोग शायद इसे एक अजीबोगरीब ‘कल्ट’ समझें, लेकिन उन महिलाओं से पूछिए जिनकी आँखों में उस दिन एक अजीब सी चमक होती है। वे उस दिन अपनी महान पूर्वजों सिगी दई और कइली दई की आत्मा को खुद के भीतर महसूस करती हैं। वे जानती हैं कि जब तक यह परंपरा ज़िंदा है, उनकी बहादुरी की कहानी कोई मिटा नहीं पाएगा।
रात का अँधेरा गहरा रहा है। मांदर की थाप अब धीमी पड़ चुकी है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से भी पुरानी यह संस्कृति एक बार फिर सो जाने को तैयार है- अगले 12 सालों के लिए। लेकिन उन औरतों के पैरों के निशान अभी भी जंगल की पगडंडियों पर ताज़ा हैं। वे निशान गवाह हैं कि इस दुनिया में एक ऐसी भी जगह है, जहाँ साल में एक बार ही सही, पर ‘शक्ति’ अपने असली और आदिम रूप में प्रकट होती है।
अगली बार जब आप झारखण्ड की पहाड़ियों से गुजरें और हवा में किसी अनजान जड़ी-बूटी या शिकार के पकने की खुशबू आए, तो समझ जाइएगा कि यह मिट्टी आज भी अपनी बेटियों की वीरता का जश्न मना रही है।
