सखुआ के फूल-प्रकृति और इंसान के रिश्ते का प्रतीक
शहर के शोर-शराबे से दूर, जहाँ कंक्रीट की सड़कों का दम घुटने लगता है और पगडंडियाँ साल के ऊँचे दरख्तों (वृक्षों) के बीच खो जाती हैं, वहाँ एक अलग ही दुनिया बसती है। झारखण्ड के छोटानागपुर पठार की वो धरती, जो फागुन की विदाई और चैत्र के आगमन पर एक अजीब सी बेचैनी और ख़ुशी से भर उठती है। हवा में एक हल्की सी मिठास घुलने लगती है- यह मिठास न तो किसी इत्र की है और न ही किसी मिठाई की। यह गंध है ‘सखुआ’ के नए खिले फूलों की। यह आहट है ‘सरहुल’ की।
सरहुल सिर्फ एक त्यौहार नहीं है। यह आदिम समाज का उस प्रकृति को दिया गया एक ‘प्रेम पत्र’ है, जिसने हज़ारों सालों से उन्हें अपनी गोद में पाला है।
उस सुबह की आहट: जहाँ वक्त ठहर जाता है
चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया। सूरज अभी पहाड़ियों के पीछे अंगड़ाई ले ही रहा होता है कि गाँवों में मांदर (एक प्रकार का ढोल) की थाप गूंजने लगती है। सरहुल की सुबह किसी आम त्यौहार जैसी नहीं होती। यहाँ कोई बाज़ार की भागदौड़ नहीं है, बल्कि एक सामूहिक शांति है। गाँव का ‘पाहन’ (पुजारी) सवेरे-सवेरे उपवास तोड़कर तैयार होता है। उसकी आँखों में एक जिम्मेदारी होती है- धरती और आकाश के मिलन को संपन्न कराने की जिम्मेदारी।
लोग अपने घरों को गोबर और लाल मिट्टी से लीपते हैं। सखुआ की कोमल टहनियों से घर के दरवाजे सजाए जाते हैं। लेकिन इस सजावट के पीछे एक गहरा दर्शन है। आदिवासी समाज मानता है कि जब तक सखुआ (साल) के पेड़ पर नए फूल न आ जाएँ और उनकी पूजा न हो जाए, तब तक वे प्रकृति की किसी भी नई चीज़ का इस्तेमाल नहीं करेंगे। न नया फल खाएंगे, न नए पत्ते तोड़ेंगे। यह प्रकृति के प्रति उस सम्मान की पराकाष्ठा है, जो आज के ‘कंज्यूमर कल्चर’ में कहीं खो गई है।
शादी की वो अनोखी कहानी: जब धरती बनी दुल्हन
सरहुल के पीछे की सबसे खूबसूरत और रोंगटे खड़े कर देने वाली एक पौराणिक कथा है, जो पीढ़ियों से पुरखों की जुबानी सुनाई जाती रही है। यह कहानी है- ‘धरती और सूर्य का विवाह’।
आदिवासी दर्शन के अनुसार, यह पूरी सृष्टि एक परिवार है। पाहन इस पर्व पर एक अनोखा अनुष्ठान करता है। वह प्रतीकात्मक रूप से ‘धरती माता’ और ‘सूर्य देव’ (सिंगबोंगा) का विवाह कराता है। पाहन खुद को सूर्य का प्रतिनिधि मानता है और उसकी पत्नी धरती की।
मान्यता है कि वसंत ऋतु में जब पेड़ों पर नई कोंपलें आती हैं, तो धरती दुल्हन की तरह सजती है। इस मिलन के बिना सृष्टि का चक्र आगे नहीं बढ़ सकता। पाहन और उसकी पत्नी के इस प्रतीकात्मक विवाह के जरिए समाज यह प्रार्थना करता है कि जिस तरह एक सफल विवाह से वंश आगे बढ़ता है, उसी तरह सूर्य और धरती के मिलन से खेत लहलहाएँ, जंगल फलें-फूलें और दुनिया में अन्न की कमी न हो। यह ‘इकोलॉजिकल बैलेंस’ को समझने का सबसे पुराना और कलात्मक तरीका है।
सरना स्थल: वह जीवित मंदिर जहाँ छत नहीं होती
शहरों के मंदिरों में आपको नक्काशीदार पत्थर और सोने के कलश दिखेंगे, लेकिन आदिवासियों का मंदिर ‘सरना’ होता है। यह जंगल का वह कोना है जहाँ साल के वृक्षों का झुंड होता है। यहाँ कोई मूर्ति नहीं होती। यहाँ देवता किसी पत्थर में कैद नहीं हैं, बल्कि वे उन लहलहाती टहनियों में हैं, उस मिट्टी में हैं।
पूजा के दौरान पाहन दो मिट्टी के घड़े लेता है और उनमें शुद्ध जल भरता है। इन्हें सरना स्थल पर रखा जाता है। अगले दिन की सुबह इन घड़ों के पानी के स्तर को देखा जाता है। यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि सदियों का मौसम विज्ञान है। अगर घड़े का पानी कम हो गया, तो माना जाता है कि उस साल अकाल पड़ेगा या बारिश कम होगी। अगर पानी का स्तर बना रहा, तो खुशहाली का संकेत है। इस भविष्यवाणी के आधार पर ही किसान अपनी बुवाई की तैयारी करते हैं।
फूलों का प्रसाद और मांदर की थाप
जब पूजा संपन्न होती है, तो पाहन सखुआ के फूलों को आशीर्वाद के रूप में हर ग्रामीण को देता है। पुरुष इन फूलों को अपने कानों के पीछे लगाते हैं और महिलाएँ अपने जूडो में। सफेद और हल्के पीले रंग के ये फूल किसी भी कीमती गहने से ज्यादा सुंदर लगते हैं।
जैसे ही सूरज ढलने को होता है, मांदर की आवाज़ तेज़ हो जाती है। अब शुरू होता है वह नाच, जिसमें कोई दर्शक नहीं होता, हर कोई कलाकार होता है। उरांव, मुंडा, हो और संताल समुदाय के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा-सफेद साड़ी जिस पर लाल बॉर्डर हो-पहनकर कतारबद्ध होकर नाचते हैं। उनके पैर ज़मीन पर इस तरह पड़ते हैं जैसे वे धरती माता को सहला रहे हों, उसे जगा रहे हों।
उनके गीतों के बोलों में कोई शोर नहीं, बल्कि जंगलों की रक्षा, फसलों की खैरियत और अपने पूर्वजों की यादें होती हैं। एक तरफ ‘हड़िया’ (चावल से बना पेय) का दौर चलता है, जिसे वे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यहाँ न कोई अमीर है, न गरीब। हर कोई उस मिट्टी का हिस्सा है, जिसे वे ‘माय’ (माँ) कहते हैं।
एक लुप्त होती दुनिया का आख़िरी मोर्चा
आज के दौर में जब हम ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की बात करते हैं, तो सरहुल जैसे त्यौहार एक सबक की तरह सामने आते हैं। आदिवासियों के लिए जंगल केवल लकड़ी का ढेर नहीं है। वे जानते हैं कि अगर सखुआ का पेड़ नहीं बचेगा, तो उनकी संस्कृति, उनके गीत और उनके देवता भी नहीं बचेंगे।
सरहुल के दौरान एक खास परंपरा है- नदियों और तालाबों में मछली पकड़ना। लेकिन यहाँ भी एक नियम है। वे कभी भी छोटी मछलियों को नहीं मारते, ताकि वंश आगे बढ़ता रहे। वे कभी भी पूरे जंगल को नहीं उजाड़ते। यह ‘जरूरत’ और ‘लालच’ के बीच की वह बारीक लकीर है, जिसे आधुनिक समाज भूल चुका है।
मिट्टी की गंध और भविष्य का सवाल
अँधेरा गहराने लगता है, पर नाच रुकता नहीं। अलाव की रोशनी में नाचते उन चेहरों को गौर से देखिए। उनके माथे पर पसीना है, पर होंठों पर एक ऐसी मुस्कान है जो केवल वही पा सकता है जिसने खुद को प्रकृति के हवाले कर दिया हो।
सरहुल केवल नाच-गाने का नाम नहीं है। यह उस वादे का नाम है जो इंसान हर साल जंगल से करता है- “तुम मुझे जीवन दो, मैं तुम्हें सम्मान दूँगा।” जब तक सखुआ के पेड़ों पर फूल खिलते रहेंगे, जब तक पाहन के घड़े में पानी रहेगा और जब तक मांदर की थाप गूँजती रहेगी, तब तक यह भरोसा कायम रहेगा कि हम अभी पूरी तरह मशीन नहीं बने हैं।
आवाज़ें धीमी होने लगती हैं, पर जंगल की सरसराहट बढ़ जाती है। शायद हवाएँ भी सरहुल के गीतों को दूर पहाड़ियों तक ले जाना चाहती हैं, ताकि दुनिया जान सके कि इस ज़मीन के असली वारिस आज भी अपनी जड़ों को सींच रहे हैं।
