Bihari Wedding Bhakhra Sindoor Ritual
बिहार की मिट्टी की अपनी एक अलग महक है, और यहाँ की परंपराओं में जो रचे-बसे रंग हैं, वे सिर्फ आंखों को नहीं सुहाते, बल्कि उनमें सदियों का इतिहास और जज्बात छिपे होते हैं। इन्हीं रंगों में सबसे चटख और सबसे गहरा रंग है- भखरा सिंदूर।
वह सुर्ख लाल रंग का सिंदूर नहीं, जो अक्सर बाजार के छोटे पैकेटों में मिलता है। यह वह गाढ़ा नारंगी रंग है, जो दुल्हन की नाक की नोक से शुरू होकर सिर के बीचों-बीच उस लंबी लकीर तक जाता है, जिसे सुहाग की लंबी उम्र का प्रतीक माना जाता है। अगर आप बिहार के किसी भी गांव या शहर की शादी में शरीक हुए हों, तो आपने देखा होगा कि सिंदूरदान के समय मंडप का पूरा माहौल बदल जाता है। वह सिर्फ एक रस्म नहीं होती, वह एक ‘लिगेसी’ (विरासत) का हस्तांतरण होता है।
उस सिंदूरदानी की कहानी
कहानी शुरू होती है उस सिन्दूरदानी से, जो अक्सर पीतल या लकड़ी (खासकर आम या शीशम की लकड़ी) की बनी होती है। वह कोई साधारण डिब्बी नहीं है। वह एक तिजोरी है, जिसमें एक परिवार की मर्यादा और आने वाली पीढ़ी की खुशियां बंद होती हैं। बिहार के घरों में यह नियम सा है कि सास अपनी नई बहू को अपनी सिन्दूरदानी सौंपती है। यह सिर्फ एक वस्तु देना नहीं है; यह उस जिम्मेदारी का प्रतीक है जो एक स्त्री दूसरी स्त्री को सौंपती है।
मंडप के बीचों-बीच, धुआं उठते हवन कुंड और मंत्रोच्चार के बीच, जब दूल्हा अपनी जेब से या किसी थाली से एक चांदी का सिक्का (रुपया) उठाता है, तो सबकी सांसें थम जाती हैं। वह सिक्का उस भखरा सिंदूर में डुबोया जाता है। दूल्हा दुल्हन की नाक के एकदम सिरे से-जिसे ‘अग्रभाग’ कहते हैं- वहां से शुरू करके पीछे तक एक लंबी लकीर खींचता है। यह लकीर जितनी लंबी और स्पष्ट होती है, माना जाता है कि पति की उम्र और घर की बरकत उतनी ही लंबी होगी।
आखिर यह नारंगी ही क्यों?
अक्सर लोग पूछते हैं कि लाल क्यों नहीं? नारंगी ही क्यों? इसका जवाब किसी विज्ञान की किताब में नहीं, बल्कि हमारी मान्यताओं और प्रकृति के करीब होने में छिपा है।
- हनुमान जी और सिंदूर का नाता: बिहार की संस्कृति में ‘बजरंगबली’ का अटूट स्थान है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब हनुमान जी ने माता सीता को अपनी मांग में सिंदूर लगाते देखा और पूछा कि वे ऐसा क्यों करती हैं, तो सीता माता ने कहा था कि इससे श्री राम प्रसन्न होते हैं और उनकी आयु लंबी होती है। यह सुनकर हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लपेट लिया। वह सिंदूर ‘सिंदूरी नारंगी’ था। तब से, नारंगी रंग को शक्ति, निष्ठा और अमर सुहाग का रंग माना गया।
- सूर्य की पहली किरण: नारंगी रंग उगते हुए सूरज (उषाकाल) का प्रतीक है। बिहार में ‘छठ’ महापर्व है, जहाँ डूबते और उगते सूर्य की पूजा होती है। यह भखरा सिंदूर उसी सूर्य की ऊर्जा का प्रतीक है, जो एक नए वैवाहिक जीवन की शुरुआत करता है।
- शुद्धता और प्रकृति: पारंपरिक भखरा सिंदूर ‘मर्करी सल्फाइड’ या प्राकृतिक खनिजों से बनता है। इसे बनाने की प्रक्रिया काफी कठिन होती थी। यह चमकीला नारंगी रंग सौभाग्य (Good Luck) का सूचक माना जाता है। लाल रंग जहाँ जुनून और प्रेम का प्रतीक है, वहीं नारंगी रंग त्याग, तपस्या और सौम्यता का संगम है।
मंडप का वह जादुई पल
जरा कल्पना कीजिए। आधी रात का वक्त है। कोहबर की दीवारों पर बने चित्र गवाह हैं। मंगल गीत गाती महिलाएं- “सूनु सूनु बाबा अरज मोर, सिन्दूर जे लेबऊ बेमिसाल…” (सुनिए बाबा, मेरी विनती सुनिए, जो सिंदूर मुझे मिलेगा वह बेमिसाल हो)।
दुल्हन के सिर पर जब वह गाढ़ा नारंगी रंग बिखरता है, तो वह केवल एक श्रृंगार नहीं रह जाता। भखरा सिंदूर की खासियत यह है कि यह थोड़ा दानेदार और भारी होता है। जब यह मांग में भरता है, तो कुछ कण दुल्हन की नाक पर गिरते हैं। बिहार में कहा जाता है, “नाक पर सिंदूर गिरना मतलब पति का बहुत प्यार मिलना।” उस वक्त दुल्हन की झकी हुई पलकें और वह नारंगी आभा, उसे साक्षात लक्ष्मी का रूप दे देती है।
विरासत का बोझ और गौरव
भखरा सिंदूर का महत्व शादी के बाद भी खत्म नहीं होता। बिहार की महिलाएं किसी भी बड़े तीज-त्योहार पर, चाहे वह ‘वट सावित्री’ हो या ‘जिउतिया’, इसी भखरा सिंदूर का इस्तेमाल करती हैं। यह आधुनिक ‘लिक्विड सिंदूर’ या ‘स्टिक’ जैसा नहीं है जिसे बस एक बिंदी की तरह लगा लिया जाए। इसे लगाने के लिए वक्त चाहिए, धैर्य चाहिए और सम्मान चाहिए।
आज के दौर में जब सब कुछ इंस्टेंट हो गया है, बिहार की शादियां अभी भी इस नारंगी रंग की वजह से अपनी जड़ों से जुड़ी हुई हैं। यह रंग याद दिलाता है कि हम चाहे न्यूयॉर्क में बस जाएं या दिल्ली के किसी फ्लैट में, हमारी जड़ें उस पीतल की सिन्दूरदानी और उस भखरा सिंदूर के दानेदार अहसास में ही छिपी हैं।
यह सिंदूर एक पुल है- मायके और ससुराल के बीच का, परंपरा और आधुनिकता के बीच का। जब एक बेटी अपनी मां को वह गहरा नारंगी सिंदूर लगाए देखती है और फिर वही रंग उसकी अपनी मांग में सजता है, तो उसे अहसास होता है कि वह अब उस महान स्त्री-शृंखला का हिस्सा बन गई है जिसने सदियों से इस संस्कृति को सहेज कर रखा है।
भखरा सिंदूर की वह महक और उसका वह जिद्दी नारंगी रंग, जो धोने के बाद भी माथे पर एक हल्की सी लकीर छोड़ जाता है, वही तो असली पहचान है बिहार के सुहाग की।
