शुक्रवार का दिन था। अदालत में एक ऐसा मामला सुनवाई के लिए आया, जो सिर्फ एक कपल की कहानी नहीं था, बल्कि समाज और कानून के बीच खड़ी उस रेखा की पहचान भी था, जिसे अक्सर लोग मिलाकर देख लेते हैं।
यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, तो इसके लिए उसके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून और सामाजिक नैतिकता को अलग-अलग समझना जरूरी है।
शाहजहांपुर से शुरू हुई यह कानूनी लड़ाई
मामला उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर का है। महिला की मां ने इस संबंध का विरोध करते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद कपल ने केस रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया और रिट याचिका दाखिल की।
शिकायत में महिला की मां ने आरोप लगाया कि उनकी बेटी के साथ रह रहा पुरुष पहले से शादीशुदा है और उसने उनकी बेटी का विवाह के लिए अपहरण किया है। उन्होंने इसे अपराध बताते हुए उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की।
अदालत की नजर में कानून बनाम सामाजिक नैतिकता
हालांकि, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से साथ रह रहे हैं, तो इसे केवल नैतिक आधार पर अपराध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस जे जे मुनिर और तरुण सक्सेना की डिवीजन बेंच ने कहा “समाज की नजर में कोई रिश्ता गलत हो सकता है, लेकिन अदालत का दायित्व है कि वह उसे कानून के दायरे में देखकर फैसला करे और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे।”
जब कोर्ट ने पुलिस और परिवार दोनों को दी चेतावनी
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यदि किसी रिश्ते में कोई आपराधिक तत्व नहीं है, तो केवल सामाजिक नैतिकता के आधार पर किसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए और स्पष्ट निर्देश दिए कि कपल के खिलाफ किसी प्रकार की कठोर कार्रवाई न की जाए।
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को फिलहाल गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, कोर्ट ने महिला के परिवार को कड़ी चेतावनी दी। अदालत ने कहा कि परिवार का कोई भी सदस्य कपल को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाएगा। उन्हें यह भी निर्देश दिया गया कि वे न तो कपल के घर में प्रवेश करें और न ही फोन, मैसेज या किसी तीसरे व्यक्ति के जरिए उनसे संपर्क करने की कोशिश करें।
एक फैसला, जो अधिकारों की बात करता है
इस फैसले के जरिए हाई कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि वयस्कों को अपनी पसंद से जीवन जीने का अधिकार है और कानून इस अधिकार की रक्षा करता है, भले ही समाज की राय इससे अलग क्यों न हो।
