बांग्लादेश में 13 वर्षीय नाबालिग मां ने कानूनी लड़ाई जीतकर अपने बच्चे की कस्टडी वापस हासिल की। अदालत के आदेश के बाद पुलिस ने बच्चे को सुरक्षित मां को सौंप दिया।
उम्र की वह दहलीज, जहां बच्चों के हाथों में किताबों का बस्ता, खेलने के लिए खिलौने और भविष्य के हसीन सपने होने चाहिए… उस कच्ची उम्र में यदि किसी के आंचल में एक रोता हुआ मासूम आ जाए, तो उस पर क्या बीतेगी? जरा सोचकर देखिए। जिस उम्र में बच्चे खुद अपनी उंगलियों से अपने जूतों के फीते ठीक से नहीं बांध पाते, उस उम्र में यदि कोई बच्ची ‘मां’ बन जाए और फिर क्रूर हालात उससे उसका जिगर का टुकड़ा छीन लें, तो उस मां का दिल किस दर्द से गुजरा होगा?
आज हम आपके लिए ग्राउंड टॉक (Ground Talk) के पन्नों पर एक ऐसी सच्ची और संघर्ष से भरी कहानी लेकर आए हैं, जो आपको अंदर तक झकझोर कर रख देगी। यह कहानी है बांग्लादेश की एक 13 साल की नाबालिग मां की, जिसने हार नहीं मानी और कानूनी लड़ाई लड़कर आखिरकार अपने बच्चे की कस्टडी वापस हासिल कर ही ली।
जब खुशियों की जगह जिंदगी में उतरा अंधकार
यह घटना बांग्लादेश की है, जहां एक 13 साल की कम उम्र की किशोरी के जिंदगी में तब भूचाल आ गया जब शादी और बच्चे के जन्म के कुछ ही महीनों बाद उसके पति और ससुराल वालों ने बेरहमी दिखाते हुए उसे घर से बाहर निकाल दिया। यही नहीं, क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए उन लोगों ने उसके मासूम बच्चे को भी उससे छीनकर अलग कर दिया।
जरा कल्पना कीजिए उस 13 साल की बच्ची की मनोदशा की! जिस उम्र में उसे अपने परिवार की गोद में होना चाहिए था। उसे न सिर्फ घर से बेदखल कर दिया गया, बल्कि एक मां से उसकी ममता का आंचल भी खींच लिया गया। उसके आंसू पोछने वाला कोई नहीं था, सिवाय इस जिद के कि उसे हर हाल में अपना बच्चा वापस चाहिए।
‘ढाका लीगल एड ऑफिस’ बना मसीहा
अंधेरे के इस साम्राज्य में जब चारों तरफ निराशा थी, तब इस लाचार किशोरी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने न्याय की आस में ‘ढाका लीगल एड ऑफिस’ (Dhaka Legal Aid Office) का दरवाजा खटखटया। वहां के अधिकारियों ने इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को समझा और उस नाबालिग मां की मदद के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू की।
ढाका लीगल एड ऑफिस के हस्तक्षेप और अदालत के स्पष्ट आदेश के बाद पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए बच्चे को सुरक्षित बरामद किया और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए उसे उसकी मां (उस 13 साल की किशोरी) की गोद में सौंप दिया।
न्यायाधीश की वह संवेदनशील टिप्पणी: वह खुद अभी एक बच्ची है…
इस पूरे मामले की सुनवाई के दौरान अदालत का माहौल भी बेहद भावुक और गंभीर हो गया था।
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश ने बेहद मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा- “वह खुद अभी एक बच्ची है, फिर भी मां बन गई।”
यह एक ऐसा वाक्य था जो समाज की उस सच्चाई को बयां करता है जहां कम उम्र में बच्चियों पर ऐसी जिम्मेदारियां लाद दी जाती हैं। जिनके लिए उनका शारीरिक और मानसिक रूप से विकसित होना अभी बाकी होता है। जज की इस टिप्पणी ने साबित कर दिया कि सिस्टम और कानून ने उस बच्ची के दर्द और उसकी विवशता को गहराई से महसूस किया था।
न्याय की जीत और एक मां का पुनर्जन्म
जब अदालत के आदेश के बाद पुलिस ने उस 13 साल की मां को उसका बच्चा सौंपा, तो उस पल वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। महीनों से अपने कलेजे के टुकड़े से बिछड़ी उस मां ने जब अपने बच्चे को सीने से लगाया, तो वह सुकून शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।
