Bihar Day Celebration 22 March
जिस मिट्टी ने दुनिया को लोकतंत्र का पहला पाठ पढ़ाया, जिस हवा ने बुद्ध को निर्वाण दिया और जिस धरती के बेटों ने हिमालय का सीना चीरकर रास्ता बनाया- उसी बिहार की आज एक नई तस्वीर मुकम्मल हो रही है।
हर साल 22 मार्च को जब हम ‘बिहार दिवस’ मनाते हैं, तो यह महज एक तारीख नहीं होती। यह उत्सव है उस जिजीविषा का, जो बाढ़ की विभीषिका में भी मुस्कुराना जानती है और दिल्ली की सत्ता के गलियारों में अपनी बौद्धिकता का लोहा मनवाना भी। आज ‘ग्राउंड टॉक’ के इस विशेष लेख में हम बिहार की परतों को उधेड़ेंगे- उसके स्वर्णिम अतीत से लेकर, संघर्षपूर्ण वर्तमान और उम्मीदों भरे भविष्य तक।
इतिहास की जड़ें: जहाँ से समय ने चलना सीखा
बिहार का इतिहास भारत का इतिहास है। अगर आप भारत के नक्शे से बिहार को हटा दें, तो देश का गौरव अधूरा रह जाएगा। मगध की वह धरती, जिसने चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य जैसे दूरदर्शी दिए, आज भी हमारी रणनीतिक सोच का आधार है।
- नालंदा और विक्रमशिला: जब दुनिया अंधेरे में थी, तब बिहार के नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों की मशाल पूरी दुनिया को रोशन कर रही थी। यहाँ ज्ञान सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि विमर्श (Discussions) में था।
- लोकतंत्र की जननी: वैशाली का ‘लिच्छवी गणराज्य’ दुनिया का पहला गणतंत्र था। आज जो हम ‘Democracy’ की दुहाई देते हैं, उसका बीज इसी मिट्टी में बोया गया था।
बिहार के वो ‘वीरपुरुष’: जिन्होंने इतिहास का रुख मोड़ा
बिहार की पहचान यहाँ के लोगों से है। यहाँ के नायकों ने कभी तलवार से, तो कभी कलम से और कभी सिर्फ अपने हौसले से क्रांति लिखी।
- बाबू कुंवर सिंह: 80 साल की उम्र में जब इंसान आराम सोचता है, तब इस वीर ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। अपनी कटी हुई बांह गंगा को अर्पित कर देने वाला वो दृश्य आज भी हर बिहारी के खून में उबाल ला देता है।
- महात्मा गांधी और चंपारण: मोहनदास करमचंद गांधी को ‘महात्मा’ बनाने वाली लैब बिहार की चंपारण की धरती ही थी। नील की खेती के खिलाफ उठी वो आवाज भारत की आजादी की पहली बड़ी जीत बनी।
- जयप्रकाश नारायण (JP): लोकतंत्र पर जब-जब खतरा मंडराया, बिहार के ‘लोकनायक’ ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। पटना के गांधी मैदान से उठी वो हुंकार आज भी भारतीय राजनीति के लिए एक सबक है।
- दशरथ मांझी: आधुनिक युग के वीर: ‘पहाड़’ जैसे घमंड को अपनी छैनी-हथौड़ी से तोड़ने वाले ‘माउंटेन मैन’ ने साबित किया कि अगर इरादा पक्का हो, तो इंसान प्रकृति को भी अपना रास्ता बदलने पर मजबूर कर सकता है।
वर्तमान की बदलती करवटें: क्या वाकई बिहार बदल रहा है?
पिछले दो दशकों में बिहार ने अपनी ‘बिमारू’ (BIMARU) छवि को तोड़ने की जी- तोड़ कोशिश की है। एक पत्रकार की नजर से देखें तो बदलाव सड़कों पर भी है और सोच में भी।
इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी
एक समय था जब बिहार में शाम के बाद सफर करना खतरे से खाली नहीं था। आज गंगा पर बने पुलों का जाल (जैसे महात्मा गांधी सेतु का नवीनीकरण और नए निर्माणाधीन पुल) उत्तर और दक्षिण बिहार की दूरी को पाट रहे हैं। बिजली अब सिर्फ चुनावी वादा नहीं, बल्कि गाँव-गाँव की हकीकत है।
शिक्षा और स्टार्टअप कल्चर
पटना और मुजफ्फरपुर जैसे शहर अब सिर्फ कोचिंग हब नहीं रहे। यहाँ का युवा अब नौकरी मांगने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला (Entrepreneur) बन रहा है। कृषि-आधारित स्टार्टअप्स (Agri-tech) में बिहार के युवा कमाल कर रहे हैं, जो मखाना, लीची और जर्दालू आम को ग्लोबल मार्केट तक पहुँचा रहे हैं।
महिला सशक्तिकरण
‘साइकिल योजना’ से लेकर ‘जीविका दीदी’ तक, बिहार ने महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में जो मॉडल पेश किया, उसकी चर्चा वर्ल्ड बैंक तक में हुई। आज बिहार की बेटियाँ पुलिस से लेकर प्रशासनिक सेवाओं में बढ़- चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।
चुनौतियां: जहाँ अभी बहुत कुछ करना बाकी है
हम सिर्फ अच्छी बातें कर के अपनी आँखें नहीं मूंद सकते। ‘ग्राउंड टॉक’ का मकसद ही है ज़मीनी हकीकत दिखाना।
- पलायन (Migration): आज भी बिहार की सबसे बड़ी समस्या है ‘प्रतिभा का पलायन’। यहाँ के मजदूर दूसरे राज्यों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन अपने ही घर में उन्हें काम की तलाश है।
- बाढ़ की समस्या: उत्तरी बिहार हर साल कोसी और गंडक की लहरों से लड़ता है। इसका स्थायी समाधान अब भी कागजों और फाइलों में दबा है।
- औद्योगिकीकरण: सर्विस सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग में बिहार को अभी लंबी छलांग लगानी है ताकि यहाँ के ग्रेजुएट्स को नोएडा या बेंगलुरु का रुख न करना पड़े।
एक नई उम्मीद का बिहार
बिहार को किसी ने ‘बिमारू’ कहा, तो किसी ने ‘जंगलराज’ का ठप्पा लगाया। लेकिन सच तो यह है कि बिहार एक ‘फिनिक्स’ पक्षी की तरह है, जो अपनी ही राख से उठना जानता है। आज का बिहार अपनी पहचान को लेकर शर्मिंदा नहीं, बल्कि गौरवान्वित है।
चाहे वो यूपीएससी (UPSC) के रिजल्ट्स हों या फिर लोक संगीत में शारदा सिन्हा की सुरीली आवाज, बिहार हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। बिहार दिवस सिर्फ जश्न मनाने का दिन नहीं, बल्कि यह संकल्प लेने का दिन है कि हम अपने राज्य को उसकी खोई हुई गरिमा वापस दिलाएंगे।
